हमारे समाज में कुछ लोग दैवी शक्तियों के अस्तित्व में पूर्णत: विश्वास करते हैं तो कुछ बिल्कुल ही विश्वास नहीं करते। दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो इनमें से कुछ शक्तियों के अस्तित्व में विश्वास करते हैं। इन शक्तियों के अस्तित्व में विश्वास करने या न करने के आधार पर किसी समाज के सदस्यों के दो वर्ग हो जाते हैं। इन दोनों वर्गों के व्यक्तियों के विचार एक-दूसरे से भिन्न होते हैं तथा ये एक-दूसरे वर्गों के व्यक्तियों को असामान्य दृष्टि से देखते हैं।
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पहले वर्ग के व्यक्ति दूसरे वर्ग के व्यक्तियों को अंधविश्वासी, रूढ़िवादी एवं मूर्ख समझते हैं तो दूसरे वर्ग के व्यक्ति पहले वर्ग के व्यक्तियों को नास्तिक एवं मनुष्यता की परिधि से परे समझते हैं। वास्तव में दैवी शक्तियों का अस्तित्व है या नहीं, यह तो एक लंबी बहस का विषय है। इस बहस के बाद भी किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। इनके अस्तित्व का होना या न होना तो दूर की बात है, लेकिन इतना निश्चित है कि जो व्यक्ति इन शक्तियों के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं, उन्हें इस विश्वास के कुछ लाभ अवश्य प्राप्त होते हैं।
दैवी विश्वास से उपजता आत्मबल, जो टूटे हौसलों को जोड़ता है
ये लाभ इस स्तर के होते हैं जिन्हें साधारण नहीं कहा जा सकता। इन शक्तियों में विश्वास रखने वाले व्यक्ति जाने-अनजाने संकट की घड़ी में इन शक्तियों का सहारा लेते हैं। सच तो यह है कि इन शक्तियों में विश्वास हमारे अंदर एक विशेष प्रकार की मनोवैज्ञानिक शक्ति को बनाये रखता है, जो संकट की घड़ी में हमारी सहायता करता है। जब कभी हम किसी कठिन परिस्थिति का सामना कर रहे होते हैं या किसी बहुत बड़ी परेशानी के जाल में फंस जाते हैं तो इन शक्तियों का विश्वास हमारे अंदर इन परिस्थितियों से संघर्ष करने के खातिर अपनी संचित असीमित शक्ति का सदुपयोग करता है जो धैर्य, साहस, आत्मबल इत्यादि किसी भी रूप में हो सकती है।
जब कभी हम अपने जीवन के मार्ग पर गतिशील रहने के दौरान किसी उद्देश्य को पाने में असफल हो जाते हैं या असफल होने की संभावनाएँ ज्यादा सबल दिखती हैं तो हमारा आत्मविश्वास धराशायी होने लगता है। हमारी सारी क्षमताएँ जवाब देने लगती हैं, हमारे अंदर घबराहट उत्पन्न हो जाती है एवं आत्मबल तार-तार होने लगता है। ऐसी परिस्थिति में धराशायी होती हुई आत्मिक क्षमताओं एवं शक्तियों को इस मनोवैज्ञानिक शक्ति द्वारा सहारा मिलता है और जब हमें इस बात का बोध होता है कि संकट की घड़ी में हमारी सहायता हेतु मानवीय सत्ता से ऊपर भी किसी सत्ता का अस्तित्व है, जो हमें सहायता दे सकती है तो हमारे अंदर एक विशेष मनोवैज्ञानिक शक्ति का उद्भव होता है जिसकी सहायता से हमारी आत्मिक क्षमताओं व शक्तियों का धराशायी होता हुआ महल अपनी पूर्ण स्थिति को प्राप्त हो जाता है।
आस्था, आत्मबल और अदृश्य शक्तियाँ: हमारे भीतर की असीमित क्षमताएँ
हमारा आत्मविश्वास ज्यों का त्यों बरकरार रह जाता है। हमें अपनी सारी क्षमताओं का पुनर्बोध होने लगता है। हमारी घबराहट दूर होती है एवं आत्मबल पुन लौट आता है। हमें पुन उस कार्य को या अन्य कार्य को करने का साहस भी प्राप्त होता है तथा उन कार्यों में सफलता की संभावनाएँ भी दिखने लगती हैं। फलवरूप कार्य में हमारी रूचि बढ़ जाती है और लगन तथा परिश्रम से कार्य करने के कारण सफलता की संभावनाएँ बहुत ही बढ़ जाती हैं। कभी-कभी व्यक्ति असाधारण शक्ति का प्रदर्शन करता है, जिसे कहा जाता है कि अमुक व्यक्ति में एकाएक दैवी शक्ति आ गई।
वास्तव में मानव खुद अनंत शक्तियों से समृद्ध हैं, लेकिन वह अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन उसी अनुपात में कर पाता है जिस अनुपात में उसे अपनी क्षमता का बोध हो चुका होता है। यहां अदृश्य शक्तियों में विश्वास रखने वाले अधिकांश व्यक्तियों के मन में यह धारणा घर कर जाती है कि संकट की स्थिति में दैवी शक्तियों का स्थानान्तरण मनुष्यों में हो जाता है ताकि वे उन संकटपूर्ण परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर सकें। व्यक्ति के मन में यह धारणा घर कर जाने के कारण ही कभी-कभी वह असीमित एवं अद्भुत शक्ति का परिचय देता है।
दैवी शक्तियों का प्रदर्शन: वास्तव में आत्मशक्ति का सशक्त बोध
दरअसल, यह अद्भुत शक्ति किसी दैवी-देवता की शक्ति नहीं होती बल्कि उस व्यक्ति की खुद की शक्ति होती है, चूंकि व्यक्ति को इस बात का विश्वास होता है कि संकटपूर्ण परिस्थिति में दैवी शक्ति का मानव के अंदर स्थानांतरण उसके सहायतार्थ हो सकता है और मानव दैवी शक्ति प्रदर्शित कर सकता है यानी उस व्यक्ति को इस बात पर विश्वास होता है कि मानव भी दैवी शक्तियों का प्रदर्शन कर सकता है, तभी वह इस प्रकार की शक्ति प्रदर्शित करता है।
यदि उस व्यक्ति को इस बात का अहसास न हो कि वह दैवी शक्ति भी प्रदर्शित कर सकता है या दैवी शक्ति के प्रदर्शन हेतु आवश्यक योग्यता एवं क्षमता उसके पास भी विद्यमान है तो वह किसी भी कीमत पर दैवी शक्ति का प्रदर्शन नहीं कर पाएगा। इसका मतलब यह कदापि नहीं कि व्यक्ति को सिर्फ दैवी शक्तियों में आस्था रखने के कारण ही ऐसा होता है। व्यक्ति के अंदर उसकी शक्तियों व क्षमताओं का बोध अन्य अभिप्रेरकों द्वारा भी हो सकता है और उस स्थिति में भी व्यक्ति उसी तरह की असीमित शक्ति को जो सामान्य से काफी ऊपर होती है, का प्रदर्शन कर सकता है। इस प्रकार दैवी शक्तियों में व्यक्ति का पूर्ण विश्वास रखना भी उसके लिए लाभदायक ही है। बशर्ते विश्वास में पूर्ण सत्यता हो।
अभय कुमार सिंह
