प्रकृति से खिलवाड़ यानी आपदाओं को आमंत्रण

प्रकृति व पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। प्राकृतिक संपदाओं के महत्व को समझना, उनका किफायती उपयोग करना, उनके संरक्षण को प्राथमिकता देना हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। जल, जंगल और जमीन प्रकृति के तीन प्रमुख तत्व हैं जिनके बगैर हमारी प्रकृति अधूरी है। प्रकृति के इन तीनों तत्वों का इस कदर दोहन किया जा रहा है कि इसका संतुलन डगमगाने लगा है। प्रकृति के साथ हम बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ कर रहे हैं। उसी का नतीजा है कि पिछले कुछ समय से भयानक तूफानों, बाढ़, सूखा, भूकम्प जैसी आपदाओं का सिलसिला तेजी से बढ़ा है।

हम प्रकृति की चिंता नहीं करते और यही वजह है कि प्रकृति ने भी अब हमारी चिंता छोड़ दी है। हमने बिना सोचे-समझे संसाधनों का दोहन किया है। यही वजह है कि अब पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया है और बाढ़, सूखा, सुनामी जैसी आपदाएं आ रही हैं। बरसों से पर्यावरण को हम इंसानों ने बहुत नुकसान पहुंचाया है। प्रकृति के साथ इंसान का लगातार खिलवाड़ एक भयानक विनाश को आमंत्रण दे रहा है, जहां किसी को बचने की जगह नहीं मिलेगी।

प्रकृति, पर्यावरण और आयुर्वेद: मानव जीवन का संतुलन

मनुष्य का प्रकृति से अटूट संबंध है। प्रकृति की रक्षा, उसके संरक्षण और विलुप्ति की कगार पर पहुंच रहे जीव-जंतु तथा वनस्पति की रक्षा का संकल्प प्रत्येक मानव का है। प्रकृति का संरक्षण प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित है। इनमें मुख्यत पानी, धूप, वातावरण, खनिज, भूमि, वनस्पति और जानवर शामिल हैं। प्रकृति हमें पानी, भूमि, सूर्य का प्रकाश और पेड़-पौधे प्रदान करके हमारी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करती है। इन संसाधनों का उपयोग विभिन्न चीजों के निर्माण के लिए किया जा सकता है, जो निश्चित ही मनुष्य के जीवन को अधिक सुविधाजनक और आरामदायक बनाते हैं।

सचमुच प्रकृति, पर्यावरण और आयुर्वेद का अद्भुत संगम है। मानव जीवन के लिए तीनों कारकों के एकाकार होने की आज के समय महती जरूरत है। इससे प्रकृति को जहाँ साफ-सुथरा रखा जा सकता है, वहीं पर्यावरण भी हमारे अनुकूल होगा, जिससे आयुर्वेद को भी संरक्षित रखा जा सकेगा। जो मनुष्य प्रकृति के जितना अधिक अनुकूल है, स्वास्थ्य की दृष्टि से वह व्यक्ति उतना ही अधिक निरापद एवं व्याधियों के आक्रमण से दूर होगा। मनुष्य का आहार-विहार या रहन-सहन सर्वथा प्रकृति सापेक्ष होता है।

प्रकृति बचाना, आयुर्वेद और पर्यावरण दोनों की रक्षा

पर्यावरण प्रदूषण रोकने के लिए काफी धन व्यय किया जा रहा है। फिर भी आशानुकूल सफलता नहीं मिल रही है। वनौषधि गारंटी है। समुचित संरक्षण के अभाव में विभिन्न वनौषधियों का धीरे-धीरे लोप होता जा रहा है और हम जाने-अनजाने में अपनी बहुमूल्य संपदा को खोते जा रहे हैं। इससे सर्वाधिक हानि आयुर्वेद की हुई है। भारतीय संस्कृति प्रकृति और पर्यावरण का बहुत आदर करती है और आयुर्वेद की तरफ रुझान इसका सबूत है।

आयुर्वेद को समग्र मानव विज्ञान कहा जा सकता है। पेड़ों से लेकर प्लेट तक और शारीरिक बल से मानसिक स्थिति तक आयुर्वेद का गहरा प्रभाव होता है। आयुर्वेद प्राकृतिक एवं समग्र स्वास्थ्य की पुरातन भारतीय पद्धति है। यदि हमें प्रकृति को बचाना है तो पर्यावरण संरक्षण पर जोर देना होगा। औषधीय पेड़-पौधे लगाने होंगे, जिससे पर्यावरण दूषित होने से तो बचेगा ही और आयुर्वेद का प्रसार भी होगा।

जीव-जंतुओं और वनस्पतियों का विलुप्त होना चिंताजनक

प्रकृति का संरक्षण हमारे सुनहरे भविष्य का आधार है। मनुष्य जन्म से ही प्रकृति और पर्यावरण के संपर्क में रहता आया है। प्राणी जीवन की रक्षा हेतु प्रकृति की रक्षा अति आवश्यक है। वर्तमान में विभिन्न प्रजाति के जीव-जंतु, वनस्पतियां और पेड़-पौधे विलुप्त हो रहे हैं, जो प्रकृति के संतुलन के लिए बहुत ही भयावह है। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समय-समय पर प्रकृति का दोहन करता चला आ रहा है।

बाल मुकुन्द ओझा

प्रकृति के साथ खिलवाड़ होता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमें शुद्ध पानी, हवा, उपजाऊ भूमि, शुद्ध पर्यावरण, वातवरण एवं शुद्ध वनस्पतियाँ नहीं मिल सकेंगीं। इन सबके बिना हमारा जीवन जीना मुश्किल हो जाएगा। हमारा शरीर प्रकृति के पांच तत्वों से मिल कर बना है। यदि हम प्रकृति की रक्षा करेंगे तथा उससे अपनापन रखेंगे तो प्रकृति भी हमारे शरीर की रक्षा करेगी। हम अनेक प्रकार के रोगों से बचे रहेंगे। प्रकृति का संरक्षण मानव जाति का संरक्षण है, क्योंकि ये प्राकृतिक तत्व ही हैं, जो हमें जीवन देते हैं। ऐसे में यह समाज के हर व्यक्ति का दायित्व है कि वह अपने आस-पास के प्रकृतिक संसाधनों की रक्षा करे।

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