एलपीजी की कमी से व्यंजन बने स्वादिष्ट

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हैदराबाद, एक कहावत है कि ‘सिक्के के दो पहलू होते हैं’। व्यावसायिक एलपीजी की कमी ने इस कहावत को चरितार्थ कर दिया है। जी हाँ! हैदराबाद व्यावसायिक एलपीजी की कमी ने परेशान तो किया है, यह सिक्के का एक पहलू है, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू स्वादिष्ट है। भले ही मेन्यू छोटा हो गया है, लेकिन मजबूरी में लकड़ी के चूल्हे पर बनने वाले व्यंजनों के स्वाद ने दादी-नानी के जमाने की याद दिला दी है।

एलपीजी की कमी के कारण कई रेस्टोरेंट लकड़ी के चूल्हे की ओर मुड़ गए हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि मेन्यू भी छोटा हो गया है और सेवा भी धीमी हो गई है, लेकिन खाना खाने वालों का कहना है कि इस बदलाव से खाने का स्वाद और भी बेहतर हो गया है। सिकंदराबाद के एक रेस्टोरेंट में एक परिवार को अपने रोज़ाना के लंच के दौरान मेन्यू में कमी देखने को मिली। स्टाफ ने उन्हें बताया कि गैस की कमी के कारण खाना लकड़ी की आग पर पकाया जा रहा है। सूप उपलब्ध नहीं है और फैमिली पैक में से चिकन 65 और रोटी जैसी चीजें हटा दी गई है। उनकी जगह दो उबले हुए अंडे दिए जा रहे हैं।

पारंपरिक तरीकों से बढ़ा भोजन का स्वाद

परिवार की एक सदस्य का कहना है कि जो भी व्यंजन दिए जा रहे हैं, उनका स्वाद एकदम असली है और उसमें लकड़ी की आग वाला (स्मोकी) स्वाद आ रहा है। वे बताती हैं कि खाना खाने के बाद में उन्होंने और उनके परिवार ने रात के खाने के लिए एक और ऑर्डर किया।

शहर के कई हिस्सों में रेस्टोरेंट एलपीजी की अनियमित आपूर्ति के हिसाब से खुद को ढाल रहे हैं। वे मेन्यू के विकल्पों को सीमित कर रहे हैं और खाना पकाने के तरीकों में बदलाव कर रहे हैं। रेस्टोरेंट चलाने वालों का कहना है कि लकड़ी की आग पर खाना पकाने में ज़्यादा मेहनत लगती है, लेकिन इसकी वजह से वे अपनी रसोई का काम जारी रख पा रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इस बदलाव ने धीमी आंच पर पकाने से जुड़े पारंपरिक स्वादों को फिर से ज़िंदा कर दिया है। कुछ समय पहले तक जब एलपीजी इतनी आम नहीं हुई थी, तब स्थानीय भोजनालयों में लकड़ी की आग पर खाना पकाया जाता था।

एक ग्राहक ने कहा कि मेरी माँ लकड़ी की आग पर धीरे-धीरे मछली पकाया करती थीं। इमली की ग्रेवी घंटों तक धीमी आंच पर पकती रहती थी और मछली उस खट्टे-मीठे स्वाद को पूरी तरह सोख लेती थी। गैस पर जल्दी से खाना पकाने में वह गहराई और स्वाद नहीं मिल पाता।

गैस कमी के बीच लोगों ने अपनाए नए विकल्प

रेस्टोरेंट चलाने वालों का कहना है कि दम कुकिंग, खासकर बिरयानी के लिए लकड़ी की आग से मिलने वाली एक जैसी और फैली हुई गर्मी से बहुत फ़ायदा मिलता है। लोग इस स्वाद को उन पारंपरिक खाना पकाने के तरीकों से भी जोड़कर देख रहे हैं, जिनका पालन अक्सर पारिवारिक समारोहों के दौरान किया जाता है। अत्तापुर की रहने वाली एक महिला का कहना है कि पारिवारिक समारोहों में हम लकड़ी की आग का ही इस्तेमाल करते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि बिरयानी का असली स्वाद मिल सके। आमतौर पर घर पर गैस के चूल्हे पर बिरयानी बनाते समय लकड़ी की आग का इंतज़ाम करना आसान नहीं होता।

इस तकनीक के बारे में बताते हुए पुराने शहर के कालापत्थर इलाके के रहने वाले और चौथी पीढ़ी के पारंपरिक हैदराबादी रसोइए सैयद समीउल्लाह हुसैनी ने कहा कि बिरयानी बनाने की बुनियादी पाक-कला आग को नियंत्रित करने में है, जो केवल लकड़ी की आग पर खाना बनाते समय ही संभव हो पाता है।

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