भारत की परमाणु ऊर्जा यात्रा का स्वर्णिम सोपान

तमिलनाडु के कलपक्कम में 6 अप्रैल, 2026 को शाम 8:25 बजे प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) ने क्रिटिकलिटी हासिल कर ली। यह पूरी तरह स्वदेशी डिजाइन और निर्माण का चमत्कार है। भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (भाविनी) की टीम ने इसे बनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सही ही इसे भारत की नागरिक परमाणु यात्रा में निर्णायक कदम बताया। इस उपलब्धि के पीछे दशकों की मेहनत, वैज्ञानिकों का जुनून और एक दूरदर्शी सपना है। सरल शब्दों में समझें तो यह भारत के ऊर्जा-भविष्य की नींव है।

असल में, पीएफबीआर एक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर है। सामान्य रिएक्टर यूरेनियम जलाते हैं और बिजली बनाते हैं। लेकिन यह रिएक्टर यूरेनियम-238 को प्लूटोनियम-239 में बदलता है और जितना ईंधन खाता है, उससे ज्यादा पैदा करता है। यानी यह ईंधन ब्रीड (पैदा) करता है। भारत के पास यूरेनियम कम है, लेकिन थोरियम भंडार दुनिया में सबसे ज्यादा है। यह रिएक्टर उस थोरियम को उपयोगी ईंधन बनाने का पुल है। 500 मेगावॉट बिजली पैदा करने वाला यह रिएक्टर अब स्व-स्थायी परमाणु प्रतिक्रिया चला रहा है। (इसे ही क्रिटिकलिटी हासिल करना कहा जाता है।) पूरा बिजली उत्पादन शुरू होने में कुछ महीने और लगेंगे। लेकिन राह साफ हो गई है।

आयात निर्भरता घटाकर ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती

कहना न होगा कि मध्यपूर्व में छिड़े युद्ध से पैदा हुए ऊर्जा संकट के दौर में, इस उपलब्धि का महत्व बहुत गहरा है। आज भारत की ज्यादातर परमाणु बिजली प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (पीएचडब्ल्यूआर) से आती है। पीएफबीआर अगले चरण का मूल प्रारूप है। सफल होने पर यह ईंधन की कमी दूर करेगा, आयात पर निर्भरता घटाएगा और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा। जलवायु परिवर्तन के दौर में यह साफ ऊर्जा का बड़ा स्रोत बनेगा।

नेट-जीरो 2070 के लक्ष्य को पाने में मदद करेगा। आर्थिक रूप से भी फायदा है। सस्ती और लगातार बिजली से उद्योग बढ़ेंगे, रोजगार बढ़ेंगे। सबसे बड़ी बात यह कि भारत परमाणु ईंधन चक्र में आत्मनिर्भर होगा। कोई विदेशी मदद नहीं, सब अपना! सयानों की मानें तो भविष्य की दिशा और भी रोमांचक है। पीएफबीआर के अनुभव से दो और 600 मेगावॉट के फास्ट ब्रीडर रिएक्टर बनाने की योजना है।

इनके बाद तीसरा चरण शुरू होगा – थोरियम-आधारित रिएक्टर। भारत के समुद्र तट पर थोरियम की रेत भरी पड़ी है। इसे ईंधन बनाकर हम सैकड़ों साल तक बिजली बना सकते हैं। सरकार का 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा का लक्ष्य अब ह़क़ीकत नज़र आने लगा है। इससे कोयला-आधारित बिजली पर बोझ कम होगा, प्रदूषण घटेगा और अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। वैज्ञानिक अब सुरक्षा, दक्षता और लागत कम करने पर काम करेंगे।

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परमाणु उपलब्धि पर श्रेय लेने की राजनीतिक होड़

लेकिन इस खुशी के बीच एक अफसोस की बात भी है। श्रेय लेने की राजनैतिक रस्साकशी! प्रधानमंत्री ने वैज्ञानिकों को बधाई दी, तो कुछ नेता इसे अपनी सरकार की उपलब्धि कहकर उछलने लगे। वहीं विपक्ष दशकों पुरानी नीतियों का जिक्र कर अपना श्रेय जताने लगा। इस होड़ को छोड़कर यह याद रखना बेहतर होता कि डॉ. होमी भाभा ने 1950 के दशक में तीन-चरणीय कार्यक्रम की नींव रखी। उसके बाद कई सरकारें आईं-गईं।

एफबीटीआर से लेकर पीएफबीआर तक का सफर 40 साल का है। इसमें हर दौर के वैज्ञानिक, इंजीनियर और कर्मचारी लगे रहे। राजनेता जब-जब श्रेय की होड़ में लगते हैं, तब असली हीरो – वैज्ञानिक – पीछे छूट जाते हैं। जबकि ऐसी उपलब्धियाँ राष्ट्रीय होती हैं। इसलिए इनकी सराहना दलगत राजनीति से ऊपर उठकर की जानी चाहिए।

अंततः, कलपक्कम की यह चिंगारी एक रिएक्टर की नहीं, पूरे देश की उम्मीद की चिंगारी है। इससे युवा वैज्ञानिकों को प्रेरणा मिलेगी। आत्मनिर्भर भारत का सपना और मजबूत होगा। भारत की यह उपलब्धि गर्व का विषय है। यह न सिर्फ ऊर्जा-क्रांति है, आत्मविश्वास की नई कहानी भी है। अतः देश के अप्रतिम मेधावी वैज्ञानिकों को नमन!

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