ध्यान द्वारा करें प्रभु का चिंतन

हम सभी लोगों से प्रेमपूर्वक व्यवहार करते हैं। उनके भीतर प्रभु के प्रकाश को देखते हैं। प्रभु के चिंतन का अर्थ है सभी लोगों से प्यार करना और हर एक के प्रति दयालुता का व्यवहार करना तथा नैतिक जीवन जीना। निःस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करें।

टुनियाभर में सभी लोग किसी न किसी 3 रूप में परमेश्वर की पूजा करते हैं। हर धर्म की अपनी उपासना पद्धति होती है। हालांकि सभी का मूल उद्देश्य केवल प्रभु का ध्यान करना है। अधिकांश लोग दिखाते हैं कि वे पूजा के स्थान पर सेवाओं में भाग लेकर परमेश्वर को याद करते हैं और उनसे प्यार करते हैं। विभिन्न धर्मों और शास्त्रों के अध्ययन से यह पता चलता है कि प्रभु को पाने का मार्ग सिर्फ इंसान के भीतर ही मिलता है। जिसके लिए हमें अपने शरीर और मन को शांत करना पड़ता है।

प्रभु का अनुभव हम ध्यान-अभ्यास के ज़रिये कर सकते हैं। ध्यान-अभ्यास करते समय बाहर से ध्यान हटाने की ज़रूरत है। परमेश्वर आनंद, चेतनता और प्रेम के महासागर हैं। इस महा-सागर के साथ हमारा मिलन तब होता है, जब हम ध्यान-अभ्यास में बैठते हैं और अपने अंतर में प्रभु से बात करते हैं। ध्यान-अभ्यास करने के लिए एक शांत जगह ढूंढकर आराम से बैठते हैं, जिसमें हम ज्यादा देर तक स्थिर रह सकें। हम अपनी आँखें बंद करते हैं और अपना ध्यान दो भौंहों के बीच शिवनेत्र पर एकाग्र करते हैं, जिसे तीस- री आँख या दिव्य-चक्षु भी कहा जाता है।

सबके भीतर प्रभु के प्रकाश को देखना

मन को स्थिर रखने के लिए हम प्रभु के नामों का जाप करते हैं। ध्यान-अभ्यास की इस कला को किसी पूर्ण गुरु से सीख सकते हैं, जो हमें हमारे भीतर प्रभु की ज्योति और श्रुति का अनुभव कराते हैं। हम अपने अंतर आध्यात्मिक यात्रा करके प्रभु के अंतरीय मंडलों का पता लगा सकते हैं। जब भी हम कुछ नया सीखना चाहते हैं तो शिक्षक के पास जाते हैं। ठीक उसी प्रकार यदि हमें आध्यात्मिक विद्या में निपुण होना है तो हमें किसी पूर्ण गुरु के चरण-कमलों में जाना होगा। प्रभु के दिव्य-प्रकाश का अनुभव किताबें नहीं दे सकतीं।

संत राजिन्दर सिंह महाराज

प्रतिदिन ध्यान-अभ्यास करने से हमें अपने सच्चे स्वरूप अर्थात आत्मा के बारे में जानने में मदद मिलती है। जब हम अपने भीतर प्रवेश करते हैं तो पता चलता है कि हमारे अंदर प्रभु का प्रकाश है। उसके बाद ही हमें अनुभव होता है कि यही दूसरों में भी है। इस दुनिया के बाहरी मतभेद धीरे-धीरे हमारे अंदर से मिटने लगते हैं। हम सभी लोगों से प्रेमपूर्वक व्यवहार करते हैं। उनके भीतर प्रभु के प्रकाश को देखते हैं। प्रभु के चिंतन का अर्थ है सभी लोगों से प्यार करना और हर एक के प्रति दयालुता का व्यवहार करना तथा नैतिक जीवन जीना। निःस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करें।

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