श्रीमद्भागवत कथा लोकसेवार्थ करते थे डोंगरे महाराज
श्रीमद्भागवत कथामृत का स्वाद चखो तो दूसरे अमृत लगते फीके। यही बात अपने छोटे-से मानव जीवन में डोंगरे महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा के माध्यम से समझाया करते थे। डोंगरे महाराज का यह पावन पवित्र ग्रंथ हम सभी के घरों में, हमारे पुस्तकालय में, हमारे मंदिरों में, हमारे संस्थानों में व हमारे हृदय में बसाने के लिए प्रभु हमें परम शक्ति प्रदान करें, बस यही प्रार्थना है।
हम सभी के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करेंगे तो जीवन के आधे से ज्यादा कलह समाप्त हो जायेंगे, हमारे जीवन में ज्ञान तत्व रहेगा तो जीवन के जटिल प्रश्नों का समाधान हम स्वयं ही कर सकते हैं। जीवन में भक्ति आवश्यक है, क्योंकि कभी हमारी वह परिस्थिति हो जाती है जिसमें हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं। उदाहरण- जन्म-मरण और प्राकृतिक आपदाओं, आर्थिक संकट आदि के समय हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं तब भक्ति तत्व हमें सांत्वना प्रदान करता है।
गृहस्थ जीवन में संतुलन और संतों से मिली सादगी की सीख
हमारे जीवन में जो भी कुछ होता है, अच्छा या बुरा, तो हम जैसी भगवान की मर्जी मान लेते हैं। इसलिए जीवन में भक्ति जरूरी है, क्योंकि ईश्वर सर्वोपरि है, यह बात समझने की अति आवश्यकता है। अभी जिस शब्द के बारे में सबसे ज्यादा समझने की जरूरत है, वह है- वैराग्य। वैराग्य अर्थात घर छोड़ना या संन्यास लेना ऐसा नहीं है। भागवत जी में आदरणीय डोंगरे महाराज समझाते हैं कि जीवन में चार आश्रम होते हैं- बाल्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम।
इन चारों में से सबसे महत्वपूर्ण है- गृहस्थाश्रम। इसमें व्यक्ति युवा होता है। गृहस्थाश्रम में जिम्मेदारी अधिक होती है। अपनी जिम्मेदारियों से मुख नहीं मोड़ना चाहिए। सुख और दुःख दोनों में एकसमान रहना चाहिए। जलकमलवत् रहना अर्थात कमल कीचड़ में होता है, लेकिन उसके पत्तों और फूलों पर कीचड़ का कोई असर नहीं होता है।
इस स्थिति को ही जलकमलवत कहते हैं। इसी को संसार में जलकमलवत रहना अर्थात सुख-दुःख में एक समान रहना अर्थात को वैराग्य कहते हैं। भागवत जी में आता है कि हमें हमारे जीवन में कभी ना कभी और कहीं ना कहीं ईश्वर साक्षात्कार की अनुभूति होती है। डोंगरे महाराज ने अपना विद्याभ्यास वाराणसी में किया था। अहमदाबाद में संन्याश्रम और पुणे में संस्कृत पंडित का पद प्राप्त किया था। वह गुजरात के बड़ोदरा शहर में बड़े हुए थे।
सादगी, सेवा और भक्ति से भरा संतों जैसा जीवन
उनकी मातृभाषा मराठी थी, किंतु गुजराती पर उन्हें अच्छा प्रभुत्व था। वह पहले गुजराती में ही कथा करते थे। कुछ सालों बाद हिन्दी में कथा करने लगे। उन्हें प्रसिद्धि का मोह नहीं था। उन्होंने भारत के सभी क्षेत्रों और विदेश में कुलमिला कर 1100 ग्यारह सौ कथाएँ की थीं। वाराणसी में विद्या अभ्यास के बाद उन्होंने नरहरि महाराज से श्रीमद्भागवत कथामृतपान की दीक्षा ली थी। सन् 1948 में उन्होंने अपनी प्रथम कथा बड़ोदरा के जंबुबेट के मठ में की थी।
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प्रथम कथा से ही ऐसा लगा, जैसे माता सरस्वती जी उनकी जिा पर बैठ गयी थी और उनके मुंह से अविरल ज्ञान गंगा प्रवाहित होती थी। पहली ही कथा का रसपान कर सभी श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए थे। उनकी आखिरी कथा 1990 में शुकताल में आयोजित हुई थी। उन्होंने 42 वर्षों तक भागवत कथाएं कीं। वह एक विरल व्यक्ति थे, जो सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। वे अपना धन लोकसेवार्थ में लगा देते थे। अपने निजानंद में रहकर उन्होंने प्रभु कार्य किये थे। लोक-कल्याण को वे प्रभु-सेवा सम महत्व देते थे।
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