कुप्रबंधन की भेंट चढ़ती आस्थावान ज़िंदगी
आज जरुरत इस बात की है कि राज्य सरकारें, स्थानीय प्रशासन, मंदिर प्रबंधन तंत्र और श्रद्धालुगण सभी अपनी जिम्मेदारियों को समझें। दर्शन के समय श्रद्धालुगणों का व्यवहार अत्यंत संयमित और सहनशील होना चाहिए। शीघ्र पहुंचने और दर्शन की जल्दबाजी में व्यवस्था को भंग करने से बचें। अफवाहों पर ध्यान न दें और दिशा-निर्देशों का समुचित पालन करें। सरकारी प्रशासन, मंदिर प्रबंधन तंत्र एवं धार्मिक आयोजकगण अफवाह फैलाने वाले शरारती तत्वों पर कड़ी निगरानी रखें। श्रद्धालुओं की जान-माल की सुरक्षा शीर्ष प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए।
बिहार राज्य के नालंदा जिले के शीतला माता मंदिर में मची भगदड़ में 8 लोगों की दर्दनाक मौत मंदिर प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन की कुप्रबंधन और घोर बदइंतजामी को उजागर करता है। जब मंदिर प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन अच्छी तरह अवगत था कि चैत्र माह के आखिरी मंगलवार को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ सकती है तो फिर सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किया गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह हादसा व्यवस्था की बदइंतजामी और कुप्रबंधन के कारण हुआ।
प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो हर कोई जल्दी दर्शन करना चाहता था जिससे बैरिकेड्स और कतारें टूट गई। लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरने लगे और भगदड़ मच गई। मरने वालों में अधिकांश महिलाएं हैं। अगर पर्याप्त मात्रा में सुरक्षाकर्मी उपलब्ध होते तो कतारें और बैरिकेड्स नहीं टूटते और न ही लोगों की जान जाती। यह पर्याप्त नहीं कि जिला प्रशासन एसएचओ को सस्पेंड कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लें।
हादसे की निष्पक्ष जांच और दोषियों को कड़ी सजा जरूरी
उचित होगा कि इस हादसे की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों को कड़ी सजा मिले। गौर करें तो यह पहली बार नहीं है जब कुप्रबंधन के कारण दर्शनार्थियों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। याद होगा अभी पिछले वर्ष ही 27 जुलाई को उत्तराखंड राज्य के हरिद्वार में मनसा देवी मंदिर की सीढ़ियों पर मची भगदड़ में आधा दर्जन लोगों की जान चली गई। पिछले वर्ष ही प्रयागराज कुंभ में मची भगदड़ में दर्जनों श्रद्धालुओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
एक जनवरी 2022 को जम्मू-कश्मीर राज्य के कटरा स्थित माता वैष्णो देवी के मंदिर में मची भगदड़ में भी एक दर्जन श्रद्धालुओं की जान गई थी। इसी तरह 14 जुलाई, 2015 को आंध्रप्रदेश राज्य के राजमंड्री में पुष्करम उत्सव के उद्घाटन समारोह में भगदड़ मचने से तकरीबन 27 श्रद्धालुओं की जान गयी। 3 अक्तूबर, 2014 को पटना के गांधी मैदान में दशहरा आयोजन में मची भगदड़ में 32 लोगों की जान गयी।
इलाहाबाद महाकुंभ और बिहार छठ पूजा में भगदड़ में कई मृतक
इसी तरह 13 अक्तूबर 2013 को मध्यप्रदेश राज्य के रतनगढ़ मंदिर में मची भगदड़ में 113 लोगों और कामतानाथ मंदिर में मची भगदड़ में एक दर्जन से अधिक श्रद्धालुओं की जान गयी। 11 फरवरी, 2013 को इलाहाबाद महाकुंभ के दौरान स्टेशन पर यात्रियों की भगदड़ में तीन दर्जन से अधिक लोगों को जान गंवानी पड़ी। 19 नवंबर 2012 को बिहार में गंगा नदी पर छठ पूजा के लिए बना अस्थायी पुल टुटने से 8 श्रद्धालुओं की मौत हो गयी।
8 नवंबर, 2011 को हरिद्वार के हर की पौड़ी घाट पर भगदड़ मचने से 20 लोगों की जान गयी। 14 जनवरी 2011 को मकर संक्रान्ति के पावन अवसर पर केरल के शबरीमला मंदिर में मची भगदड़ में तकरीबन 106 श्रद्धालुओं की मौत हुई। 3 अगस्त, 2008 को हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर स्थित नैना देवी के मंदिर में भीषण हादसा हुआ जिसमें 162 लोगों की जान गयी। 16 अक्तूबर 2010 को बिहार राज्य के बांका जिले के दुर्गा मंदिर में हादसे में 10 लोगों को जान गंवानी पड़ी।
14 अप्रैल 2010 को हरिद्वार में शाही स्नान के दौरान मची भगदड़ में 10 लोग मारे गए। 14 जनवरी 2010 को पश्चिम बंगाल के गंगासागर मेले में भगदड़ में आधा दर्जन लोगों की मौत हुई। इसी तरह 21 दिसंबर 2009 को राजकोट के धोराजी कस्बे में धार्मिक कार्यक्रम के दौरान भगदड़ में 8 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। 14 अप्रैल 1986 में हरिद्वार कुंभ मेले में हर की पौड़ी के ऊपर कांगड़ा पुल पर मुख्य स्नान के दौरान मची भगदड़ में 52 लोगों को काल का ग्रास बनना पड़ा।
3 फरवरी 1954: इलाहाबाद कुंभ में भगदड़ में 800 की मौत
3 फरवरी 1954 को इलाहाबाद कुंभ मेले में भगदड़ मचने से लगभग 800 लोगों की जान गयी। इसी तरह झारखांड राज्य के देवघर में ठाकुर अनुकूल चंद की 125 वीं जयंती पर दो दिवसीय सत्संग में मची भगदड़ में कई श्रद्धालुओं को जान से हाथ धोना पड़ा। गत वर्ष पहले उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी में जय गुरुदेव संस्था की ओर से निकाली गयी शोभा यात्रा में राजघाट पुल पर मची भगदड़ में 25 से अधिक लोगों की दर्दनाक मौत हुई।
उत्तर प्रदेश के ही प्रतापगढ़ के मनगढ़ स्थित कृपालु महाराज के आश्रम, जोधपुर के चामुंडा देवी मंदिर और महाराष्ट्र के मांधरा देवी मंदिर में भी इस तरह के भयानक हादसे हो चुके हैं। देखा जाए तो इन सभी धार्मिक स्थलों पर हुए हादसे के लिए पूर्ण रुप से शासन-प्रशासन, मंदिर प्रबंधन तंत्र और श्रद्धालुओं की अनुशासनहीनता ही प्रमुख रूप से जिम्मेदार रही है। लेकिन हैरानी की बात यह कि हर हादसे में शासन-प्रशासन और मंदिर प्रबंधन तंत्र अपनी गलतियां स्वीकारने के बजाए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराता नजर आता है।
नतीजतन लापरवाही के लिए दोषी और जिम्मेदार लोग आसानी से बच निकलने में कामयाब होते हैं। सच तो यह है कि जब तक राज्य प्रशासन, मंदिर प्रबंधन तंत्र और धार्मिक उत्सवों के आयोजकगण अपनी महती जिम्मेदारियों का समुचित निर्वहन नहीं करेंगे तब तक इस तरह के हादसे होते रहेंगे। हादसों के उपरांत अक्सर राज्य सरकारों और आयोजकों द्वारा भरोसा दिया जाता है कि भविष्य में ऐसे हादसे पुन नहीं होंगे। लेकिन इस भरोसे के बावजूद भी हादसे टाले नहीं टलते।
हादसों के लिए जिम्मेदार तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई न होना
सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर क्यों? क्या राज्य सरकारें और आयोजकगण हादसों को लेकर गंभीर और संवेदनशील नहीं होते हैं? या यह समझा जाए कि हादसों के लिए जिम्मेदार तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का न होना है? गौर करें तो ये दोनों ही बातें सच हैं। अगर सरकारी अमला, मंदिर प्रबंधन तंत्र और आयोजकगण अपनी जिम्मेदारियों का सही निर्वहन करें तो इस तरह के हादसों की पुनरावृत्ति नहीं होगी।
ध्यान देना होगा कि देश में बहुतेरे मंदिर हैं जहां लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। इन स्थानों पर सुरक्षा और संभावित हादसों को टालने का पूरा इंतजाम होना चाहिए। उदाहरण के तौर पर मां वैष्णो देवी के मंदिर की ही बात करें तो यहां आम दिनों में 25 से 30 हजार श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। नवरात्र एवं अन्य पुनीत अवसरों पर यह भीड़ लाखों तक पहुंच जाती है। इसी तरह असम के कामाख्या मंदिर में हर रोज 5 हजार, अजमेर शरीफ में 15 हजार, तिरुपति के बालाजी मंदिर में 80 हजार और स्वर्ण मंदिर अमृतसर में तकरीबन एक लाख श्रद्धालुगण आते हैं।
उचित होगा कि इन धार्मिक स्थानों पर दर्शन कराने की समुचित व्यवस्था हो और सुरक्षा बलों की उपस्थिति हो। भीड़ के बेहतर प्रबंधन के लिए बैरीकेड की समुचित व्यवस्था के साथ-साथ प्रवेश व निकास के लिए अलग-अलग मार्ग हो। रास्ते में श्रद्धालुओं के आराम की पर्याप्त व्यवस्था के साथ-साथ लोगों पर नजर रखने के लिए सेवादार और राज्य का खुफिया तंत्र मजबूत हो। क्या उचित नहीं होगा कि देश के सभी मंदिर इस तरह की व्यवस्था से लैस हों? लेकिन ऐसा क्यों नहीं हो रहा है यह हैरान करने वाला है।
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राज्य सरकार और मंदिर प्रबंधन को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए
आज जरुरत इस बात की है कि राज्य सरकारें, स्थानीय प्रशासन, मंदिर प्रबंधन तंत्र और श्रद्धालुगण सभी अपनी जिम्मेदारियों को समझें। दर्शन के समय श्रद्धालुगणों का व्यवहार अत्यंत संयमित और सहनशील होना चाहिए। शीघ्र पहुंचने और दर्शन की जल्दबाजी में व्यवस्था को भंग करने से बचें। अफवाहों पर ध्यान न दें और दिशा-निर्देशों का समुचित पालन करें। सरकारी प्रशासन, मंदिर प्रबंधन तंत्र एवं धार्मिक आयोजकगण अफवाह फैलाने वाले शरारती तत्वों पर कड़ी निगरानी रखें।

श्रद्धालुओं की जान-माल की सुरक्षा शीर्ष प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए। इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि देश के प्रसिद्ध धर्मस्थल और तीर्थस्थान आतंकियों के निशाने पर हैं। आतंकियों द्वारा अनेकों बार मंदिरों पर हमला किया जा चुका है। इससे निपटने के लिए राज्य सरकारों को अपना खुफिया तंत्र मजबूत करना चाहिए। धर्मस्थलों और आयोजनों में श्रद्धालु सुरक्षित रहें इसके लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों को समन्वयकारी दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए। यहां समझना होगा कि भारत विभिन्न धर्मों, संप्रदायों और मतावलंबियों वाला एक महान आस्थावान देश है। यहां पर वर्ष भर धार्मिक आयोजनों का सिलसिला चलता रहता है। ऐसे में श्रद्धालुओं की सुरक्षा शासन-प्रशासन और मंदिर प्रबंधन की शीर्ष प्राथमिकता में शुमार होना चाहिए।
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