मुहम्मद ऱफी व किशोर दुश्मन नहीं, गहरे दोस्त थे
राजेश खन्ना को लगता था कि उनकी सफलता में किशोर कुमार की आवाज़ का बहुत बड़ा योगदान है, जो उनकी अभिनय शैली से अधिक मेल खाती है। इसलिए वह ख़ुद पर फिल्माए गए गीतों को किशोर कुमार की आवाज़ में ही प्राथमिकता देते थे, यह अलग बात है कि राजेश खन्ना के लिए मुहम्मद रफी ने भी यादगार गीत गाए, जिन्हें आज तक लोग गुनगुनाते हैं, जैसे-
गुलाबी आंखें जो तेरी देखीं (द ट्रेन, 1970), ये रेशमी जुल्फें, ये शरबती आंखें (दो रास्ते, 1969), अकेले हैं चले आओ जहां हो (राज़, 1967), गुन गुना रहे हैं भंवरें (आराधना, 1969), यूं हीं तुम मुझसे बात करती हो (सच्चा झूठा, 1970) आदि। लेकिन राजेश खन्ना किशोर कुमार को ही अपनी आवाज़ समझते थे। यही वजह थी कि फिल्म हाथी मेरे साथी के सभी गीत राजेश खन्ना के लिए गाने हेतु किशोर कुमार को अनुबंध किया गया।
जब इस फिल्म के गीत ऩफरत की दुनिया को छोड़कर की रिकॉर्डिंग का समय आया तो किशोर कुमार ने इसे गाने से इंकार कर दिया। वह चाहते थे कि इस गीत को मुहम्मद ऱफी गाए, क्योंकि वह ही इसके बोलों से इंस़ाफ कर सकते थे। फिल्म के संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल भी किशोर कुमार की राय से सहमत थे।
किशोर की मदद से रफ़ी ने गाया ‘हाथी मेरे साथी
लेकिन राजेश खन्ना एकदम इसके पक्ष में नहीं थे और उस समय सुपरस्टार होने के नाते उनकी ऐसी तूती बोल रही थी कि उन्हें न कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी, आखिर वह लगातार दर्जन से अधिक हिट फिल्में दे चुके थे। बहरहाल, किशोर कुमार अपनी ज़िद पर अड़ गए। उन्होंने ऩफरत की दुनिया को छोड़कर गीत गाने से स़ाफ इंकार कर दिया।
आख़िरकार फिल्म के निर्देशक एम.ए. थिरुमुगम और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के बहुत समझाने पर राजेश खन्ना बेमन से मान ही गए। लेकिन अब समस्या यह थी कि मुहम्मद ऱफी उस समय भारत में नहीं थे, वह अपने वर्ल्ड टूर के सिलसिले में इंग्लैंड में थे और उन्हें तीन माह बाद स्वदेश लौटना था।
निरंतर बढ़ते ब्याज को देखते हुए निर्माता फिल्म को इतनी देर तक रोकने की स्थिति में नहीं थे। लिहाज़ा किशोर कुमार से कहा गया कि वह ही कोई हल निकालें। किशोर कुमार ने मुहम्मद ऱफी को बुलाने की ज़िम्मेदारी ली। उन्होंने ऱफी को फोन किया, उनसे मुंबई आने के लिए कहा। ऱफी अपना कार्पाम छोड़कर इंग्लैंड से दो घंटों के लिए मुंबई आए, रिकॉर्डिंग की, लौट गए और नफरत की दुनिया छोड़कर फिल्म हाथी मेरे साथी का सबसे सफल गीत साबित हुआ, जिसे दर्शक अपनी ज़बान पर व आंखों में आंसू लेकर सिनेमाघर से बाहर निकले।
किशोर और रफ़ी: कला में मित्र, न प्रतिस्पर्धा
यह क़िस्सा किशोर द्वारा फिल्म का सबसे हिट गीत ऱफी को देना और ऱफी का मात्र एक फोन कॉल पर समुंदर पार से अपना कार्पाम बीच में छोड़कर मुंबई आना इस तथ्य का साक्षी है कि उन दोनों महान गायकों में न प्रतिद्वंद्विता थी, न दुश्मनी और न ईर्ष्या बल्कि एक-दूसरे के लिए अपार सम्मान व स्नेह था। वे एक-दूसरे की कला की इज़्ज़त करते थे। दोनों में गहरी दोस्ती थी। किशोर कुमार के बेटे अमित कुमार और मुहम्मद ऱफी के बेटे शाहिद ऱफी का कहना है कि वे दोनों आपस में बहुत गहरे दोस्त थे।
एक-दूसरे के घर पर चाय, स्नैक्स व डिनर के लिए आया-जाया करते थे। गौरतलब है कि आपातकाल के दौरान जब रेडियो पर किशोर कुमार के गानों के प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, तो मुहम्मद ऱफी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से सिफारिश करके इस प्रतिबंध को हटवाया था।
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जब मुहम्मद ऱफी का निधन हुआ तो संभवत सबसे अधिक दुःख किशोर कुमार को हुआ था, उन्हें संभालना भारी पड़ गया था। वह लगभग दो घंटे तक मुहम्मद ऱफी के पार्थिव शरीर को पकड़े हुए रोते रहे। इसलिए यह प्रतिद्वंद्विता या दुश्मनी की कहानी एकदम बोगस है। दोनों महान गायक थे, अपने हुनर पर विश्वास करते हुए एक-दूसरे की कला का सम्मान करते थे। किशोर जहां गाइड व हम दोनों के गानों की तारीफ करते हुए नहीं थकते थे, वहीं ऱफी ज्वेल थीफ के गानों से प्रभावित थे।
कैलाश सिंह
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