बचना ज़रूरी है ऑस्टियोपोरोसिस से

ऑस्टियोपोरोसिस को एक साइलेंट डिसीज माना जाता है, क्योंकि आमतौर पर इसका कोई लक्षण दिखाई नहीं देता। शरीर में फ्रैक्चर होने पर ही इसका पता चलता है। ऑस्टियोपोरोसिस होने पर कमरदर्द, हिपदर्द और हड्डियों में दर्द हो सकता ह। क्योंकि ऑस्टियोपोरोसिस उन्हीं में होता है जिन्हें विटामिन डी की प्राय कमी होती है। यदि शरीर में ऑस्टियोपोरोसिस के कारण एक से अधिक फ्रेक्चर हो जाएं, तो रीढ़ की हड्डी आगे को झुक सकती है।

ऑस्टियोपोरोसिस होने पर हमारे शरीर में हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं और उनके वजन में कमी आ जाती है। कमज़ोर होने पर हड्डियां टूटने का ख़तरा बढ़ जाता है। यह किसी भी आयु में हो सकता है, किंतु बढ़ी आयु में इसका ख़तरा बढ़ जाता है। महिलाओं में मेनोपॉज के पश्चात ऐस्ट्रोजन हारमोन की कमी हो जाती है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस हो सकता है। यदि हमारे आहार में कैल्शियम की कमी हो, विशेषत विटामिन डी की कमी होने से और धूप में न बैठने से भी इसका ख़तरा बढ़ जाता है।

जो निपिय जीवनशैली जीते हैं या किसी कारणवश बिस्तर पर अधिक रहना पड़े तो उन्हें भी ऑस्टियोपोरोसिस का ख़तरा बढ़ जाता है। जिन पुरुषों में टेस्टोरोन हारमोन का स्तर कम होता है, उनमें और जो अधिक मात्रा में शराब का सेवन या धूम्रपान करते हैं, उनमें भी इनकी संभावना अधिक होती है। यदि ऑस्टियोपोरोसिस हो जाए तो इसके इलाज का मुख्य उद्देश्य हड्डियों को और कमज़ोर होने से रोकना और हड्डियों को और मज़बूत बनाना होता है।

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इसके लिए निम्न उपाय करने चाहिए-

  • ऐसा आहार लें जिनमें कैल्शियम और विटामिन डी की मात्रा अधिक हो।
  • दूध, दही और पनीर का अधिक मात्रा में सेवन करें।
  • नियमित शारीरिक व्यायाम करें।
  • शराब और तंबाकू का सेवन बिलकुल न करें।
  • चाय और काफी सेवन भी सीमित मात्रा में करें।
  • जितना पौष्टिक आपका भोजन होगा, उतनी ही आपको ऑस्टियोपोरोसिस होने की संभावना कम हो जाएगी।

-अशोक गुप्त

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