नवपद ओली है एक आध्यात्मिक पर्व

नौ दिन पौषध, अंतिम दिन नवपद का विस्तार से पूजा-पाठ, रात्रि जागरण आदि का अवश्य पालन करना चाहिए। हर पद का अपना महत्व है। हो सके तो उसके अनुकूल आयंबिल आहार ग्रहण करें, ऐसी जिन आशा है। ज्ञान, विनय, विवेक के विलक्षण परम गीतार्थ महोपाध्याय श्रीविनय विजय महाराज द्वारा संघ के आग्रह पर वर्ष 1738 में रांदेर चातुर्मास में ‘श्रीरास’ की रचना प्रारंभ की गयी थी, परंतु 750 गाथा की रचना करने के बाद वो पुण्य पुरुष स्वर्ग सिधार गये और शेष रास पूज्य महोपाध्याय श्रीयशो विजय महाराज द्वारा पूर्ण किया गया।

‘श्री पाल मयणा रास’ में पूजा, आराधना एवं भक्ति की दृष्टि से ‘श्री सिद्धचक्र यंत्र’ का भी अत्याधिक महत्व है। गुरूदेव श्रीमुनि सुंदरसूरी महाराज ने आगम ग्रंथों का मंथन करके ‘श्री सिद्धचक्र यंत्र’ तैयार किया और मयणा सुंदरी को उसकी संपूर्ण विधि बताते हुए कहा कि जैन धर्म शासन में पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के समान ही नवपद शाश्वत ओली जी भी एक आध्यात्मिक पर्व है। यह पर्व वर्ष में दो बार (चैत्र व आसोज) त्याग, तप एवं आराधना के साथ मनाया जाता है।

नवपद ओली: तप, पूजा और त्याग से आत्मशुद्धि का मार्ग

नौ दिवसीय ओली पर्व का प्रारंभ भगवान महावीर स्वामी की आज्ञा से गणधर गौतम स्वामी ने मगध सम्राट महाराजा श्रेणिक व उनके मंत्रीश्वर अभय कुमार को मंगलकारी दर्शन देकर किया। जिस प्रकार जैन धर्म में जीव अजीव, पुण्य-पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष आदि नव-तत्वों का समावेश मुख्य रूप से है, उसी प्रकार ओली जी पर्व में अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु-साध्वी, दर्शन, ज्ञान-चरित्र एवं तप की आराधना करने का विधान है।

गणधर गौतम स्वामी ने अपनी देशना में महाराज श्रीपाल कुमार, मालवा देश उज्जैनी नगरी के प्रजापालक राजा, सौभाग्य सुंदरी और मयणा सुंदरी के चरित्र को विस्तार से सुनाया था। मुख्य रूप से यह कथा कर्म, पुरुषार्थ और धर्म आराधना, तप एवं त्याग पर आधारित है। इसमें पुण्यानुबंधी पुण्य के प्रभाव से सर्वत्र विजय होती है। अतः उसके महत्व को दर्शाया गया है। प्राचीन समय से शाश्वत पर्व में जिस सूत्र का वाचन किया जाता है, उसका नाम है- ‘श्रीपाल मयणा रास।’

जैन जसराज देवड़ा ‘धोका’

आचार्य भगवंतों के अनुसार आराधकों को इन पर्वों की कम से कम नौ बार आराधना करने का विधान है। प्रतिदिन आयंबल तप, जाप, नवकारसी, काउस्सग स्वस्तिक, प्रदक्षिणा खमासणा आदि साधु-साध्वी भगवंतों की निश्रा में करने का विधान है। आराधक को प्रतिदिन उभय काल प्रतिक्रमण, प्रतिलेखन, देव-वंदन, प्रभु-दर्शन, वंदन-पूजन, सिद्धचक्र, वासक्षेप पूजा, नौ अलग अलग जिनालयों में चैत्य-वंदन, जिनवाणी श्रवण, निंदा-विकथादि का संपूर्ण त्याग, संभव हो तो नौ दिन पौषध, अंतिम दिन नवपद का विस्तार से पूजा-पाठ, रात्रि जागरण आदि का अवश्य पालन करना चाहिए। हर पद का अपना महत्व है। हो सके तो उसके अनुकूल आयंबिल आहार ग्रहण करें, ऐसी जिन आशा है।

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