कठोर तप का आचरण करने वाली माता ब्रह्मचारिणी

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नवरात्रि के दूसरे दिन भगवती दुर्गा के द्वितीय स्वरूप देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना की जाती है। ब्रह्मचारिणी शब्द का अर्थ है- ब्रह्म अर्थात तपस्या का आचरण करने वाली। यह देवी के उस रूप को समर्पित है, जब उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हजारों वर्षों तक कठिन तप किया था। देवी भागवत, पुराण और मार्कण्डेय पुराण तथा श्रीदुर्गा सप्तशती आदि पौराणिक ग्रंथों में देवी ब्रह्मचारिणी का विस्तृत विवरण है।

माता ब्रह्मचारिणी का चरित्र दृढ़-इच्छाशक्ति और धैर्य का दर्शन है। वे हमें सिखाती हैं कि बिना संघर्ष के सिद्धि प्राप्त नहीं होती। देवी ब्रह्मचारिणी की कथा उनके अटूट संकल्प और तपस्या की पराकाष्ठा का जीवंत उदाहरण है। देवी भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के रूप में देह त्यागने के बाद देवी ने पर्वतराज हिमालय और माता मैना की पुत्री पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया।

जब वे विवाह योग्य हुईं, तब देवर्षि नारद ने उन्हें उनके पूर्वजन्म के बारे में बताया और कहा कि यदि वे कठिन तपस्या करें, तो पुन भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त कर सकती हैं। नारद के परामर्श पर देवी ने राजसी सुखों का त्याग कर वन में तपस्या की। तप के प्रथम चरण में एक हजार वर्षों तक उन्होंने केवल फलों और फूलों का आहार किया।

सच्चे संकल्प और विश्वास से कठिन तपस्या में सफलता

द्वितीय चरण में अगले सौ वर्षों तक उन्होंने केवल जमीन पर रहकर शाक (सब्जियां) खाकर जीवन व्यतीत किया। तृतीय चरण में इसके पश्चात तीन हजार वर्षों तक उन्होंने केवल सूखे बिल्व-पत्र खाए। तपस्या के अंतिम चरण में उन्होंने सूखे पत्ते खाना भी छोड़ दिया और कई वर्षों तक निर्जल व निराहार रहकर तप किया। पत्तों का त्याग करने के कारण देवताओं ने उन्हें अपर्णा पुकारा।

उनकी अत्यंत क्षीण अवस्था को देखकर माता मैना ने दुःखी होकर पुकारा- ओ मा! (अरे, ऐसा मत करो), जिससे उनका नाम उमा पड़ा। उनकी तपस्या की तीव्रता देख स्वयं महादेव ने एक वृद्ध ब्राह्मण ब्रह्मचारी का वेष धारण कर परीक्षा ली। उन्होंने शिव की बुराई की और पार्वती को उनसे विवाह न करने की सलाह दी। किंतु देवी अपने संकल्प पर अडिग रहीं। उनकी दृढ़ता देख शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए और उन्हें स्वीकार किया।

अंतत पितामह ब्रह्मा प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि ऐसी कठोर तपस्या आज तक किसी ने नहीं की। उन्होंने देवी को आशीर्वाद दिया कि उनकी मनोकामना पूर्ण होगी और भगवान शिव उन्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। यह कथा सिखाती है कि यदि मन में सच्चा विश्वास और अटूट संकल्प हो, तो असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।

माता ब्रह्मचारिणी: तप, त्याग और साधना की प्रेरणा

देवी का यह स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और भव्य है। इनके स्वरूप का हर प्रतीक आध्यात्मिक संदेश देता है। श्वेत वस्त्र पवित्रता, शांति और निर्मलता का प्रतीक हैं। दाहिने हाथ में जप माला निरंतर अभ्यास और मंत्र साधना का सूचक है। बायें हाथ में कमंडल जल रूपी ज्ञान और शुद्धि का प्रतीक है।

योग शास्त्र के अनुसार, माता ब्रह्मचारिणी की पूजा स्वाधिष्ठान पा में ध्यान लगाकर की जाती है। इनकी कृपा से साधक में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। कठिन समय में संबल प्रदान करता है। यह स्वरूप सिखाता है कि लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में चाहे कितनी भी बाधाएं आएं, कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए। माता ब्रह्मचारिणी की आराधना का मंत्र है-

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

अर्थात- जिनके एक हाथ में अक्षमाला और दूसरे में कमंडल है, वे अनुपम ब्रह्मचारिणी देवी मुझ पर प्रसन्न हों। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार माता ब्रह्मचारिणी का संबंध मंगल ग्रह से है। नवग्रहों में मंगल को सेनापति माना जाता है, जो साहस, ऊर्जा और अनुशासन का प्रतीक है। जिन जातकों की कुंडली में मंगल दोष या मंगल अशुभ हो तो उन्हें माता ब्रह्मचारिणी की पूजा फलदायी मानी जाती है।

माता ब्रह्मचारिणी: मंगल दोष निवारण और स्वास्थ्य लाभ

उनकी साधना से अत्यधिक क्रोध, दुर्घटनाएं या विवाह में देरी आदि मंगल के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। यह छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए विशेष रूप से लाभकारी है, क्योंकि यह एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ाती है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि के दूसरे दिन उनकी पूजा करने से व्यक्ति को आरोग्य प्राप्त होता है। मंगल रक्त का कारक है, इसलिए रक्त संबंधी समस्याओं का समाधान होता है।

माता ब्रह्मचारिणी को सफेद और पीला रंग अत्यंत प्रिय है। सफेद रंग चंद्रमा (मन की शांति) और पीला रंग गुरु (ज्ञान) का प्रतीक है, जो मंगल की उग्रता को संतुलित करते हैं। उन्हें चीनी, मिश्री और पंचामृत का भोग लगाया जाता है, जो लंबी आयु और सौभाग्य का आशीर्वाद प्रदान करता है। आयुर्वेद और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार नवदुर्गा के प्रत्येक स्वरूप का संबंध एक विशिष्ट औषधि या जड़ी-बूटी से है।

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माता ब्रह्मचारिणी का सीधा संबंध ब्राह्मी नामक जड़ी-बूटी से माना गया है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार इन औषधियों को दुर्गा कवच भी कहा जाता है, क्योंकि ये बीमारियों से रक्षा करती हैं। आयुर्वेद के अनुसार ब्राह्मी का सेवन स्वर को मधुर और स्पष्ट बनाता है, इसलिए इसे सरस्वती के नाम से भी जाना जाता है। ब्राह्मी रक्त से संबंधित दोषों को दूर करने और रक्त संचार को बेहतर बनाने में प्रभावी है।

-अशोक प्रवृद्ध

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