आत्मज्ञान के लिए निदिध्यान है श्रेष्ठ

सृष्टि प्रत्येक जीव के उद्धार के लिए हर पल कार्यरत रहती है और स्वाभाविक रूप से सब प्रगति की ओर बढ़ते हैं, लेकिन मनुष्य अपनी बुद्धि और अहंकार के कारण अपने जीवन में आने वाले सभी स्वाभाविक अवसरों का लाभ नहीं उठा पाता, इसीलिए उसे आत्मज्ञान में स्थित होने के लिए प्रयास करना पड़ता है। सहज रूप से हर मनुष्य आत्मज्ञानी है, लेकिन संसार की आपाधापी में हम अपनी वास्तविक स्थिति को भूल गए हैं, क्योंकि काम, क्रोध, लोभ, मोह, प्रतिस्पर्धा, अज्ञान और नकारात्मकता आदि के प्रदूषण से हमारे आत्मज्ञान पर अंधकार छा गया है।
मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा, धन-दौलत, अनुभव, सुंदरता, दानशीलता आदि को अज्ञानतावश हम अपनी उपलब्धि और अपना ज्ञान समझ लेते हैं। यह हमारे जीवन की सबसे बड़ी भूल है, क्योंकि यह शरीर ही जीवात्मा यानी परमात्मा के अंश से चल रहा है तो इस जीवन की कोई भी उपलब्धि हमारी नहीं, बल्कि परमात्मा की ही है। सत्संग और सद्गुरु हमें जीवन और ब्रह्मांड का अटल सत्य बताते हैं कि संपूर्ण ब्रह्मांड ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है। यहां हर जड़-चेतन ब्रह्म का ही बदला हुआ रूप है।
इस ज्ञान को जब हम अपने दैनिक जीवन में उतारते हैं और हर वस्तु, व्यवहार, विचार, क्रिया आदि में सर्वव्यापी ब्रह्म, चेतना या ऊर्जा की अनुभूति करते हैं तब हमारा जीवन सहज और सरल हो जाता है। हमें किसी भी कार्य या निर्णय के लिए ज्यादा नहीं सोचना पड़ता है। मानसिक रूप से जिम्मेदारी भी नहीं उठानी पड़ती है, क्योंकि मन में यह भाव रहता है कि परमात्मा की कृपा से सब अच्छा हो रहा है और होगा। मन का यह भाव निदिध्यासन कहलाता है।
निदिध्यासन: हर पल ब्रह्म भाव में जीने की सरल साधना
वेदों और शास्त्रां में जिस ध्यान योग, कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि के बारे में कहा गया है, वे सारे इस एक निदिध्यासन में सम्मिलित हैं। गुरु ज्ञान से जब हम हर समय और हर चीज में ब्रह्म के दर्शन करते हैं तब हमारा ज्ञान योग हो जाता है और सदा सबमें ब्रह्म के दर्शन करना ही वास्तविक ध्यान है यानी ध्यानयोग है। हर पल ब्रह्म के भाव में रहने से हम सदा भक्ति योग में ही रहते हैं तथा जब हम यह महसूस करते हैं कि किसी भी चीज के कर्ता और भोक्ता न तो हम हैं और न ही कोई अन्य, तब कर्म योग भी साथ में चलता रहता है।
इसलिए जीवन में निदिध्यासन अपनाएं और सारे झंझटों से मुक्त हो जाएं। ध्यान हमें केवल कुछ समय के लिए ही मन की शांति और विचारों का ठहराव देता है। ध्यान से उठने के बाद हमारे मन में आचार-व्यवहार से संसार की उठा-पटक चलती रहती है, जबकि निदिध्यासन की स्थिति में ध्यान करना नहीं पड़ता है। आप सदा ध्यान की स्थिति में ही रहते हैं। इसीलिए मन शांत और आनंदित महसूस करता है।
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निदिध्यासन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके लिए आपको अपने रोज के कामों में से न तो अलग से समय निकालना है और न ही कोई योजना बनानी है तथा न ही कुछ खर्च करना है। केवल अपने दृष्टिकोण को बदलना काफी है-ओतप्रोत सर्वं खलमिदं ब्रह्मं। निदिध्यानसन से हमारे अज्ञान के आवरण धीरे-धीरे खुद ही गलकर हट जाते हैं और हमारे भीतर-बाहर चारों ओर आत्मज्ञान का प्रकाश फैल जाता है। यह आत्मज्ञान का प्रकाश न केवल हमारे लिए बल्कि सबके लिए कल्याणकारी है ।
सद्गुरु रमेश
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