नक्सलवाद का अंत

भारत सरकार ने 31 मार्च, 2026 को छाती ठोककर घोषणा की कि नक्सलवाद और माओवाद को जड़ से समाप्त किया जा चुका है। भले ही राख में से फीनिक्स के फिर जी उठने की आशंका जताने वाले भी कम नहीं हैं। तब भी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का संसद में और सार्वजनिक मंचों पर यह कहना राहत तो देता ही है कि लाल गलियारा अब इतिहास बन गया है। 1967 के नक्सलबाड़ी से शुरू हुई यह आंतरिक चुनौती (जिसने एक समय पूरे मध्य और पूर्वी भारत को अपनी गिरफ्त में ले लिया था) अब मुख्यधारा से बाहर हो चुकी है। यह कोई अचानक चमत्कार नहीं, बल्कि केंद्र और राज्यों की दशकों की संयुक्त और बहुआयामी रणनीति का परिणाम है।

गौरतलब है कि सरकार की समाधान रणनीति ने इस सफलता की नींव रखी। सैन्य आयाम में आक्रामकता और आधुनिकता दोनों को जगह मिली। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तैनाती को मजबूत किया गया, नए शिविर स्थापित किए गए और संचार-तकनीक को पूरी तरह आधुनिक बनाया गया। ड्रोन, सैटेलाइट और खुफिया जानकारी के इस्तेमाल ने नक्सली नेतृत्व के गढ़ों की एक-एक कर निशानदेही की।

डॉमिनेट-क्लियर-होल्ड-एडवांस नीति से क्षेत्रीय नियंत्रण

डॉमिनेट-क्लियर-होल्ड-एडवांस नीति ने सुरक्षा बलों को न केवल हमला करने, बल्कि क्षेत्र को स्थायी रूप से नियंत्रित करने का मौका दिया। बड़े अभियानों ने नक्सली पोलितब्यूरो और सेंट्रल कमिटी को लगभग समाप्त कर दिया। लेकिन, बंदूकों की जीत अस्थायी होती है, अगर जड़ें बनी रहें। इसीलिए असैन्य आयाम निर्णायक साबित हुआ। विकास को सुरक्षा का पूरक बनाया गया। सड़कें, स्कूल, अस्पताल, बैंक और मोबाइल नेटवर्क के विस्तार ने दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ा।

वन अधिकार अधिनियम का सही क्रियान्वयन, पुनर्वास नीति और आत्मसमर्पण के आकर्षक पैकेज ने हजारों नक्सलियों को हथियार डालने के लिए प्रेरित किया। ठेकेदारों से वसूली और तेंदू पत्ता जैसे फंडिंग स्रोतों को बंद कर आर्थिक रीढ़ तोड़ी गई। सिविक ऐक्शन प्रोग्राम के माध्यम से स्थानीय समुदायों को विश्वास दिलाया गया कि राज्य उनकी रक्षा और प्रगति दोनों के लिए प्रतिबद्ध है।

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नक्सलवाद की जड़ें: गरीबी, विस्थापन और विकास की कमी

यह रणनीति इसलिए कामयाब हुई क्योंकि इसने समस्या की जड़ को समझा। नक्सलवाद कभी केवल बंदूक की बात नहीं था; वह गरीबी, आदिवासी विस्थापन, विकास की अनदेखी और वैचारिक अलगाव का परिणाम था। अतीत में केवल सैन्य दमन की कोशिशें नाकाम रहीं, क्योंकि विकास की कमी नई भर्ती को प्रोत्साहित करती रही। इस बार सुरक्षा और विकास दोनों हाथों से आगे बढ़े। परिणामस्वरूप हिंसक घटनाएं नाटकीय रूप से घटीं, प्रभावित क्षेत्र सिकुड़ गए और नक्सली संगठनात्मक ढांचा चरमरा गया।

फिर भी यह पूछा जा सकता है कि 31 मार्च, 2026 के दावे का यथार्थ क्या है? सरकारी आँकड़ों और वस्तुस्थिति के अनुसार यह दावा आधारभूत और यथार्थवादी है। नक्सली नेतृत्व का सफाया हो चुका है, क्षेत्रीय नियंत्रण समाप्त हो गया है और हिंसा का स्तर न्यूनतम पर पहुंच गया है। लेकिन पूर्ण उन्मूलन का अर्थ केवल सैन्य जीत नहीं है। कुछ दूरस्थ पॉकेटों में सतर्कता अभी भी जरूरी है। माओवादी वैचारिक पुनरुत्थान को रोकने के लिए विकास की गति बनाए रखनी होगी।

यदि गरीबी, बेरोजगारी और आदिवासी असंतोष की जड़ें बची रहीं, तो आज पैदा हुए शून्य को भविष्य में फिर भरा जा सकता है। कहना न होगा कि यह उपलब्धि भारत सरकार की दूरदर्शिता, केंद्र-राज्य समन्वय और सुरक्षा बलों के साहस की मिसाल है। नक्सलवाद मुक्त भारत अब विकास, शिक्षा और समृद्धि का नया अध्याय लिख सकता है। लेकिन इस जीत को स्थायी बनाने के लिए निरंतर प्रयास जरूरी होंगे। सुरक्षा और विकास का संतुलन बनाए रखते हुए आदिवासी भारत को मुख्यधारा में पूरी तरह शामिल किया जा सके, तो ही लाल गलियारा सचमुच हरा-भरा भारत बन सकेगा।

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