माता शीतला को लगाएँ दही-चांवल का भोग

चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को माता शीतला के निमित्त व्रत व पूजा करने की परंपरा है। मान्यता है कि यह व्रत व पूजा करने से चेचक, खसरा और अन्य पांमण रोगों से मुक्ति मिलती है। इस व्रत को बसौड़ा भी कहा जाता है। इस पूजा में माता शीतला को बासी-भोग अर्पित किया जाता है, क्योंकि बासी भोजन का भोग अर्पित करने से माता शीतला बहुत प्रसन्न होती हैं। बहुत से लोगों के मन में ये सवाल आता है कि शीतला अष्टमी पर माता को आखिर बासी भोजन का ही भोग अर्पित क्यों किया जाता है?

सनातन संस्कृति में सभी देवी-देवताओं को ताजा भोग अर्पित किया जाता है, लेकिन सिर्फ माता शीतला को ही बासी भोजन का भोग अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शीतला माता को ठंडी चीजें अत्यंत प्रिय है। यही कारण है कि माता को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। बसौड़ा से एक दिन पहले ही शीतला माता को लगाने वाला भोग तैयार कर लिया जाता है।

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शीतला अष्टमी के दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाने की परंपरा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि शीतला अष्टमी पर घरों में चूल्हा नहीं जलाने की परंपरा है। शीतला अष्टमी के दिन माता को को ठंडे चावल और घी का भोग अर्पित किया जाता है। इसके अलावा शीतला माता को मीठे चावल और दही चावल भी बहुत प्रिय हैं। शीतला माता को पुए और पूड़ी हलवा का भोग भी अर्पित किया जाता है। अत माता को इन चीजों का भोग अवश्य लगाएं।

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