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नैतिक आत्म प्रतिज्ञा का पर्व है महावीर जयंती

भगवान महावीर ने कठोर तप और संयम के माध्यम से यह बताया था कि मन और इंद्रियों पर नियंत्रण ही सच्ची मुक्ति का मार्ग है।

जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के जन्मोत्सव को हम लोग महावीर जयंती के रूप में मनाते हैं। भारत जैसे बहुधर्मी और बहुआस्था वाले देश में यह सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक तिथियों में से एक है। जैन समुदाय के लिए महावीर जयंती बहुत पवित्र त्योहार है, लेकिन अन्य मतावलंबियों के लिए यह शांति और करुणा का शाश्वत संदेश है।

कहने का मतलब महावीर जयंती किसी जन्मदिन का उत्सव नहीं बल्कि आध्यात्मिक जागरण और आत्मशुद्धि का पर्व है। भगवान महावीर का सबसे बड़ा संदेश था- ‘अहिंसा परमो धर्मः।’ उन्होंने न केवल मनुष्य बल्कि सभी जीवों के प्रति दया और करुणा की शिक्षा दी। आज के हिंसा और तनाव से भरे समय में यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।

भगवान महावीर ने सिखाया था कि सत्य जीवन का आधार होना चाहिए और मनुष्य को अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह नहीं करना चाहिए। यह विचार आज के उपभोक्तावादी समाज में संतुलन बनाने का रास्ता दिखाता है। भगवान महावीर ने कठोर तप और संयम के माध्यम से यह बताया था कि मन और इंद्रियों पर नियंत्रण ही सच्ची मुक्ति का मार्ग है।

आज के दौर में महावीर के सिद्धांत: शांति और संतुलन

महावीर की सहिष्णुता और सहअस्तित्व की अवधारणा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में विभिन्न धर्मों के लोग एक साथ रहते हैं और अहिंसा, सहिष्णुता और शांति के उनके संदेश सभी लोगों को प्रभावित करते हैं। महावीर जयंती के दिन आमतौर पर सार्वजनिक उत्सव के रूप में रथ-यात्रा निकलती है। मंदिरों में विशेष पूजा होती है।

गरीबों को भोजन और वस्त्र दान दिए जाते हैं तथा समाज में सेवा और सहयोग की भावना को मजबूत करने की कोशिश की जाती है। हम जानते हैं कि भगवान महावीर का दर्शन केवल मानव समुदाय तक सीमित नहीं था। उन्होंने हर जीव और प्रकृति के प्रति करुणा रखने को कहा। इसलिए आज जब पर्यावरण का संकट मानव अस्तित्व का संकट बन गया है, तब हमें महावीर जयंती प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने की प्रेरणा देती है।

इस दिन जैन समाज कई तरह की धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों में हिस्सेदारी करता है। जैन मंदिरों में खास तौरपर अभिषेक और पू-जन कार्यक्रम होते हैं। गवान महावीर की मूर्तियों का विशेष जलाभिषेक होता है। प्रवचन और ध्यान की सामूहिक गतिविधियां सम्पन्न होती हैं। इन गतिविधियों का उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं बल्कि भगवान महावीर के सिद्धांतों को खुद अपने जीवन में अपनाते हुए, दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करना होता है।

आज के रोजमर्रा की जिंदगी में भगवान महावीर की जयंती पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गई है। आज की दुनिया पहले से कहीं ज्यादा हिंसा, तनाव, पर्यावरण संकट और उपभोक्तावाद से दोचार है। इस सबके बीच भगवान महावीर के विचार हमें संतुलित और शांतिपूर्ण जीवन जीने का समाधान सुझाते हैं। इसलिए भगवान महावीर की जयंती जितनी आध्यात्मिक है, उससे कहीं नैतिक आत्म प्रतिज्ञा का पर्व है।

आर. सी. शर्मा

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