सबमें प्रभु परमात्मा के दर्शन

महापुरुष फ़रमाते हैं- “चश्म-ए-बीना हो तो हर ज़र्रे में है आसार-ए-दोस्त।”
(चश्म-ए-बीना अर्थात अंदर की आँख, आसार-ए-दोस्त अर्थात परमात्मा)।
इस सृष्टि के कण-कण में परमात्मा बसे हुए हैं, जिनके अनेक रूप हैं। वे इंसानों में भी हैं, जानवरों में भी, पशुओं में भी, पक्षियों में भी, पौधों में भी, मछलियों में भी और छोटे-से-छोटे अंश में भी हैं। जैसे इंद्रधनुष होता है, उसके कई रंग होते हैं और जब सफेद रंग प्रिज़्म से गुज़रता है तो इंद्रधनुष के सात रंगों में बिखर जाता है। ये इंद्रधनुष के सात रंग कहाँ से आए?
सफेद रंग से। जब वे सभी रंग जुड़ जाते हैं तो एक सफेद रंग बनता है। ऐसे ही प्रभु के अनेक रंग हैं। हमें ऐसे कई उदाहरण महापुरुषों के जीवन से देखने को मिलते हैं। जैसे स्वामी रामतीर्थ के रास्ते में एक बार साँप आ गया, तो वे उसकी आँखों में देखते रहे, क्योंकि उसमें वे प्रभु को देख रहे थे।
नामदेव महाराज बाटी बना रहे थे और उस पर घी लगा रहे थे। इतने में एक कुत्ता आया और बाटी उठाकर भाग गया। नामदेव उसके पीछे-पीछे भागे और कहने लगे- “हे प्रभु! आप रूखी बाटी मत खाइए।” क्योंकि उन्हें उस कुत्ते में भी प्रभु का रूप दिखाई दे रहा था।
प्रेम और आत्मचिंतन से मिलता है परमात्मा का सच्चा अनुभव
परमात्मा कण-कण में समाए हुए हैं। उन्हें हम कहीं पर भी बंद नहीं कर सकते। प्रभु असीम हैं, तो उन्हें हम कैसे पा सकते हैं? अगर परमात्मा को पाना है तो हमें प्रेम का रास्ता अपनाना होगा। हमें अपने अंदर प्रभु को पाने की कशिश पैदा करनी होगी। प्रभु को हम तब पाएँगे, जब हम कण-कण में प्रभु को देखना शुरू कर देंगे। उन्हें हम कैसे देखेंगे? पहले हम उन्हें अपने अंदर देखें। अगर अपने अंदर न देख सकें, तो प्रभु को हम कहीं और कैसे देख सकते हैं?
हम प्रभु को हर दिन, हर समय, हर घंटे, हर सेकंड, हर पल पा सकते हैं, क्योंकि वे कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही बैठे हैं। ये जो बाहर की आँखें हैं, जिनके ज़रिये हम प्रभु को देखना चाहते हैं, उनसे परमात्मा बहुत दूर है। उन्हें हम बाहर की आँखों से नहीं देख सकते। अगर उन्हें देखना है, तो हमें अंदरूनी आँख खोलनी होगी।

इसके लिए हमें किसी पूर्ण महापुरुष की मदद की ज़रूरत होती है, जो हमें ध्यान-अभ्यास के द्वारा हमारी अंदरूनी आँख खोल देते हैं। तब हमें कण-कण और ज़र्रे-ज़र्रे में प्रभु के दर्शन होने लगते हैं। यही बात महापुरुष फ़रमाते हैं- “चश्म-ए-बीना हो तो हर ज़र्रे में है आसार-ए-दोस्त।”
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