सर्व हितकारी है क्षमा

सृष्टि की चौरासी लाख योनियों में एकमात्र मनुष्य में ही क्षमा का गुण है, लेकिन इस गुण का वह सदुपयोग करे या न करे, वह उसकी स्वतंत्र इच्छा है। विश्व के सभी धर्मों में क्षमा का बहुत महत्व माना गया है। इससे सिद्ध होता है कि हर धर्म और हर स्थान में क्षमा गुण के सकारात्मक परिणाम देखे गए हैं। इसीलिए सभी ने इसे अपनाने के लिए कुछ सिद्धांत बनाए हैं।

क्षमा के दो पहलू हैं- एक- क्षमा याचना और दूसरा- क्षमादान। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और मानवता के उत्थान में सहयोगी हैं। अपने दैनिक जीवन में आचार-व्यवहार करते समय कई बार हम आहत होकर दुःखी हो जाते हैं और मन में गांठ बनाकर उसी के बारे में चिंतन-मनन करते रहते हैं। इससे हमारे मन में बेचैनी और व्याकुलता बढ़ती है तथा हमारी कार्य क्षमता और निर्णय क्षमता में कमी आती है।

क्षमा से मिटता अहंकार, रिश्तों में लौटता स्नेह और शांति

जिससे हमारा मन आहत हुआ है, उस व्यक्ति के प्रति हमारे मन में नकारात्मक तरंगें उत्पन्न होती हैं जिससे हमारे स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए हमारे प्रति किसी का व्यवहार ठीक नहीं है तो उसका कोई ना कोई कारण अवश्य होगा, जो हमें ज्ञात नहीं है, ऐसा समझ कर उसे क्षमा करना चाहिए। इससे हम सदा सुखी रहते हैं। वैज्ञानिक सत्य भी यही है कि बिना कारण के कुछ नहीं होता।

क्षमादान हमें समाधान की ओर ले जाता है और समाधान से समाधि का अनुभव होता है। क्षमा याचना सौ समस्याओं का एक समाधान है। ज्यादातर समस्याएं अहंकार के कारण उत्पन्न होती हैं और क्षमा याचना में इतनी ताकत होती है कि उससे पत्थर को भी पिघलाया जा सकता है। अपनी गलतियों के लिए बिना किसी संकोच के हमें सामने वाले से क्षमा मांग लेनी चाहिए और कई बार गलती न होने पर भी सामने वाले के अहंकार को संतुष्ट करने के लिए भी हमें सामने से क्षमा मांग लेनी चाहिए, इसी में सबकी भलाई है।

जब हम क्षमा मांगते हैं तो सामने वाले के मन में हमारे प्रति जो दुर्विचार-दुर्भाव रहते हैं, वे सब मिट जाते हैं, उसके हृदय में हमारे प्रति और हमारे हृदय में उसके प्रति प्यार उमड़ने लगता है। कई बार सामने वाले से अपमान का व्यवहार करवा कर परमात्मा हमारे प्रारब्ध काटता है और हमारे स्वास्थ्य तथा जीवन की रक्षा करता है, लेकिन अज्ञानता वश हमें इसका कभी आभास नहीं हो पाता है।

सभी से क्षमा याचना: ब्रह्मभाव से जीवन और वातावरण सुधरता है

हम दूसरे के दुर्व्यवहार को ही दोष देते हैं, जबकि हमें मन ही मन सामने वाले के व्यवहार के लिए उस व्यवहार से और उस व्यक्ति से क्षमा मांगनी चाहिए कि हमारे उद्धार के लिए उसको इतना कष्ट उठाना पड़ा और दुर्व्यवहार करना पड़ा। आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हुए जब गुरु कृपा से हमारा यह ज्ञान पक्का हो जाता है कि सब कुछ केवल ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है तब हमें न केवल मनुष्यों से अथवा अन्य जीवों से बल्कि निर्जीव वस्तुओं, परिस्थितियों आदि से भी समय-समय पर क्षमा याचना अवश्य करनी चाहिए।

जल, वायु, अग्नि, आकाश और धरती से प्रतिदिन क्षमा याचना करनी चाहिए कि हम अपने जीवन यापन के लिए इन पांच तत्वों को कितना प्रदूषित कर रहे हैं और कष्ट पहुंचा रहे हैं। हमें सचेत रहना है कि सभी सजीव और निर्जीव को क्षमादान देकर या उनसे क्षमा-याचना करके किसी अन्य पर कोई उपकार नहीं करते बल्कि सबसे बड़ा उपकार हम स्वयं पर करते हैं।

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सद्गुरु रमेश

क्षमा का आध्यात्मिक रहस्य यही है कि संपूर्ण ब्रह्मांड में ब्रह्म के अलावा कुछ है ही नहीं तो हम किसी के प्रति अपने मन में कोई अन्य भाव क्यों रखें केवल ब्रह्म भाव ही रखें। जब हम ब्रह्म भाव में रहते हैं तो क्षमा याचना और क्षमादान स्वत: ही हमारे भीतर घटित होते हैं जिससे सबका कल्याण होता है और वातावरण आनंदमय रहता है।

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