आनंद नीलकंठन से विशेष बातचीत: महिषासुर, AI, पुराण नई मिथकीय दुनिया
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में हुई एक खास बातचीत के दौरान आनंद नीलकंठन ने स्पष्ट किया कि उनका लेखन भारतीय पुराणों का महज़ पुनर्कथन नहीं, बल्कि उन कथाओं पर पुनर्विचार करने की एक रचनात्मक प्रक्रिया है। महिषासुर के ज़रिये वे ऐसी मिथकीय दुनिया गढ़ते हैं जहाँ देवी, असुर, देव और मनुष्य सभी अपने-अपने संदर्भों में सवाल खड़े करते हैं और किसी एक दृष्टिकोण को अंतिम सत्य नहीं माना जाता। उन्होंने कहा कि जब भारतीय पुराणों को AI, विज्ञान और आधुनिक वर्ल्ड-क्रिएशन के साथ जोड़ा जाता है, तो वे केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं रह जाते, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का संकेत बन जाते हैं। नीलकंठन के अनुसार, भारतीय कथाएँ आज भी उतनी ही जीवंत हैं जितनी हज़ारों साल पहले थीं ज़रूरत है तो बस उन्हें नए समय की भाषा और दृष्टि में देखने की। टेल ऑफ़ द वानक्विश्ड, अजय: रोल ऑफ़ द डाइस और बाहुबली: द बिगिनिंग जैसे कई बेस्टसेलर उपन्यासों के लेखक हैं। उनकी रचनाएँ भारतीय महाकाव्यों को वैकल्पिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती हैं और परंपरागत कथा-वाचन को चुनौती देती हैं।
वे एक प्रसिद्ध स्तंभकार, टेलीविज़न के लिए पटकथा लेखक और सार्वजनिक वक्ता भी हैं। भारतीय संस्कृति और मिथकों पर उनकी विशिष्ट दृष्टि उन्हें समकालीन साहित्य में अलग पहचान दिलाती है। उनकी नवीनतम कृति महिषासुर: कुमारीकंदम की कथा पराशक्ति के स्त्री स्वरूप की एक गहन खोज है। आनंद नीलकंठन की दुनिया में विज्ञान, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पुराणों की प्राचीन कथाओं से टकराती हैं और आधुनिक पाठकों के लिए भारतीय मिथकों को नए सिरे से गढ़ती हैं।
प्रश्न: आप अपनी नई पुस्तक महिषासुर के बारे में कुछ और बताइए। यह विचार कैसे जन्मा?
उत्तर: इस विचार की शुरुआत तब हुई जब मैंने देखा कि मेरे बच्चे मार्वल की दुनिया में ज़्यादा रुचि ले रहे हैं। जबकि मैंने बाहुबली जैसी रचनाएँ लिखी हैं, फिर भी वे मार्वल की ओर अधिक आकर्षित थे। तब मुझे लगा कि हमारे पुराणों और लोककथाओं में भी उतनी ही सशक्त कहानियाँ मौजूद हैं, जिन पर उसी स्तर की कल्पनात्मक दुनिया बनाई जा सकती है।
मेरी लगभग सभी पुस्तकों Asura सहित को काफी सराहना मिली और कई निर्देशक इन्हें फिल्मों में रूपांतरित करना चाहते थे, लेकिन समस्या बजट की थी। बाहुबली के लिए लिखी गई तीन पुस्तकों के संदर्भ में राजामौली सर ने कहा था कि इस तरह की कहानियों को परदे पर उतारने के लिए लगभग 5000 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी।

किताबों में आप कुछ भी कल्पना कर सकते हैं, लेकिन फिल्मों में उसे साकार करना कहीं अधिक कठिन होता है। अब AI के आने से यह संभव हो पाया है। आज हम भारत से ही अवतार और मार्वल जैसी वैश्विक फ्रेंचाइज़ को चुनौती दे सकते हैं।
यह एक वर्ल्ड-क्रिएशन है। मैंने तमिल पुराणों और लोककथाओं में वर्णित कुमारी कांडम की प्राचीन कथा को आधार बनाया है। मान्यता है कि यह एक ऐसा महाद्वीप था जहाँ मधुरा मीनाक्षी नामक पांड्य राजकुमारी का जन्म हुआ था, जिनके तीन स्तन थे। भविष्यवाणी थी कि जब उनका भावी पति उन्हें स्पर्श करेगा, तो तीसरा स्तन विलुप्त हो जाएगा और तभी उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होगा। उनके पति सुंदरेश्वर (शिव) थे और तब उन्हें यह बोध होता है कि वे स्वयं पार्वती हैं।
यह कथा शिवपुराण में भी मिलती है। शिव संगम के प्रथम प्रमुख माने जाते हैं, फिर ऋषि अगस्त्य आते हैं। यह संस्कृत परंपरा के समानांतर एक तमिल पुराणिक परंपरा है। मूल कथा देवी भागवत के समान है, किंतु उसका कथन भिन्न रूप में किया गया है। मैंने महिषासुर और असुर लोक को अलग-अलग दुनियाओं के रूप में कल्पित किया है।
पूरी सृष्टि को मैंने एक सिमुलेशन की तरह रचा है, जिसे माया कहा जा सकता है। केवल सत्यलोक वास्तविक है, जहाँ तीन ‘गेमर’ ब्रह्मा, विष्णु और महेश बैठे हैं। विष्णु इस सृष्टि के मेंटेनेंस इंजीनियर हैं, जिन्हें त्रुटि आने पर सिमुलेशन में प्रवेश करना पड़ता है यही उनके अवतार हैं। असुरों को मैंने AI द्वारा निर्मित प्राणी के रूप में देखा है, जो मनुष्यों से सूचना खींचते हैं और उसी से अधिक शक्तिशाली होते जाते हैं। इन सभी तत्वों को मिलाकर मैंने यह नई दुनिया रची है। यह तो बस शुरुआत है अभी 13 और लोकों की खोज बाकी है।
प्रश्न: तो क्या यह एक श्रृंखला है?
उत्तर: हाँ, यह श्रृंखला की पहली पुस्तक है।
प्रश्न: आपकी रचनाएँ पारंपरिक ‘अच्छे-बुरे’ की अवधारणा को चुनौती देती हैं। ऐसा दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा कहाँ से आई?
उत्तर: यदि आप पुराणों को ध्यान से देखें, तो वे कभी भी पूरी तरह श्वेत-श्याम नहीं रहे। यही कारण है कि रावण और दुर्योधन के मंदिर हैं। रावण को कई पुराणों में ‘रावण परब्रह्म’ कहा गया है। भागवत के अनुसार रावण स्वयं विष्णु का द्वारपाल था यह सब एक लीला है। समय के साथ हमने इस सूक्ष्मता को खो दिया और कथाओं को केवल अच्छे-बुरे में बाँट दिया। मैं उसी मूल, बहुस्तरीय दृष्टिकोण को वापस लाना चाहता था।

प्रश्न: आपकी पुस्तकों का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। क्या अनुवाद में मूल भाव खोने का डर नहीं रहता?
उत्तर: मैं दृश्यात्मक और कल्पनाशील लेखन पर ज़ोर देता हूँ। कुछ रचनाएँ विशेषकर कविता का अनुवाद कठिन होता है, क्योंकि उनमें भाषा की सुंदरता मुख्य होती है। लेकिन यदि कहानी सशक्त है, तो भाषा की सीमाएँ उसे कमज़ोर नहीं कर पातीं। रामायण और महाभारत को ही देखिए कितने लोगों ने उन्हें संस्कृत में पढ़ा है? फिर भी कथा हर भाषा और माध्यम में जीवित है।
मेरी पुस्तकें 41 भाषाओं में अनूदित हुई हैं जापानी, इंडोनेशियन, बर्मी, सिंहली सहित। कुछ चीज़ें अनुवाद में खो सकती हैं, लेकिन कहानी टिकती है।
प्रश्न: आज पढ़ने की आदत कम हो रही है। ऐसे में साहित्य का भविष्य आप कैसे देखते हैं?
उत्तर: कहानी कभी नहीं मरती, केवल उसका माध्यम बदलता है। मैं स्वयं को लेखक से अधिक एक कथाकार मानता हूँ। मैंने टेलीविज़न, OTT, फ़िल्म, रंगमंच, ऑडियो ड्रामा और कॉलम हर माध्यम में काम किया है।
कभी कविता प्रमुख माध्यम थी, आज वह सीमित पाठकों तक सिमट गई है। माध्यम बदलते रहते हैं, लेकिन यदि सामग्री सशक्त है, तो वह हर रूप में जीवित रहती है नाटक, फ़िल्म, सीरीज़, गेम या AI-निर्मित कंटेंट के रूप में।
प्रश्न: महिषासुर दक्षिण भारतीय पुराणों पर आधारित है। इसे अखिल भारतीय या वैश्विक स्तर पर कैसे देखते हैं?
उत्तर: मैं इसे केवल पैन-इंडिया नहीं, बल्कि पैन-ग्लोबल रूप में देखता हूँ। यह आज हो या 50 साल बाद महत्व यह है कि यह कहानी वैश्विक बनने की क्षमता रखती है। राजामौली, राजकुमार हिरानी, प्रियदर्शन और शेखर कपूर जैसे दृश्यात्मक कथाकार इससे आकर्षित हुए हैं। तकनीक के साथ-साथ इसकी संभावनाएँ भी बढ़ेंगी।

प्रश्न: युवा लेखकों और कथाकारों के लिए आपका संदेश?
उत्तर: पढ़िए, देखिए और जीवन में गहराई से जुड़िए। केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं, फ़िल्में, नाटक, संगीत, हर कला से जुड़ना ज़रूरी है। लेखन जीवन को देखने का परिणाम है।
एक लेखक हर चीज़ में कहानी देखता है गिरते पत्ते में भी।
प्रश्न: लेखन में AI के बढ़ते उपयोग को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर: AI को नकारा नहीं जा सकता। यह एक उपकरण है। जैसे मोबाइल फ़ोन किसी को फ़ोटोग्राफ़र नहीं बना देता, वैसे ही AI किसी को लेखक नहीं बनाता। मैं AI को साउंडिंग बोर्ड की तरह इस्तेमाल करता हूँ उसके सुझावों को जानने के लिए, ताकि मैं उनसे अलग और मौलिक लिख सकूँ। AI वही बढ़ाता है जो आप हैं यदि आप साधारण हैं, तो वह साधारणता बढ़ाएगा यदि आप सोचने वाले हैं, तो आपकी सोच को और गहराई देगा।

प्रश्न: यदि आप 2026 के भारत पर हिंदी अख़बार के लिए शीर्षक लिखें, तो वह क्या होगा?
उत्तर: मेरा मानना है कि उत्तर भारत में एक ‘लैंडलॉक्ड वर्ल्डव्यू’ है इसके अपने लाभ और सीमाएँ हैं। समुद्र से घिरे क्षेत्रों में व्यापार, विचारों और बदलाव का प्रवाह तेज़ होता है।
इतिहास बताता है कि सामाजिक सुधार तटीय क्षेत्रों में तेज़ी से हुए। उत्तर भारत में परंपरा मज़बूत है, लेकिन बदलाव धीमा।
यदि हिंदी भाषी क्षेत्र सामाजिक सूचकांकों में सुधार करे , स्वास्थ्य, शिक्षा, साक्षरता तो पूरे देश की गति बदल सकती है। यह उत्तर-दक्षिण विभाजन नहीं, बल्कि एक वास्तविक चिंता है।

नीलकंठन का यह विश्वास कि “कहानी कभी नहीं मरती, केवल उसका माध्यम बदलता है,” आज के डिजिटल और AI-युग में और भी प्रासंगिक हो जाता है। उनका दृष्टिकोण युवा लेखकों को यह संदेश देता है कि मौलिकता तकनीक से नहीं, बल्कि गहरी सोच और जीवन-बोध से जन्म लेती है। महिषासुर सिर्फ़ एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय मिथकों को वैश्विक मंच पर नए सिरे से स्थापित करने की एक महत्वाकांक्षी शुरुआत है।
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