गंगा और नर्मदा जैसी महान नदी है ताप्ती

ताप्ती जिसे तापी नदी भी कहते हैं, भारत की उन चुनिंदा बड़ी पश्चिम वाहिनी नदियों में से है, जो मध्य भारत से निकलकर सीधे अरब सागर में गिरती है। यह विशेषता इसे गंगा जैसी विशाल पूर्व वाहिनी नदी और नर्मदा जैसी महान पश्चिम वाहिनी नदी के समकक्ष ला खड़ा कर देती है। भौगोलिक, आर्थिक, पारिस्थितिक और सांस्कृतिक स्तरों पर इस नदी का योगदान अत्यंत व्यापक है। ताप्ती नदी का उद्गम मध्यप्रदेश के बेतूल जिले के पास सतपुड़ा पर्वतमाला में है।

यहां से लगभग 724 किलोमीटर की यात्रा तय करते हुए महाराष्ट्र और गुजरात से गुजरती यह नदी अंतत अरब सागर में जा मिलती है। इसके किनारे सूरत जैसा औद्योगिक और व्यापारिक शहर स्थित है। ताप्ती नदी का जलभरण क्षेत्र लगभग 65 हजार वर्ग किलोमीटर है। यह पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली 724 किलोमीटर लंबी इस नदी सहायक नदियां हैं- पूर्णा, गिर्णा, वाघुर और अंजली। इसका मुहाना अरब सागर में बनता है। ताप्ती को गंगा और नर्मदा के समकक्ष महानदी इसलिए माना जाता है, क्योंकि यह भी इन्हीं की तरह विशाल नदी घाटी प्रणाली बनाती है।

कपास, सोयाबीन और गन्ने की खेती के लिए प्रसिद्ध ताप्ती घाटी

ताप्ती बेसिन एक स्वतंत्र और बड़ा जलग्रहण क्षेत्र है, जो लाखों लोगों की कृषि, पेयजल और औद्योगिक आवश्यकताओं को पूरा करती है। जैसे गंगा नदी घाटी में प्राचीन सभ्यताएं विकसित हुईं, वैसे ही ताप्ती घाटी में भी आदिवासी समाज, कृषि संस्कृतियां और व्यापारिक नगर विकसित हुए। ताप्ती घाटी कपास, सोयाबीन, गन्ना, केला और विभिन्न तरह की दालों की खेती के लिए प्रसिद्ध है। कृषि आधारित जीवनरेखा की भूमिका निभाने वाली ताप्ती को अनेक स्थानों में पवित्र नदी का दर्जा दिया जाता है और इसके किनारे मेले और पवित्र स्नानों से संबंधित पर्व सम्पन्न होते हैं।

ताप्ती के तट में अनेक महत्वपूर्ण मंदिर स्थित हैं। जहां तक इसके बहाव की गति की बात है, तो शुष्क मौसम में इसका बहाव 0.3 से 0.6 मीटर प्रतिसेकंड होता है, जबकि मानसून में यह 1.5 से 3 मीटर प्रतिसेकंड तक पहुंचता है। पश्चिम वाहिनी होने के कारण इसमें ढाल अपेक्षाकृत ज्यादा है, जिसके कारण इसका प्रवाह पूर्वगामी नदियों के मुकाबले ज्यादा है, जिससे जल विद्युत उत्पादन के लिए ताप्ती महत्वपूर्ण नदी मानी जाती है। इसका औसत वार्षिक प्रवाह 17 से 18 बिलियन घन मीटर है। इसका अधिकांश भाग जून से सितंबर यानी मानसून के दौरान प्राप्त होता है।

ताप्ती की पारिस्थितिकी में मछलियों और वन्यजीवों की समृद्ध विविधता

ताप्ती नदी की वर्षा पर निर्भरता करीब 75 फीसदी है और शेष 25 फीसदी जलराशि इसके भूजल, पुनर्भरण और सहायक नदियों के जरिये प्राप्त होता है। इसके पानी का उपयोग सिंचाई के लिए, पेयजल के रूप में, औद्योगिक उपयोग हेतु तथा विद्युत उत्पादन आदि में किया जाता है। ताप्ती नदी की मिट्टी जलोढ़ है, जो अत्यंत उपजाऊ होती है। यह ग्रामीण रोजगार का भी बड़ा आधार है। गंगा की तरह ताप्ती को भी अन्न भंडार के रूप में देखा जाता है। भले इसका क्षेत्रफल गंगा के मुकाबले काफी छोटा हो।

ताप्ती के किनारे स्थित शहर विशेष रूप से कपड़ा, रसायन, हीरा कटाई और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के लिए प्रसिद्ध हैं। इससे लाखों रोजगार और शहरी विकास को बल मिलता है। इसकी पारिस्थितिकी में मीठे पानी की अनेक महत्वपूर्ण प्रजातियों की मछलियां पायी जाती हैं, जिनमें रोहू, कतला और मृगल शामिल हैं। सतपुड़ा क्षेत्र से गुजरते समय यह नदी कई वन क्षेत्रों को जीवन देती है, जिसमें हिरण, तेंदुआ, भालू जैसे जीवों को पानी और भोजन मिलता है। ताप्ती नदी के डेल्टा क्षेत्र में पक्षियों की कई प्रजातियां पायी जाती हैं और प्रवासी पक्षियों का भी यह आश्रयस्थल बनती है।

जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रही ताप्ती की जैव विविधता

ताप्ती बेसिन में नदी का पानी आसपास के जलस्रोतों को भरता है, जिससे कुओं, नलकूपों आदि में पूरे साल जल उपलब्ध रहता है, लेकिन देश की दूसरी महा नदियों की तरह ताप्ती भी कई तरह की औद्योगिक और पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रही है। इस नदी में भी बड़े पैमाने पर शहरी अपशिष्ट आकर मिलता है तथा इसमें भी अवैध रेत खनन आदि की घटनाएं होती हैं। हाल के कुछ सालों में जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित वर्षा की भी यह शिकार हुई है। जिससे इसकी गुणवत्ता और जैव विविधता दोनों प्रभावित हुई हैं।

ताप्ती के संरक्षण के लिए कई कदम उठाये गये हैं। जैसे अपशिष्ट जलशोधन संयंत्र, नदी किनारे हरित पट्टी का विकास, सामुदायिक जागरुकता और सतत जल प्रबंधन। कुल मिलाकर देश की महान नदियों में से एक ताप्ती का भौगोलिक विस्तार, आर्थिक योगदान, सांस्कृतिक भूमिका और पारिस्थितिक महत्ता, इसे सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक बनाती है।

-वीना गौतम

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