बंगाल SIR में न्यायिक अधिकारियों की तैनाती का आदेश
नई दिल्ली, पश्चिम बंगाल सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच जारी गतिरोध को लेकर नाखुशी जताते हुए उच्चतम न्यायालय ने राज्य में विवादों से घिरी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में निर्वाचन आयोग की सहायता के लिए सेवारत और पूर्व जिला न्यायाधीशों को तैनात करने का शुक्रवार को असाधारण निर्देश दिया।
निर्वाचन आयोग और लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई तृणमूल कांग्रेस सरकार के बीच दुर्भाग्यपूर्ण आरोप-प्रत्यारोप और विश्वास की कमी पर खेद जताते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने राज्य में एसआईआर प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कई नये निर्देश जारी किए। पीठ ने तार्किक विसंगति सूची में शामिल तथा मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खतरे का सामना कर रहे व्यक्तियों के दावों और आपत्तियों के निपटारे के लिए न्यायिक अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति का आदेश दिया।
आयु और नाम मेल न होने पर उठे गंभीर सवाल
वर्ष 2002 की मतदाता सूची से संतानों के संबंध में तार्किक विसंगतियों में माता-पिता के नाम का मेल न होना और मतदाता तथा उनके माता-पिता की आयु में 15 वर्ष से कम या 50 वर्ष से अधिक का अंतर होना शामिल है। उच्चतम न्यायालय ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल से पश्चिम बंगाल में एसआईआर के काम में सहायता के लिए कुछ न्यायिक अधिकारियों को मुक्त करने और पूर्व न्यायाधीशों को खोजने के लिए कहा।
पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के लिए ए श्रेणी के पर्याप्त अधिकारियों को उपलब्ध नहीं कराने पर कड़ा रुख अपनाया। मुख्य न्यायाधीश पॉल को शनिवार को एक बैठक बुलाने के लिए कहा गया है जिसमें मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), निर्वाचन आयोग के अधिकारी और राज्य के महाधिवक्ता, केंद्र के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल और उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल शामिल होंगे। बैठक का उद्देश्य एसआईआर प्रक्रिया में न्यायिक अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को अंतिम रूप देना है।
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लंबित दावों के पुनर्विचार के लिए विशेष व्यवस्था
पीठ ने कहा, दस्तावेजों की प्रामाणिकता और मतदाता सूची से नाम शामिल करने या हटाने के निर्णय में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए, और दोनों पक्षों द्वारा सहमति के अनुसार, हमारे पास कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचता है कि वे सेवारत न्यायिक अधिकारियों के साथ-साथ अतिरिक्त जिला न्यायाधीश और जिला न्यायाधीशों के पद के कुछ पूर्व न्यायिक अधिकारियों को भी इस कार्य के लिए उपलब्ध कराएँ, ताकि उनसे तार्किक विसंगति की श्रेणी के अंतर्गत लंबित दावों पर पुनर्विचार करने/निपटाने का अनुरोध किया जा सके।
उच्चतम न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को 28 फरवरी तक राज्य में मतदाताओं की मसौदा सूची प्रकाशित करने की अनुमति दी और साथ ही निर्वाचन आयोग को बाद में पूरक सूचियाँ जारी करने की भी अनुमति दी। पीठ ने कहा कि यदि 28 फरवरी के बाद पूरक मतदाता सूचियाँ जारी की जाती हैं, तो किसी को कोई नुकसान नहीं होगा, क्योंकि मतदाताओं के नाम चुनाव के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने की अंतिम तिथि तक शामिल किए जा सकते हैं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची अधिकारियों द्वारा पारित आदेशों की समीक्षा अब एक नये तरह के अधिकारियों द्वारा की जा रही है, जिन्हें अब विशेष मतदाता अधिकारी (एसआरओ) कहा जाता है। निर्वाचन आयोग ने इस दावे का खंडन करते हुए कहा कि एसआरओ शुरुआत से ही मौजूद हैं। पीठ ने निर्वाचन आयोग की दलीलों से सहमति जताई। पीठ ने कहा कि यदि असहयोग जारी रहता है, तो न्यायालय न्यायिक अधिकारियों को तैनात करेगा या निर्वाचन आयोग को अन्य राज्यों से अधिकारियों को तैनात करने के लिए कहेगा।
दावे-आपत्तियों की सुनवाई में न्यायिक निगरानी व्यवस्था
सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर निर्वाचन आयोग को 28 फरवरी तक अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने की अनुमति दी जाती है तो कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है। निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऐसे न्यायिक अधिकारियों/पूर्व न्यायिक अधिकारियों को दावों और आपत्तियों का निर्णय करते समय निर्वाचन आयोग के माइक्रो ऑब्जर्वर और राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा सहायता प्रदान की जाएगी।
पीठ ने कहा, परिस्थितियाँ असाधारण होने के कारण, न्यायिक अधिकारियों और पूर्व न्यायिक अधिकारियों को कार्य सौंपना भी असाधारण है। निर्वाचन आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने असहयोग और कानून-व्यवस्था के उल्लंघन का मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया कि शरारती तत्वों ने दस्तावेजों को फाड़ दिया है, लेकिन फिर भी इस संबंध में कोई खास कार्रवाई नहीं की गई है। उन्होंने विभिन्न राजनीतिक पदाधिकारियों द्वारा निर्वाचन अधिकारियों के खिलाफ दिए गए बयानों को प्रस्तुत किया और कहा कि किसी के भी खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने बयानों का अध्ययन करने के बाद कहा, दुर्भाग्यवश, चुनाव के दौरान इस तरह के गैरजिम्मेदाराना बयान दिए जा रहे हैं। यदि कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो डीजीपी को इसके परिणाम भुगतने होंगे।
न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षा और सहयोग के निर्देश
इसके बाद पीठ ने राज्य के जिलाधिकारियों और एसपी को निर्देश दिया कि वे जारी एसआईआर कवायद के लिए तैनात न्यायिक अधिकारियों को सहायता और सुरक्षा प्रदान करें और साथ ही यह स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारियों द्वारा पारित आदेशों को न्यायालय के आदेश के समान माना जाएगा। पीठ ने कहा कि अदालत द्वारा समय-समय पर जारी किए जाने वाले निर्देशों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जिलाधिकारी और एसपी को प्रतिनियुक्ति पर माना जाएगा।
पीठ ने डीजीपी को एसआईआर प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों को मिली धमकियों से संबंधित शिकायतों पर उाए गए कदमों के बारे में एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। पीठ ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया कि वह तत्काल राहत की आवश्यकता वाले मामलों को दस दिनों के लिए अन्य न्यायालयों में स्थानांतरित करने के लिए कोई वैकल्पिक अंतरिम व्यवस्था करें।
उच्चतम न्यायालय ने नौ फरवरी को राज्यों को स्पष्ट कर दिया था कि वह मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कवायद में किसी को भी बाधा डालने की अनुमति नहीं देगा। पीठ ने पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्वाचन आयोग के इन आरोपों के सिलसिले में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था कि कुछ शरारती तत्वों ने उसकी ओर से जारी नोटिस जला दिए हैं। (भाषा)
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