सादगी और सरलता की प्रतिमूर्ति थे : लाल बहादुर शास्त्री

लाल बहादुर शास्त्री का जीवन सरलता और सादगी से भरा हुआ था। उनका आचार-विचार महात्मा गांधी की शिक्षाओं से ओत-प्रोत था। एक वाक्य में उनके जीवन-वृत्त को समेटें तो कह सकते हैं कि उनके सरल, कोमल और निष्कपट व्यक्तित्व में लौह-पुरूष छिपा हुआ था।

देश की राजधानी दिल्ली में यमुना तट पर अनेक राष्ट्र-नायकों की समाधियां हैं, इन समाधियों पर जाकर सारा देश श्रद्धा से माथा टेकता है। इन्हीं में एक स्थल है विजय घाट। यह नाम सन् 1965 की लड़ाई में दुश्मन पर विजय की गौरव गाथा से जुड़ा हुआ है। समूचे देश ने डबडबायी आंखों और दुःखी मन से इसी स्थान पर चालीस साल पहले छोटे से कद के उस महानायक को अंतिम विदाई दी, जिसे लाल बहादुर शास्त्री के नाम से जाना जाता था। वे सचमुच भारत के ऐसे बहादुर लाल थे, जिन पर भारत को आज भी गर्व है।

लड़ाई के मैदान में पड़ोसी शत्रु राष्ट्र को मात देने के बाद शांति के इस महान पुजारी ने ताशकंद जाकर अपने रक्त से शांति- समझौते की इबारतें लिखीं। उनका वहीं दुखद देहांत हुआ और वे जीते जी स्वदेश नहीं लौट सके। अपनी पैनी आंखों से उन्होंने देश की आत्मा और वक्त के तकाजे को बखूबी पहचाना था। आत्मसम्मान उनके लिए बहुत मायने रखता था। उन्होंने हर मोर्चे पर देश के स्वाभिमान की रक्षा की और चीन के साथ युद्ध में भारत का खंडित आत्मसम्मान उसे फिर से लौटाने का सफल पुरुषार्थ किया।

सादगीपूर्ण जीवन और गांधीवादी विचारधारा

उनमें गजब की चारित्रिक दृढ़ता थी और अपनी सामरिक नीति से उन्होंने चीन-अमेरिका समेत सभी महाशक्तियों और देशों को चमत्कृत कर दिया। अपनी दूरदृष्टि के चलते उन्होंने जय जवान, जय किसान का नारा दिया जो देखते ही देखते घर-घर में फैल गया था। उनका जीवन सरलता और सादगी से भरा हुआ था। उनका आचार-विचार महात्मा गांधी की शिक्षाओं से ओत-प्रोत था। एक वाक्य में उनके जीवन-वृत्त को समेटें तो कह सकते हैं कि उनके सरल, कोमल और निष्कपट व्यक्तित्व में लौह-पुरूष छिपा हुआ था।

पंडित नेहरू के उत्तराधिकारी और इस देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को हम उनकी पृष्ठभूमि के चलते गुदड़ी के लाल की संज्ञा दे सकते हैं। कितना दिलचस्प संयोग है कि उनका जन्म भी बापू के जन्मदिन दो अक्तूबर को हुआ। वे दो अक्तूबर सन् 1904 को वाराणसी में पैदा हुए। आयु के मान से वे जवाहरलाल नेहरू से पन्द्रह वर्ष और महात्मा गांधी से पैंतीस वर्ष छोटे थे। बहरहाल, उनके पिता निर्धन शिक्षक यानि गरीब मास्टर थे। उनकी तीन संतानें थीं दो बेटियां और एक बेटा। बेटा एक तो इकलौता और फिर सबसे छोटा। वह सबकी आंख का तारा, सबका खूब दुलारा था।

मां के संस्कारों ने गढ़ा सशक्त चरित्र

लाल बहादुर डेढ़ वर्ष के ही थे कि पिता का निधन हो गया। अब तीनों बच्चों के लालन-पालन की जिम्मेदारी मां पर थी। मां ने हिम्मत नहीं हारी और दोनों बेटियों व लाल को लेकर अपने मायके मिर्जापुर चली आयीं, लिहाजा नन्हे का बचपन अपने ननिहाल में बीता। रामदुलारी यूं तो अनपढ़ थीं, मगर सच्चरित्रता, दृढ़ता और कर्तव्यपरायणता उनमें कूट-कूट कर भरी थी। मां के व्यक्तित्व का लाल पर बेहद असर पड़ा। लाल ने मां के गुणों को आत्मसात कर लिया।

चारित्रिक बल ईमानदारी, दृढ़ता और सादगी उनके व्यक्तित्व की आजीवन धुरी व पहचान रहे। उनके नाना उन्हें खूब प्यार-दुलार करते थे। उनके नाना भी चल बसे। अब क्या हो? आड़े वक्त में मामा और मामी काम आये। उन्होंने बच्चों को पिता या नाना की कमी महसूस नहीं होने दी। बालक लाल बहादुर ने अपनी प्राथमिक शिक्षा मिर्जापुर में ही पूरी की। प्राथमिक शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई के लिये लाल बहादुर वाराणसी चले आये वाराणसी में वे अपने मौसा के यहां रहे। उन्होंने हरिशचंद्र विद्यालय में प्रवेश लिया। मौसा के घर का वातावरण मामा के घर से भिन्न था। स्कूल में भी वह मिठास व अपनापन नहीं था।

पंडित मिश्र के मार्गदर्शन से हुआ सर्वांगीण विकास

कभी-कभी तिरस्कार और झिड़कियां भी झेलनी पड़ती थी। इस कठिन अनुभव का लाभ यह हुआ कि बालक लाल बहादुर में कठिनाइयों का सामना करने का हौसला पैदा हुआ और उसकी सहनशक्ति खूब बढ़ गयी। हरिशचंद्र विद्यालय में गणित के शिक्षक थे पंडित निशकामेश्वर मिश्र। पंडित मिश्र प्राचीन परंपरा के वाहक गुरू थे। उन्होंने लाल बहादुर के सर्वांगीण विकास में अहम भूमिका निभाई। वे घंटों गंगा किनारे बैठकर शिष्यों को प्राचीन भारत की गौरव गाथा सुनाते थे। उन्होंने उन्हें लोकमान्य तिलक की कहानी सुनायी, जिन्होंने स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है की सिंह-गर्जना की थी। उन्होंने बच्चों को महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी और गुरु गोविंद सिंह की वीरता के प्रसंग सुनाये।

लाल बहादुर के लिये पंडित मिश्र शिक्षक के साथ-साथ फ्रेंड, फिलासफर और गाईड, दार्शनिक और पथ प्रदर्शक- भी थे। शायद मिश्र जी ने किशोर लाल बहादुर में उन गुणों को चीन्ह लिया था, जो बड़े होने पर सबके सामने आए। बालक लाल बहादुर में कुछ ऐसे विरल गुण विद्यमान थे, जो उनकी महानता का संकेत देते थे।

डॉ. सुधीर सक्सेना

दासता के दौर के वे दिन राष्ट्रीय जागरण के दिन थे। भारत जाग रहा था। महात्मा गांधी परिदृश्य में आ चुके थे। किशोर लाल बहादुर की उम्र बमुश्किल ग्यारह साल की थी कि उन्होंने महात्मा गांधी को दूर से देखा और सुना। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की नींव रखने वाराणसी आये थे। महात्मा की चुंबकीय छवि और तपपूत वाणी को वे आजीवन कभी नहीं भूल सके।

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