मातृभाषा : शिक्षा और युवा स्वर
हर वर्ष 21 फरवरी को विश्वभर में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। यह दिन भाषा, संस्कृति और अस्मिता के प्रति सम्मान का वैश्विक प्रतीक है। यूनेस्को ने 17 नवंबर, 1999 को इस दिवस की घोषणा की और वर्ष 2000 से इसे विश्व स्तर पर मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य भाषाई विविधता को सुरक्षित रखना, भाषा-अधिकारों के लिए हुए संघर्षों को स्मरण करना तथा बहुभाषी शिक्षा के महत्व को उजागर करना है। वर्ष 2026 की थीम – बहुभाषी शिक्षा पर युवा स्वर – इस बात पर बल देती है कि भाषा का भविष्य युवाओं की सक्रिय भागीदारी पर निर्भर है।
इस दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 21 फरवरी, 1952 की उस घटना से जुड़ी है, जब तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में बांग्ला को राजभाषा का दर्जा देने की माँग कर रहे छात्रों पर ढाका में पुलिस ने गोली चलाई। नौछात्र शहीद हुए। अनेक घायल। अनेक गिरफ्तार। यह घटना भाषा और अस्मिता के गहरे रिश्ते को उजागर करती है। भारत भाषाई विविधता का अनूठा उदाहरण है।
भारत की जनगणना (2011) के अनुसार देश में 19,500 से अधिक मातृभाषाएँ/बोलियाँ दर्ज की गईं, जिनमें 121 भाषाएँ ऐसी हैं जिनके 10,000 से अधिक बोलने वाले हैं। भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है। भारतीय मातृभाषा सर्वेक्षण (एमटीएसआई) ने 576 जीवित भाषाओं का उल्लेख किया है। दूसरी ओर, यूनेस्को के आकलनों के अनुसार भारत में लगभग 197 भाषाएँ विलुप्ति के कगार पर हैं, जिनमें कई गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्रेणी में आती हैं। वैश्विक स्तर पर भी लगभग 7,000 भाषाओं में से एक बड़ी संख्या का भविष्य असुरक्षित माना जा रहा है। यह स्थिति हमें सचेत करती है कि भाषा-संरक्षण केवल सांस्कृतिक विषय नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न है।
मातृभाषा: पहली सीख और आत्मविश्वास की आधारशिला
दरअसल, मातृभाषा मनुष्य की पहली सीख और पहली अभिव्यक्ति है। हम उसी भाषा में सोचते और सपने देखते हैं, जिसमें हमें बचपन में लोरी सुनाई गई होती है। यही भाषा व्यक्तित्व निर्माण की आधारशिला रखती है और आत्मविश्वास को पुष्ट करती है। लोरी, लोकगीत, लोककथाएँ और पारिवारिक संवाद मातृभाषा के माध्यम से ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होते हैं। कबीर, तुलसी और प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों की व्यापक लोकप्रियता इस तथ्य की पुष्टि करती है कि लोकभाषा में व्यक्त साहित्य जनमानस से सीधा संबंध स्थापित करता है।
शिक्षा के क्षेत्र में मातृभाषा का महत्व वैज्ञानिक शोधों से भी प्रमाणित है। प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होने पर विद्यार्थियों की समझ गहरी होती है, आत्मविश्वास बढ़ता है और रचनात्मकता विकसित होती है। भारत की नई शिक्षा नीति 2020 ने भी प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा/स्थानीय भाषा में शिक्षा को प्रोत्साहित किया है। 2026 की थीम विशेष रूप से युवाओं की भूमिका पर बल देती है। आज के युवा डिजिटल माध्यमों, सामाजिक मंचों और तकनीकी नवाचारों के जरिए अपनी भाषाओं को नई पहचान दे सकते हैं। बहुभाषी शिक्षा उन्हें वैश्विक अवसरों के साथ ही अपनी जड़ों से भी जोड़े रखती है। क्योंकि भाषा केवल सांस्कृतिक पहचान ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रशासनिक व्यवस्था से भी जुड़ी है।
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घर और डिजिटल मंचों पर मातृभाषा का सक्रिय प्रयोग
आज ज़रूरत है कि भाषा-संरक्षण को केवल सरकारी जिम्मेदारी न माना जाए। घर में मातृभाषा का प्रयोग, अपनी भाषा के साहित्य का अध्ययन और क्रय, डिजिटल मंचों पर सक्रिय उपस्थिति, शोध और ज्ञान-सृजन में स्थानीय भाषाओं का उपयोग – ये सब नागरिक दायित्व हैं। बहुभाषिकता भारत की शक्ति है; इसे बोझ नहीं, धरोहर समझना होगा।
अंततः अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस हमें स्मरण कराता है कि भाषा केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि हमारी स्मृतियों, संस्कारों और स्वाभिमान की जीवंत अभिव्यक्ति है। यदि युवा पीढ़ी बहुभाषी शिक्षा और भाषा-संरक्षण का नेतृत्व करती है, तो भारत की भाषाई विविधता न केवल सुरक्षित रहेगी, बल्कि और अधिक सशक्त और समृद्ध भी होगी। कहना न होगा कि भारतेंदु हरिश्चंद्र का यह आह्वान आज भी प्रासंगिक है कि-
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के,मिटत न हिय को सूल।।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।
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