ग्रीनलैंड ? यह लो दस प्रतिशत का थप्पड़ !

अमेरिका के डीलमेकर-इन-चीफ (अर्थात, डोनाल्ड ट्रंप) ने फिर से अपनी जादूगरी दिखाई! ग्रीनलैंड के मुद्दे पर यूरोपीय देशों को 10 प्रतिशत टैरिफ का थप्पड़ मारकर, जो जल्द ही 25 प्रतिशत की लात में बदल सकता है। ग्रीनलैंड न हुआ, कोई सुपरमार्केट का सामान हो गया। ट्रॉली में डालें; और चलते बनें! 2019 से चली आ रही खरीदारी की यह ट्रंपेच्छा अब नाटो सहयोगियों- डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स, फिनलैंड और यूके – को सैनिक तैनाती से डराने की कोशिश में बदल चुकी है। बहाना? अमेरिका की सुरक्षा!

आर्कटिक के बेहद अहम मिसाइल और खनिज हथियाये बिना ट्रंप महोदय चैन की नींद नहीं सो सकते न! लेकिन, समूचा यूरोप जिस तरह नहीं कहकर खड़ा हो गया है, उसकी महाचौधरी को शायद भनक न थी। पर अब तो तीर कमान से निकल चुका; और खुद ट्रंप की इज़्ज़त पर बन आई लगती है! ग़ौरतलब है कि इस नाटक के नेपथ्य में ट्रंप महोदय की अमेरिका फर्स्ट – या कहें अमेरिका ऑनली – नीति का खेल चल रहा है।

नाटो की परीक्षा: ब्लैकमेल आरोप और यूरोप की ‘ना’

ट्रंप के लिए दुनिया एक बड़ा बाजार है; और सहयोगी सिर्फ बारगेनिंग चिप्स। ग्रीनलैंड, डेनमार्क का स्वायत्त टुकड़ा, अब ट्रंप के सपनों का आइपीम कोन बन गया है। जलवायु परिवर्तन से पिघलते समुद्री रास्तों और खनिजों का लालच! ट्रंप चिल्लाते हैं – यूरोप नाटो में पैसे नहीं डालता! स्कूल के बच्चे होमवर्क नहीं कर रहे! ऐसे में अगर सयाने कहें कि ट्रंप की दंडात्मक टैरिफ नीति ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को सर्कस बना छोड़ा है, तो शायद ही ग़लत हो!

यूरोपीय संघ ने 93 अरब यूरो के जवाबी टैरिफ तैयार कर लिए, अमेरिकी कंपनियाँ चीख रही हैं, स्टॉक गिर रहे हैं। और अमेरिकी उपभोक्ता? वह तो बस अपने राष्ट्रपति की अप्रत्याशित सनकों की ऊँची कीमतें चुकाने के लिए अभिशप्त है! ट्रंप के हर टैरिफ से अंतत उसकी जेब पर ही तो डाका पड़ता है। राजनीतिक रूप से, नाटो की एकता अब एक चुटकुला बनकर रह गई है। यूरोपीय नेता इसे ब्लैकमेल कहते हैं। डेनिश प्रधानमंत्री की हँसी बहुत कुछ कहती है- हम झुकेंगे नहीं! क्या ट्रंप का चेहरा इतना विदूषकीय हो चुका है कि देखते ही लोग हँसने लगें!

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अल्पकालिक जीत का भ्रम और अमेरिका की गिरती साख

कूटनीति की बात करें, तो शायद ही किसी को ट्रंप महोदय का यह कृत्य औचित्यपूर्ण लगे। महाचौधरी के महाचमचों की बात अलग है। जैसे कोई गुंडा प्लेग्राउंड में छोटे बच्चों से खिलौने छीन रहा हो! यह कैसे भूला जा सकता है कि नाटो सहयोग पर टिका है, न कि टैरिफ पर। ट्रंप सहयोगियों को दुश्मन बना रहे हैं। साथ ही, रूस और चीन को पॉपकॉर्न देकर बहलाने की कोशिश भी जारी है। इस तमाम उठापटक में जिस एक चीज़ का सबसे बड़ा नुकसान हुआ है, वह है अमेरिका की विश्वसनीयता! पर ट्रंप नहीं मानेंगे। न मानने का ही तो दूसरा नाम अब ट्रंप है न? सुपरपावर – जो संप्रभुता को खरीदना चाहती है – येन केन प्रकारेण!

राजनीतिक दृष्टि से, घरेलू स्तर पर ट्रंप कठोर दिखते हैं; उनके फैनबेस ताली बजा रहे हैं। वैश्विक कुश्ती चल रही है न! अलगाववाद का उत्सव- जहाँ अमेरिका टैरिफ किंग बनकर अपनी इज़्ज़त की बारात निकाल रहा है! कहीं यह औपनिवेशिक दौर का उत्तर आधुनिक अवतार तो नहीं? ग्रीनलैंड के निवासियों की स्वायत्तता छीनने के लिए ट्रंप महोदय का राष्ट्रीय सुरक्षा का बहाना बेहद झीना है; सरासर अनैतिक है।

कुल मिलाकर, ट्रंप का यह ऐलान अल्पकालिक विन का ऐसा भ्रम है, जो दीर्घकालिक हार का रास्ता खोलता है। वैश्विक सहयोग की जगह बाज़ार की इस अखाड़ेबाज़ी में नैतिकता और कूटनीति बस दर्शक हैं। जबकि दुनिया को ऐसे लीडर की ज़रूरत है जो पुल बनाए, न कि सर्कस का जोकर बने।

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