निविदा पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार सरकार का : उच्च न्यायालय

हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट करते हुए कहा कि निविदाओं के मामले पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार सरकार को ही है। पक्षपात, दुर्भावना या वैधानिक रूप से अवैध क्रियाकलाप नजर आते हैं, तब निविदा प्रक्रिया में अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। इसके पूर्व जारी निविदा को रद्द कर नई निविदा के लिए अधिसूचना जारी करने का अधिकार निविदा प्राधिकरण को है।

गोदावरी पुष्कर के तहत वेमुलवाड़ा को शामिल करते हुए 50 करोड़ रुपये की लागत से सड़क विस्तारीकरण के कार्यों के संबंध में निविदा प्रक्रिया को लेकर श्री श्रीनिवास कंस्ट्रक्शन्स ने अदालत की शरण ली। उनके द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर एकल सदस्य न्यायाधीश ने यह कहकर याचिका खारिज कर दी कि निविदा प्रक्रिया में अदालत का हस्तक्षेप सीमित है। इस फैसले को लेकर संस्था की ओर से दो सदस्य खण्डपीठ के समक्ष अपील की गई। अपील पर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अपरेश कुमार सिंह और जस्टिस जी.एम. मोहियुद्दीन की खण्डपीठ ने सोमवार को सुनवाई की।

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चोप्पादंडी से मल्याल क्रॉस तक सड़क विस्तार हेतु निविदा आमंत्रित

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने दलील देते हुए बताया कि चोप्पादंडी मंडल के अर्नाकोंडा से मल्याल क्रॉस रोड तक 35 किलोमीटर सड़क और वेमुलवाड़ा से सिरिकोंडा तक सड़क विस्तारीकरण के कार्य हेतु नवंबर-2025 को सरकार ने निविदाएँ आमंत्रित की, लेकिन आमंत्रित निविदाओं को रद्द करते हुए और संशोधन कर इस वर्ष पुन नई निविदाएँ आमंत्रित की गई। इसके पूर्व निविदाओं में कार्य की समयसीमा 18 माह निर्धारित की गई थी और आमंत्रित नई निविदा में इसे घटाकर 12 माह कर दिया गया। इसके अलावा निविदा लागत में भी वृद्धि की गई।

प्रतिवाद करते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता तेरारजनीकांत रेड्डी ने कहा कि गोदावरी पुष्कर के कार्यों को तेजी से पूरा करने के उद्देश्य से ही सड़क विस्तारीकरण के कार्य की सीमा को घटाया गया। उन्होंने बताया कि निविदा पर निर्णय लेने का सरकार को पूर्ण अधिकार है और इस मामले में सरकार ने किसी के अनुकूल कार्य नहीं किया और इसका कोई सबूत भी नहीं है। दोनों पक्षों की दलील सुनने के पश्चात खण्डपीठ ने इस मामले पर एकल सदस्य न्यायाधीश द्वारा दिए गए फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण न होने का हवाला देते हुए अपील खारिज कर दी।

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