अगर न्याय और पुनर्निर्माण में पिछड़े ..तो फिर जिंदा हो सकता है माओवाद !
दुनिया का सबसे लंबे समय से चल रहा माओवादी उग्रवाद का खात्मा तकरीबन हो चुका है। लेकिन नक्सलवाद इससे पहले भी एक बार लुप्तप्राय, सुप्तप्राय होकर जिंदा हो चुका है। इसलिए असली लड़ाई इसके बाद की है। आदिवासी क्षेत्रों के पुनर्निर्माण और न्याय तथा सम्मान की लड़ाई। यदि जंगल से माओवाद खत्म होने के बाद वहां केवल जेसीबी मशीनें ही दिखेंगी, तो फिर असंतोष पनप सकता है। क्योंकि अभी भी नक्सल विचारधारा से सहानुभूति रखने वाले ग्रामीण और आदिवासी मौजूद हैं। नक्सलवाद खत्म हो जायेगा मगर विचारधारा जिंदा रहती है, वह फिर हिंसक या अहिंसक रूप में उठ खड़ी हो सकती है।
नक्सलवाद का नामोनिशान मिटाने की अंतिम समय सीमा 31 मार्च 2026 बीत गई है। 24 अगस्त 2024 को जब गृहमंत्री अमित शाह ने इसका ऐलान किया था, तो बहुतों ने इसे रणनीतिक लक्ष्य के बजाय राजनीतिक बयानबाजी बताया था। इसमें कोई शक नहीं कि अगले कुछ महीने भी कुछ माओवादी विद्रोही बने रहेंगे, लेकिन 30 मार्च 2026 को अमित शाह का यह दावा सही लगता है कि सरकार नक्सलवादियों के खिलाफ ऐतिहासिक जीत हासिल कर चुकी है।
अब आधिकारिक तौरपर 50 से कम जबकि अनाधिकारिक तौरपर 130 से 150 नक्सलवादी और उनके दो बड़े कमांडर शेष हैं। मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति अगर नेपाल फरार नहीं हुआ तो जल्द सरेंडर करेगा, फिर इस जंग में जीत की आधिकारिक घोषणा जायज होगी। साल 2010 के आसपास यह संघर्ष अपने चरम पर था, तब देश के एक-तिहाई जिलों में 20,000 नक्सली लड़ाके सक्रिय थे, ऑपरेशन ग्रीन हंट के बावजूद उन्होंने दंतेवाड़ा में 76 जवान शहीद किए थे। 2017 में राजनाथ सिंह ने 6 सूत्रीय समाधान कार्यक्रम इनके सफाये के लिए बनाया पर स्थिति संभली नहीं। पर उसके बाद साल 2019 से 2026 के बीच 7049 नक्सली गिरफ्तार किए गए और 5880 ने आत्म समर्पण किया।
तेलंगाना-छत्तीसगढ़ सीमा पर 23 मई 2025 को ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट के दौरान कई हार्डकोर नक्सलियों की मौत ने उनकी कमर तोड़ दी। इसी साल कई कमांडरों के साथ 317 नक्सली मारे गए, 800 पकड़े और 2300 ने सरेंडर किया। सुरक्षा बलों ने 2024 के बाद से 748 गुरिल्लाओं को मारकर कीर्तिमान बनाया। इन सबके चलते बीते महीने तक, माओवादी गतिविधियों वाले जिलों की संख्या 800 से घटकर केवल सात रह जाना इस सफलता का पुख्ता सबूत है।
पहले तीन महीनों में 700 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया
इस बरस के पहले तीन महीनों में ही तकरीबन 700 नक्सलवादियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का विकल्प चुना। नक्सल प्रभावित इलाकों की गलियों से लाल झंडे उतर रहे हैं, यह सुरक्षा बलों के कारनामों के अलावा इसलिए भी कि जो माओवादी कभी आदिवासियों के तारणहार नजर आते थे विगत कुछ वर्षों से उनके चैन व सुकून के दुश्मन लगने लगे।
आदिवासियों को शुरुआत में उनकी विचारधारा भाई पर बहुत बाद में समझ आया कि उन्होंने उनके जल, जंगल, जमीन कब्जाने वाली बड़ी परियोजनाओं और बांधों वगैरह के निर्माण से बचाने के नाम पर उनको अपने जाल में फंसाकर आदिवासी समुदाय को अपना मोहरा बनाया और विकास से वंचित रखा। उनका जंगल राज कोई ाढांतिकारी स्वप्न नहीं बल्कि अब एक दमनकारी कारावास है।
स्वास्थ्य केंद्रों और सड़कों के निर्माण की सरकारी कोशिशों को रोकना, उनके बच्चों को पांचवी से ज्यादा की शिक्षा से मना करना ताकि वे उनके पैदल सैनिक से ज्यादा कुछ न बन सकें। संगठन में आए और शादी करो तो नसबंदी भी करवाओ,कंगारू अदालतों द्वारा असहमत को मौत जैसे नियमों ने उन्हें आदिवासियों के दिल से उतार दिया। उन्हें लगने लगा कि राजनेताओं और पुलिस को उड़ाने, खनन परियोजनाओं में तोड़-फोड़, मोबाइल फोन टावरों को आग लगाने के पीछे उनके निहित स्वार्थ हैं।
यह भी पढ़ें… युद्ध के बीच मनुष्य
आरंभिक नक्सलवाद अब लूट और खौफ का तंत्र बन गया
वे समझ चुके थे कि आरंभिक नक्सलवाद भले विचारधारा रही पर अब यह लूट, सांठ-गांठ और खौफ का तंत्र बन गया है। वे मानने लगे कि माओवादी यहां हमारे कल्याण के लिए नहीं हैं अब वे यहां केवल अपने लिए हैं। यह सब धीरे-धीरे उनको इनके समर्थन से दूर ले गया। माओवादियों से आदिवासियों के बढ़ते मोहभंग के बीच सरकार ने प्रलोभन और प्रताड़ना, पुचकारने और फटकारने वाली अपनी चाल तेज की।
उसने पिछड़े जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, बैंकिंग और मोबाइल कनेक्टिविटी मिशन चलाया। सख्ती बढ़ाने के साथ नक्सलियों के लिए सरेंडर और रिहैबिलिटेशन पॉलिसी, नकद प्रोत्साहन का लालच, नौकरी, कौशल प्रशिक्षण की बात की तो हजारों नक्सलियों ने मान लिया कि हथियारबंद लड़ाई का समय गया और हथियार डाल आत्मसमर्पण किया। एक विशेष दल गठित कर माओवादियों के जरिये ही या तो उन्हें समर्पण कराया गया अथवा निशाना बनाया गया।
इसके अलावा वनाधिकार और आजीविका योजनाएं चलाकर स्थानीय आदिवासियों को अधिकार और रोजगार भी दिए गए ताकि वे वापस नक्सलवाद की ओर न मुड़ें। शीर्ष नेतृत्व और कैडर के लगातार खत्म होने, वित्तीय स्रोतों पर नियंत्रण और स्थानीय समर्थन में गिरावट से हिंसक घटनाओं में 70 से 80 फीसदी तक कमी आयी और नक्सल प्रभावित जिले 200 से घटकर 40 रह गये।
नक्सलवाद राष्ट्रीय खतरे से घटकर क्षेत्रीय चुनौती रह गया
अर्बन नेटवर्क से मिलने वाले वैचारिक समर्थन को तोड़ देने के बाद नक्सलवाद राष्ट्रीय खतरे से घटकर क्षेत्रीय चुनौती भी नहीं बचा। निस्संदेह दुनिया का सबसे लंबा और खूनी माओवादी विद्रोह सूर्यास्त के करीब है, लेकिन अब असली लड़ाई शुरू हुई है। आदिवासी क्षेत्रों के पुनर्निर्माण और न्याय तथा सम्मान की लड़ाई। क्या यहां इसके बाद न्याय का सूरज उगेगा, क्या जंगलराज के अंत के बाद आदिवासी क्षेत्रों में न्याय का राज स्थापित होगा या उसकी जगह खनन राज ले लेगा?
यह यक्ष प्रश्न शेष है। सवाल केवल वैचारिक नहीं बल्कि दशकों के अनुभवों से उपजा गहरा सामाजिक संशय है। देश के लगभग 40 प्रतिशत खनिज भंडार आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्थित हैं और स्वतंत्रता के बाद विकास परियोजनाओं के नाम पर करोड़ों लोगों के विस्थापन का इतिहास भी हमारे सामने है, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासियों की ही है। ओडिशा का नियामगिरि आंदोलन, छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य और पोस्को परियोजना जैसे उदाहरण सामने हैं।
ऐसे में माओवादियों को हटाने के बाद जल-जमीन की जंग के प्रश्न को मात्र आशंका कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। आदिवासी समाज के लिए जंगल संसाधन नहीं, उसकी आस्था, पहचान और जीवनाधार है। उसको खनिज संपदा के रूप में देखा जाने लगता है, तो यह भय स्वाभाविक है कि कहीं उनका अस्तित्व कच्चे माल में न बदल दिया जाए। वनाधिकार कानून और पेसा जैसे प्रगतिशील प्रावधानों के बावजूद, जमीन पर इनके क्रियान्वयन में कमी इस अविश्वास को और गहरा करती है।
आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की कमी
आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव, शिक्षा और स्वास्थ्य की कमजोरी तथा विस्थापन का संकट दूर नहीं हुआ है। नक्सलवाद के खात्मे के बाद इन क्षेत्रों में केवल सड़कें, खदानें और उद्योग ही दिखाई दें और सामाजिक न्याय, स्थानीय भागीदारी न आए, तो इस शांति के स्थायित्व पर शंका बनी रहेगी क्योंकि शांति महज बंदूकों के शांत होने का नाम नहीं। प्रश्न यह है क्या आदिवासी क्षेत्रों के विकास का मॉडल दूर बैठे नीति-निर्माता और कॉर्पोरेट तय करेंगे या फिर स्थानीय ग्राम सभाएं, जिन्हें संविधान और कानून ने अधिकार दिए हैं?
यदि विकास आदिवासियों की सहमति और भागीदारी के बिना थोपा गया, तो यह असंतोष को जन्म दे सकता है और बेशक उपेक्षा और अन्याय ही विद्रोह की जमीन तैयार करते हैं। भूमि अधिकारों की रक्षा, प्रशासन में विश्वास बहाली और शिक्षा-स्वास्थ्य के मजबूत ढांचे के बिना यह प्रक्रिया अधूरी रहेगी। यह केवल सड़कों और परियोजनाओं की नहीं बल्कि विश्वास, पहचान और अधिकारों की पुनर्स्थापना की लड़ाई है।

यदि यह पुनर्निर्माण आदिवासियों की शर्तों पर, उनकी संस्कृति और पर्यावरण के सम्मान के साथ हुआ, तो ये क्षेत्र समावेशी विकास के मॉडल बन सकते हैं। यदि यह केवल खनन और मुनाफे तक सीमित रहा, यदि जंगल से माओवाद खत्म होने के बाद वहां केवल जेसीबी मशीनें ही दिखेंगी, तो नए असंतोष के बीज पड़ने में देर नहीं लगेगी। क्योंकि अभी भी नक्सल विचारधारा से सहानुभूति रखने वाले ग्रामीण और आदिवासी मौजूद हैं। नक्सलवाद मरेगा पर विचारधारा नहीं, वह फिर हिंसक या अहिंसक रूप में उठ खड़ी हो सकती है।
अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।



