हृदय ही ब्रह्म

हृदय शब्द की यह व्याख्या करते हुए बृहदारण्यक उपनिषद् कहता है कि हमारा हृदय ही ब्रह्म है, यही प्रजापति है अर्थात् यही सब कुछ है। दूसरे शब्दों में कहें तो हृदय इस मनुष्य जीवन का संचालक है। इसकी तीन संतानें हैं- देव, मनुष्य और असुर।
पहली संतान है- देव। देव संयमी होते हैं। ये सदा ही मनुष्य को संयम करना सिखाते हैं, मर्यादा का पालन करने की शिक्षा देते हैं। ये मनुष्य को खान-पान और आचार-व्यवहार आदि हर स्थान में जीवन को संतुलित रखने के लिए प्रेरित करते रहते हैं।

जो लोग अपनी जीवन शैली नियमानुसार चलाते हैं, उन्हें दुःखों और कष्टों का सामना अपेक्षाकृत कम करना पड़ता है। उनका खान-पान ऋतु के अनुसार होता है, वे समय पर सोते हैं और जागते हैं। वे सदा स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हैं। दूसरी संतान है- मनुष्य। ये कभी देवों की तरह संयमी बन जाते हैं तो कभी असुरों की तरह क्रूर। इनका ढुलमुल रवैया इन्हें स्वयं का मित्र और शत्रु बना देता है।

असंयमित जीवनशैली से बढ़ता रोग और कष्ट

जब ये दैवीवृत्ति की तरह स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हैं तो अपने मित्र बन जाते हैं, उस समय उनका शरीर नीरोग रहता है। परन्तु यदा-कदा असुरों की तरह अपने प्रति लापरवाह हो जाते हैं तो सभी नियमों की अनदेखी करते हैं। उस समय शरीर रोगी हो जाता है और मनुष्य कष्ट पाता है। डॉक्टरों के पास इलाज के लिए जाता हुआ निश्चित ही धन व समय की बर्बादी करता है। इसकी तीसरी संतान है- असुर। वे हर नियम और हर बंधन को तोड़ने के पक्षधर होते हैं।

उनका वश चले तो सारे प्रयोग इसी जीवन में अपने शरीर पर कर देंगे। मानव शरीर में जब आसुरी वृत्ति बलवती हो जाती है तब आँख, नाक, कान, जिा आदि सभी इंद्रियाँ बेलगाम घोड़ों की तरह ही अनियंत्रित हो जाती हैं। सबकी मनमानी इस अमूल्य शरीर का सत्यानाश कर देती है। खाने-पीने, सोने-जागने यानी आहार-विहार में हर तरह की लापरवाही हमारे हृदय की गति के लिए घातक बन जाती है। यह शरीर प्रतिदिन रोगों का घर बनता जाता है।

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एक समय ऐसा भी आता है, जब मनुष्य ईश्वर से प्रार्थना करने लगता है कि वह इस शरीर से उसे मुक्त कर दे। वह अब इन रोगों से और अधिक लड़ने में समर्थ नहीं है। अपने इस हृदय रूपी ब्रह्म या प्रजापति को सम्मान देना हमारा कर्त्तव्य है। इसकी चिन्ता और सुरक्षा ही हमारे स्वस्थ जीवन की कुँजी है। इसलिए किसी भी प्रकार की असावधानी हमारे जीवन में सेंध लगा सकती है। इससे सदा बचना चाहिए और सजग रहना चाहिए।

चन्द्र प्रभा सूद

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