युद्ध के बीच मनुष्य

दो विश्वयुद्ध रूपी पलकों के बीच दबा है मानव उदास,
न जाने किस झपक में फिर भड़क उठेगा युद्ध का संत्रास।
जान हथेली पर लिये बैठा है वह चुप और लाचार,
धरती की गोद में छिपे धन पर क्यों बढ़ता लोभ अपार?
प्रकृति का आँचल जिसने जीवन का आधार दिया,
उसी को पाने की लालसा ने उसका संतुलन छीन लिया।
शक्ति के मद में जब युद्ध बना उत्सव का शोर,
निर्दोषों के घरों तक पहुँचा उसका निर्दयी दौर।
रोते बच्चों से पूछ रहा है घायल यह संसार-
किसकी जीत हुई आखिर, किसका हुआ संहार?

मानव इतिहास में युद्ध की घटनाएँ बार-बार सामने आती रही हैं। जब सत्ता और संसाधनों की आकांक्षा बढ़ती है, तब अनेक बार पृथ्वी ही संघर्ष का मैदान बन जाती है। प्रकृति की गोद में छिपी संपदा, जो मनुष्य को जीवन देने के लिए है, वही कई बार संघर्ष का कारण बन जाती है।

प्राकृतिक संपदा मनुष्य को प्रकृति की कृपा से प्राप्त हुई है। परंतु जब लोभ और महत्वाकांक्षा उस पर अधिकार जमाने लगती है, तब वही संपदा विनाश का कारण बन जाती है। जैसे कोई बालक दूध पीने के बजाय उसे गिरा दे और फिर रोने लगे, वैसे ही मनुष्य कभी-कभी उस प्रकृति को ही क्षति पहुँचाने लगता है जिससे उसका जीवन जुड़ा है।

इतिहास में एक व्यक्ति के खिलाफ संघर्ष ने व्यापक असर डाला

युद्ध की स्थिति में सबसे अधिक पीड़ा साधारण लोगों को होती है। वे लोग, जिनका संघर्ष से कोई संबंध नहीं होता, वही उसके परिणामों का सामना करते हैं। घर उजड़ते हैं, परिवार बिखरते हैं और बच्चों की आँखों में भय और अनिश्चितता भर जाती है।इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है कि किसी एक व्यक्ति या सत्ता के विरुद्ध प्रतिशोध की भावना में व्यापक विनाश हुआ। उस समय असंख्य निर्दोष प्राणियों का जीवन प्रभावित हुआ। यह स्थिति हमें याद दिलाती है कि प्रतिशोध और अहंकार से प्रेरित निर्णय अक्सर दूरगामी परिणाम लाते हैं।

यह भी पढ़ें… राज्य की बेहतरी के लिए उठाए गए अनेक कदम : एन. इंद्रसेन रेड्डी

डॉ. गरिकापाटि नरसिंह राव
डॉ. गरिकापाटि नरसिंह राव
सागर घोष से रूपांतरित

युद्ध का दृश्य केवल रणभूमि तक सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव समाज, प्रकृति और मानव जीवन पर गहराई से पड़ता है। जब बम गिरते हैं, तब वे सीमाएँ नहीं देखते; वे केवल जीवन और पर्यावरण को क्षति पहुँचाते हैं। इसी कारण यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या युद्ध वास्तव में किसी समस्या का समाधान है। यदि संघर्ष का परिणाम निर्दोष लोगों की पीड़ा और प्रकृति का विनाश है, तो मानवता को इस मार्ग पर पुन विचार करना चाहिए। पृथ्वी समस्त मानवता की साझा धरोहर है। यदि मनुष्य इस सत्य को समझे और विवेक के साथ आगे बढ़े, तो शायद भविष्य की पीढ़ियाँ युद्ध की छाया से मुक्त होकर अधिक शांत और संतुलित संसार में जीवन जी सकेंगी।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button