दो दिन की फुलवारी है जीवन

दो दिन की फुलवारी जीवन,
मन भंवरा मत भूल।
ये दो दिन का जीवन तेरा,
फिर किस पर तू इतराता है।।
यह भजन जीवन की नश्वरता को बयान करता है। यह मनुष्य को याद दिलाता है कि वह खाली हाथ आया था और खाली हाथ ही जाएगा, इसलिए पापों का बोझ नहीं बढ़ाना चाहिए। जीवन क्षण भंगुर है। अपने भौंरे रूपी मन को माया के मोह से बचाना चाहिए और ईश्वर भक्ति करते हुए मोक्ष की कामना करनी चाहिए है। उपरोक्त भजन का अर्थ है कि जीवन चंद साँसों की फुलवारी के समान है, जिसे इंसान को व्यर्थ नहीं गवाना चाहिए।
अहंकार छोड़कर भक्ति की ओर अग्रसर होना चाहिए। यह माटी की काया नश्वर है। इसलिए धन, वैभव और यौवन को चलते-फिरते साये की तरह मानना चाहिए। संयमित जीवन यापन करना चाहिए। तेरा मेरा के फेर में नही पड़ना चाहिए। अवश्यकता से बहुत अधिक कोई भी चीज का लालच नहीं करना चाहिए। रोटी, कपड़ा और मकान तथा अन्य आवश्यक चीजों का संग्रह सीमित मात्रा में ही करना चाहिए। अति किसी भी चीज की बुरी होती है।
सच्चा सुख संतोष में, न कि असीम दौड़ में
इस संबंध में एक कहानी मैंने कहीं पढ़ी थी, जो मेरे मन को एक सबक देते हुए छू गई। मैं उस कहानी को आप लोगों के साथ साझा कर रहा हूँ। एक मछुआरा अपनी नाव में आराम से बैठा बीड़ी फूंक रहा था। उस नदी के तट पर एक उद्योगपति लहरों के उठने-बैठने के खेल का आनंद ले रहा था। उसकी नज़र मछुआरे पर पड़ी।
उद्योगपति ने उससे पूछा- तुम मछली क्यों नहीं पकड़ रहे हो?
मछुआरे ने कहा- क्योंकि मैंने आज काफी मछलियाँ पकड़ ली हैं।
उद्योगपति बोला- तुम और अधिक मछलियाँ क्यों नहीं पकड़ना चाहते हो?
मछुआरे ने कहा- मैं और मछलियों का क्या करूंगा?
उद्योगपति ने उसे समझाते हुए कहा- तुम अधिक पैसा कमा सकते हो। एक मोटर बोट होगी तो तुम गहरे पानी में मछली पकड़ सकते हो। तुम्हारे पास नायलॉन का जाल खरीदने के लिए पर्याप्त पैसा होगा और उससे अधिक मछलियाँ पकड़ोगे तो अधिक पैसा कमाओगे। पैसे की बदौलत तुम्हारे पास दो नावें होंगी। हो सकता है कि तुम्हारे पास जहाजों का एक निजी बेड़ा हो जाए तब तुम मेरी तरह अमीर बन जाओगे।
मछुआरे ने पूछा- उसके बाद मैं क्या करूंगा?
उद्योगपति ने कहा- फिर तुम भी मेरी तरह बैठकर जिंदगीभर जीवन का आनंद लोगे।
मछुआरे ने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए आत्मविश्वास से लबरेज होकर कहा- आपको क्या लगता है, मैं अभी क्या कर रहा हूं?

उसकी बात सुनकर उद्योगपति बेबस आँखों से मछुआरे की चमकती आँखों को देखता रह गया। हमारी हर आवश्यकता इस प्रकृति से जुड़ी है। इसका दोहन आवश्यकता से अधिक नहीं करना चाहिए। जीवन जितना आंनद व शांति से जी सकते हो, उतना ही अच्छा। अति संपत्ति व अति ऐश्वर्य भी हमारे कर्मों पर कुप्रभाव डाले हैं।
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