माता पार्वती का द्यूत को श्राप

द्यूत-क्रीड़ा की परंपरा आदि काल से चली आ रही है। लोग इसे खेलकर सौभाग्य से युक्त होना चाहते हैं, किंतु सनतकुमार संहिता के अनुसार द्यूत भगवान शंकर का ऐसा दूत है, जो मनुष्य के संपूर्ण संचित धर्म को नष्ट करके स्वयं ले लेता है। इसी से संबंधित एक कथा है।

कथा

महेश्वर एवं देवी पार्वती कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को द्यूत-क्रीड़ा में व्यस्त थे। देवी पार्वती ने द्यूत-क्रीड़ा में भगवान शंकर से तीनों लोकों को जीत लिया, जिससे महेश क्रोधित हो गए और गंगातट पर जाकर बैठ गए। कुमार कार्तिकेय ने महेश्वर से उनकी निराशा का कारण पूछा। सब कुछ जानकर कार्तिकेय ने महेश्वर से द्यूत-विद्या सीखी। इसके बाद कार्तिकेय ने माता पार्वती के साथ द्यूत-क्रीड़ा करके उनसे तीनों लोक जीतकर महेश्वर को अर्पित कर दिए।

माता पार्वती इसी आशा में थीं कि महेश्वर अपने हारे हुए लोक लेने के लिए उनके पास आएंगे, तो वह उन्हें मना लेंगी। किंतु कार्तिकेय ने उनकी आशा पर पानी फेर दिया था। माता पार्वती ने गणेश को द्यूत-विद्या सिखाकर महेश्वर के पास भेजा। गणेश ने महेश्वर को द्यूत-क्रीड़ा में हराकर सभी लोक जीतकर माता पार्वती को दे दिए। इससे प्रसन्न होकर माता ने गणेश को आशीर्वाद दिया। गणेश से माता पार्वती ने कहा- हे पुत्र! साम, दाम, दण्ड, भेद, किसी भी प्रकार से महेश्वर को वापस घर लाइये अन्यथा मैं प्राण त्याग दूंगी।

दूसरी ओर महेश्वर को चिंतित बैठा देखकर भगवान विष्णु, कार्तिकेय एवं नारद ने तीन पाँसे वाले एक द्यूत का निर्माण किया, जिसका एक पाँसा स्वयं लक्ष्मीपति बने। एक भूमिका बनाकर नारद रावण के यहां गए। रावण ने नारद के बताए अनुसार कार्य करने की स्वीकृति दे दी। माता पार्वती के आदेशानुसार गणेश मूषक वाहन पर द्रुतगति से महेश्वर के पास जा रहे थे। रावण ने बीच रास्ते में बिलावड़ की आवाज़ में चूहे को डराया, तो वह भागकर बिल में छिप गया।

इस कारण गणेश जी को अपने गंतव्य तक पैदल जाना पड़ा। दूसरी ओर, भगवान विष्णु पाँसे का रूप धारण कर ही रहे थे कि गणेश ने उन्हें देख लिया। वे महेश्वर के पास गए और माता पार्वती का संदेश सुनाते हुए बोले- ‘हे देवों के देव! माता पार्वती आपका स्मरण कर रही हैं। अगर कुछ पल इसी प्रकार व्यतीत हो जाएंगे तो वे अपना प्राणांत कर लेंगी।’

महेश्वर ने शीघ्र आने का वचन देकर गणेश को विदा किया। गणेश पैदल मातृ-महल की ओर चल पड़े। इसी बीच भगवान विष्णु, नारद एवं रावण महेश्वर के समक्ष प्रस्तुत हुए और उन्हें माता पार्वती से द्यूत-क्रीड़ा के लिए मना लिया। माया रचकर तीनों गणेश के पहुंचने से पहले ही माता के महल में पहुंच गए।

महेश्वर ने माता पार्वती से कहा- ‘देवी! पहले आपको मुझसे द्यूत-क्रीड़ा करनी होगी। मैंने इस कार्य हेतु पाँसों का निर्माण किया है। यदि आप जीत गईं तो मैं आपके साथ रहूंगा।’
खेल आरंभ हुआ और महेश्वर जीतते चले गए। इस बीच गणेश वहां पहुंच गये। उन्होंने माता से कहा-‘महा माता! इन पाँसों से मत खेलिए, क्योंकि इनमें से एक स्वयं भगवान विष्णु हैं। इस तरह आपके साथ छल किया जा रहा है।’ गणेश की बात सुनकर माता पार्वती की आँखें ज्वालामयी हो गईं। उन्होंने श्राप देते हुए कहा- ‘मैं तुम सभी को श्राप देती हूं। एक अबला से छल करने के अपराध में महेश्वर का मस्तक सदैव अबला के भार से नत रहेगा। इधर-उधर सदा चिंगारी लगाने के कारण स्वप्न में भी नारद को किसी स्त्रा का सहचर्य प्राप्त नहीं होगा।

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भगवान विष्णु की पत्नी का अपहरण रावण करेगा। इस छल में सहयोगी बनने के कारण उसे विष्णु के हाथों मरना पड़ेगा। इस छल में सहयोग देने के कारण कार्तिकेय को भी श्राप देती हूं कि वे न कभी युवा होंगे और न ही बूढ़े। महेश्वर के दूत द्यूत को श्राप देती हूं कि वह जिस घर में जाएगा, वहाँ की सुख-संपत्ति एवं खुशी को नष्ट कर देगा।’ माता पार्वती के श्राप का प्रभाव सब पर पड़ा, जिस कारण श्रापित द्यूत जहाँ होता है, वह उस घर को नष्ट कर देता है।

-परमानंद परम

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