भगवान महावीर और गणतंत्रीय प्रणाली

भारत में जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के समय (ईस्वी पूर्व नौवीं सदी) से गणतंत्रीय शासन प्रणाली थी, ऐसी जानकारी मिलती है। चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर के युग में एक सुदृढ़ गणतंत्रीय प्रणाली के संदर्भ प्राचीन प्राकृत साहित्य के स्वर्णिम पन्नों पर अंकित हैं। प्राकृत और पालि भाषा के साहित्य में कपिलवस्तु के शाक्य, सुंसुमगिरी के भग्ग, अल्लकप्प के बुली, केसुपुत्त के कालाम, रामग्राम के कोलिय, पावा और कुशीनारा के मल्ल, पिप्पलिवन के मोरिय, मिथिला के विदेह और वैशाली के लिच्छवी गणराज्यों के उल्लेख मिलते हैं।

भगवान महावीर के पिता सिद्धार्थ लिच्छवी गणराज्य के लोकप्रिय व न्यायप्रिय राजा थे। नौ लिच्छवी और नौ मल्ल, इन 18 गणराज्यों को मिलाकर विशाल वज्जी गणतंत्र बना था, जिसकी राजधानी वैशाली थी। वैशाली के कुंडग्राम में भगवान महावीर का जन्म हुआ था। जैन-बौद्ध ग्रंथों में वैशाली को समृद्ध महानगर बताया गया है, जिसमें हजारों महल, अट्टालिकाएँ, बाग-बगीचे और झील-सरोवर थे। भगवान महावीर के मामा सम्राट चेटक वज्जी गणराज्य के अध्यक्ष थे।

18 गणराज्य, महावीर का दर्शन और भारतीय गणतंत्र की वैचारिक नींव

अठारह गणराज्य चेटक के अनुशासन में थे। सम्राट चेटक, राजा सिद्धार्थ और अधिकांश गणराज्यों के शासक तीर्थंकर पार्श्वनाथ की परंपरा के उपासक थे तो कुछ शासक वैदिक परंपरा के अनुगामी थे। कल्पसूत्र के अनुसार, भगवान महावीर के निर्वाण के समय 18 गणराज्यों के शासक उनके समवसरण में उपस्थित थे। कार्तिक अमावस की अर्धरात्रि में भगवान महावीर के निर्वाण के उपरांत उनकी पावन स्मृति में 18 गणराज्यों के शासकों ने दीपावली मनाने का निर्णय लिया था। वह ऐतिहासिक निर्णय भारत का प्रमुख पर्व बन गया।  

वस्तुत तीर्थंकर महावीर के तीर्थ प्रवर्तन के साथ ही गणतंत्रीय व्यवस्था को मजबूती मिलती गई। उनके अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत जैसे सिद्धांतों ने तत्कालीन गणतंत्र को शतशाखी बनाकर उसे स्थायी प्रतिष्ठा दे दी थी। प्राकृत भाषा के तृतीय जैन आगम स्थानांग सूत्र में भगवान महावीर ने दस प्रकार के धर्म बताए। उनमें उन्होंने ग्रामधर्म, नगरधर्म, राष्ट्रधर्म और गणधर्म को भी स्थान दिया। गणतंत्र के संदर्भ में गण का अर्थ विभिन्न आचार-विचार के व्यक्तियों के समूह से है। गणतंत्र में सभी प्रकार के व्यक्ति होते हैं। इसके बावजूद एक न्यूनतम आचार-संहिता ऐसी होती है, जो सबके लिए अनुपालनीय होती है।

महावीर का अनेकांत और आधुनिक लोकतंत्र का दर्शन

इस अर्थ में गण-धर्म के अंतर्गत समता, स्वतंत्रता, स्वायत्तता, सह-अस्तित्व आदि जीवन मूल्यों के अनुपालन व अनुरक्षण का दायित्व आता है। गणधर्म की मुख्य प्रेरणा यह है कि सभी निष्ठा से अपना कर्तव्य निभाएँ। उत्तराध्ययन सूत्र के अनुसार- सव्वं सुचिण्णं सफलं नराणं अर्थात मनुष्य का कर्तव्य-पालन सदैव फलदायी बनता है। अत संवैधानिक अधिकारों के साथ संवैधानिक कर्तव्यों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। मौजूदा लोकतांत्रिक प्रणाली के सूत्र महावीर कालीन गणतंत्र की व्यवस्थाओं में प्राप्त होते हैं।

भारत के द्वितीय राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन ने कहा था- आज का लोकतंत्र भगवान महावीर के सिद्धांतों पर आधारित है। इसके कारण हैं- सापेक्षता, समानता, सह-अस्तित्व और स्वतंत्रता। ये चारों अनेकांत के फलित हैं तथा चारों ही लोकतंत्र के सिद्धांत माने जाते हैं। भगवान महावीर का अनेकांत का सिद्धांत सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से लोकतंत्र के रूप में फलित है। गणतंत्रीय प्रणाली में सबके लिए सोचना और तदनुसार व्यवहार करना होता है। जब वैयक्तिक हितों को ही प्रथम और अंतिम माना जाता है, तो गणतंत्र की मूल भावना नष्ट प्राय हो जाती है।

स्वार्थ नहीं, सामूहिक हित ही गणतंत्र की असली शक्ति

अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के हितों पर कुठाराघात करने से न सिर्फ गणतंत्र, अपितु सामान्य नैतिक मानदंडों की भी अवहेलना होती है। गणतंत्र में एक सामुदायिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और मानवीय चेतना का विकास करना होता है। मैं सबका और सब मेरे। एक सबके लिए और सब एक के लिए। सभी अपना-अपना विकास करें, किंतु दूसरों के विकास में बाधक बनकर नहीं। सच्चा विकास वही है, जो सर्वोदय का कारण बन सके।

-डॉ. दिलीप धींग

भगवान महावीर के सिद्धांतों में सर्वोदय एवं सतत विकास की गहरी विवेक दृष्टि विद्यमान है, जो गणतंत्र को अधिक सफल और सार्थक बनाती है। तीर्थंकर का समवसरण एक ऐसी ही विषाल परिशद होती है, जिसमें सबको योग्यता के आधार पर स्थान व सम्मान मिलता है। वहाँ सभी अपना समग्र विकास कर सकते हैं। सर्वोदय की भावना से गणतांत्रिक व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ व दीर्घजीवी बनाया जा सकता है।  

Exit mobile version