पापमोचनी एकादशी व्रत यथा नाम तथा फलम्

तिथि मुहूर्त

विक्रम पंचांग के अनुसार, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 14 मार्च, शनिवार की सुबह 8 बजकर 11 मिनट से शुरु हो रही है, जो 15 मार्च, रविवार की सुबह 9 बजकर 17 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर पापमोचनी एकादशी का व्रत 15 मार्च, रविवार को रखा जाएगा।

पारण मुहूर्त

16 मार्च, सोमवार की सुबह 6 बजकर 30 मिनट से 8 बजकर 54 मिनट तक। द्वादशी तिथि का समापन 9 बजकर 40 मिनट के आस-पास होगा। पारण द्वादशी पर ही करना शास्त्र सम्मत है।

शुभ मुहूर्त

इस दिन परिघ योग, शिव योग और द्विपुष्कर योग जैसे शुभ योग भी बन रहे हैं, जो व्रत और पूजा को और अधिक फलदायी बनाते हैं। व्रत वाले दिन सुबह से श्रवण नक्षत्र रहेगा।

सनातन धर्म में वर्ष भर आने वाली प्रत्येक एकादशी तिथि एवं व्रत का विशेष महत्व है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का भी विशेष महत्व है। इसे पापमोचनी एकादशी कहते हैं। इसके नाम से ही पता चलता है कि यह तिथि बेहद फलदायी है, क्योंकि यह पाप का नाश करने वाली है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने से जाने-अनजाने में किए गए सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।

पापमोचनी एकादशी के दिन निम्न कार्यों को करने से बचना चाहिए। तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। एकादशी के दिन जो लोग व्रत नहीं रख रहे हैं, उन्हें भी मांस, मछली, अंडा, शराब, लहसुन, प्याज आदि तामसिक पदार्थों का सेवन करने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार, एकादशी को चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। इसे व्रत के नियमों के विरुद्ध माना जाता है। क्रोध और विवाद से दूर रहना चाहिए। एकादशी के दिन मन को शांत रखना बहुत जरूरी होता है।

इस दिन किसी से झगड़ा, बहस या अपशब्द बोलने से बचना चाहिए। इस पवित्र दिन झूठ बोलने, किसी के बारे में बुरा सोचने या गलत कार्य करने से बचना चाहिए। देर तक नहीं सोना चाहिए। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें। व्रत का संकल्प लें। दिनभर भक्ति और पूजा में मन लगाएं। विष्णु सहस्त्रनाम या भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। जरूरतमंदों को दान दें और सेवा करें।

धार्मिक महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पिछले जन्मों और वर्तमान जीवन के पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। माना जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से इस व्रत को करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन की कई परेशानियां दूर हो जाती हैं।

व्रत कथा

एक बार अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, हे मधुसूदन, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और उसकी विधि क्या है? वफढपा करके मेरी जिज्ञासा शांत करें। भगवान श्रीकृष्ण बोले, हे अर्जुन! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी कहते हैं। एक बार राजा मान्धाता ने महर्षि लोमश से यही प्रश्न किया था, जो कुछ त्रषि ने राजा को बताया, वही मैं तुम्हें सुना रहा हूँ।

राजा मान्धाता ने महर्षि लोमश से पूछा, हे त्रषिश्रेष्ठ! मनुष्य के पापों का मोचन कैसे संभव है? कोई सरल उपाय बताएं।
महर्षि लोमश बोले, हे नफपति! चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी पापमोचनी एकादशी है। इस व्रत को करने से अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं। सुनिए, इसकी कथा। प्राचीन काल में चैत्ररथ नामक एक दिव्य वन था। वहाँ सदैव वसंत त्रतु रहती थी, जिसमें अप्सराएँ, गंधर्व, किन्नर और देवता विहार करते थे। उसी वन में मेधावी नामक एक त्रषि तपस्या कर रहे थे। वे शिवभक्त थे और युवावस्था में हृष्ट-पुष्ट थे।

एक दिन कामदेव ने उनके तप को भंग करने के लिए मंजुघोषा नामक अप्सरा को भेजा। मंजुघोषा ने दूर बैठकर मधुर स्वर में वीणा बजाते हुए गाना शुरू किया। कामदेव ने उसके भ्रू-कटाक्षों को अपना अस्त्र बनाया। मेधावी मुनि उसके सौंदर्य और गान पर मोहित हो गए। दोनों कामवश होकर रमण करने लगे। लंबे समय तक वे रति- क्रीड़ा में लीन रहे।

एक दिन मंजुघोषा ने कहा, हे त्रषिवर! अब मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दें। मुनि बोले, संध्या हो गई है, प्रात चली जाना। इस प्रकार कई बार उन्होंने टाल दिया। अंत में जब मुनि को समय का बोध हुआ कि बहुत लंबा व्यतीत हो चुका है, तो उन्हें बहुत क्रोधआया, जिस कारण उन्होंने अप्सरा को श्राप देते हुए कहा, तू मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा है। इसलिए अब पिशाचिनी बन जा।

मंजुघोषा व्यथित होकर बोली, हे त्रषिवर! अब क्रोध त्यागकर मुक्ति का उपाय बताएं। मुनि ने कहा, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का व्रत करो। इससे तुम्हारी पिशाचिनी योनि से मुक्ति हो जाएगी। मुनि ने व्रत का पूरा विधान समझा दिया। मेधावी मुनि अपने पिता च्यवन त्रषि के पास गए। च्यवन त्रषि ने पूछा, पुत्र! तुम्हारा तेज क्यों मलिन हो गया?

मेधावी ने सारा वफत्तांत बताया। च्यवन त्रषि बोले, पुत्र! पापमोचनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो, सभी पाप नष्ट हो जाएंगे। मेधावी मुनि और मंजुघोषा दोनों ने भक्तिपूर्वक पापमोचनी एकादशी का व्रत किया, जिसके प्रभाव से मुनि के सभी पाप नष्ट हो गए और मंजुघोषा पिशाचिनी योनि से मुक्त होकर अपने दिव्य रूप में स्वर्ग चली गई। महर्षि लोमश ने कहा, हे राजन! पापमोचनी एकादशी का व्रत करके इसकी कथा का श्रवण एवं पठन करने से हजार गौदान का पुण्य मिलता है। ब्रह्महत्या, स्वर्ण चोरी, मद्यपान, अगम्यागमन जैसे घोर पाप भी नष्ट हो जाते हैं और भक्त को स्वर्गलोक प्राप्त होता है।

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