धरा से संवाद
कल सुबह के मौसम में हल्की-हल्की ठंडक थी और दूब पर ओस की बूँदें ठहरी थीं। मैं रोज़ की तरह नंगे पैर अपने बगीचे की हरी घास पर टहल रहा था। माना जाता है कि नंगे पैर धरती के संपर्क में आने से हमारा मानसिक तनाव कम होता है और शरीर को नई ऊर्जा मिलती है। ओस से भीगी उस मिट्टी की ठंडी छुअन ने मेरे मन को भीतर तक शांत कर दिया था। अचानक मुझे अपनी वैदिक परंपरा का वह भूमि-वंदना मंत्र याद आया, जिसमें हम सुबह बिस्तर से उठकर धरती पर पैर रखने से पहले क्षमा मांगते हैं- समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे।
अर्थात् समुद्र रूपी वस्त्र धारण करने वाली, पर्वत रूपी स्तनों वाली एवं भगवान श्रीविष्णु की पत्नी हे भूमिदेवी! मैं आपको नमस्कार करता हूं। मैरे पैरों का आपको स्पर्श होगा। इसके लिए आप मुझे क्षमा करें। मेरे मन में एक प्रश्न उठा कि जो धरती माता हमें इतना सब कुछ देती है, फिर भी हम प्रतिदिन उसी की छाती पर पैर रखते हैं। इसी कृतज्ञता और अपराधबोध के बीच मेरा धरती माँ से एक मौन संवाद शुरू हो गया।
मैंने कहा, हे वसुंधरे! हम मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए कभी हल चलाकर तुम्हारा सीना चीरते हैं, और बड़े-बड़े कींट के जंगल बनाकर तुम पर भारी बोझ लादते हैं। यहाँ तक कि प्रदूषण का ज़हर भी घोलते हैं। फिर भी तुम उफ तक नहीं करतीं और बदले में हमें अन्न, जल और आश्रय देती हो। तुम्हारी इस असीम सहनशीलता और क्षमा का रहस्य क्या है?
धरा का स्वर किसी ममतामयी माँ की तरह मेरे अंतर्मन में गूंजा- पुत्र! क्या कोई माँ अपने बच्चों के प्रहार से कभी क्रोधित होती है? अथर्ववेद का वह उद्घोष याद करो- माता भूमि: पुत्रो? हं पृथिव्या: अर्थात भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ। तो जब तुम मुझे अपनी माँ मानते हो तो फिर मैं अपने पुत्र पर क्रोधित कैसे हो सकती हूँ? और देखो, एक माँ का स्वभाव तो केवल देना होता है।
तुम जब मेरे सीने को हल से चीरते हो, तो मैं उसे घाव नहीं, बल्कि एक नए बीज को जन्म देने की प्रक्रिया मानती हूँ। मेरा यह धैर्य मेरी कोई विवशता नहीं, बल्कि मेरे मातृत्व का बल है। मैं नतमस्तक था। मैंने विस्मित होकर दूसरा प्रश्न किया- तुम्हारे ऊपर इतने विशाल पर्वतों, महासागरों और करोड़ों जीवों का भार है। तुम बिना विचलित हुए इतना सब कुछ कैसे सँभाल लेती हो? क्या तुम कभी थकती नहीं?
धरती ने एक गहरा दार्शनिक सूत्र देते हुए कहा- मुझे मेरे प्राकृतिक भार से थकान नहीं होती, अगर मुझे थकान होती है तो वह तुम्हारे लालच और अहंकार से होती है। मेरी माँ होने के नाते मुझे कोई शिक्षा नहीं दोगी? पुत्र अगर तुम मुझसे कुछ सीखना चाहते हो तो वह यह है कि जीवन में जिम्मेदारियों और संकटों का कितना भी बड़ा भार क्यों न आ जाए, अपना मानसिक संतुलन और धैर्य कभी मत खोना। जो विपरीत परिस्थितियों में भी बिना किसी शिकायत के समभाव रहता है, वही वास्तव में मुझे धारण करता है। यही तितिक्षा या आध्यात्मिक सहनशीलता है।

सूरज अब पूरी तरह निकल आया था। उसकी सुनहरी किरणें धरती को रोशन कर रही थीं। मुझे समझ आ गया था कि जीवन की असली सार्थकता केवल हवा में उड़ने में नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से, अपनी मिट्टी से जुड़े रहने में है। आज धरा के साथ इस संवाद ने मुझे सब कुछ सहकर भी निस्वार्थ प्रेम करना सिखा दिया। मैंने झुककर उस पवित्र मिट्टी को अपने माथे से लगाया और अपने घर की ओर चल पड़ा। अब मेरे कदमों में एक नई विनम्रता थी और हृदय में क्षमा का असीम भाव।
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