वचन-भंग की सज़ा

बहुत पुरानी बात है। स्यन्तक नामक एक ग्वाला था, जो बहुत दीन था। वह एक दिन सुबह गायों को लेकर जंगल के उस पार चला गया और शाम होने पर लौटा। दूसरे दिन दूध न बिकने के कारण काफी दूर निकल गया। उसे लौटते हुए रात हो गई। भूखा-प्यासा अंधेरे के कारण जंगल में रास्ता भूल गया। बहुत देर तक भटकने के बाद एक तालाब के किनारे लेट गया। थकान के कारण उसे जल्द नींद आ गई।
आधी रात को संगीत की आवाज से उसकी आँख खुल गई। उसने देखा तालाब के चारों तरफ खूब और रोशनी है। ठंडी हवा चल रही है और संगीत की आवाज आ रही है। आश्चर्यचकित हो स्यन्तक उठ बैठा। तालाब के उस पार बहुत-सी परियां नाच गा रही थीं और बीच में सिंहासन पर एक सुनहरे परों वाली रानी परी बैठी थी।
स्यन्तक के उठते ही सारी परियां रुक गईं। सुनहरी परी स्यन्तक के पास आई। उसे देखकर वह डर कर कांपने लगा। बड़ी कठिनाई से उसने परी को जंगल में रुकने का कारण बताया। उसकी दशा पर दया करके परी ने कहा, तुम रोज यहां आकर नाच-गाना देख सकते हो, परंतु यह बात कभी किसी को मत बताना। अगर बता दिया तो तुम्हारा शरीर पत्थर का हो जाएगा।
वचन-भंग की सजा: स्यन्तक पत्थर का हो गया
सुबह होने पर परियां आसमान में उड़ गईं। स्यन्तक भी घर चला गया। अब वह प्रतिदिन दूध बेचकर रात को जंगल में ही रुकने लगा। उसके माता-पिता ने उससे रात को घर नहीं आने का कारण पूछा, लेकिन उसने कुछ नहीं बताया। धीरे-धीरे यह बात सारे गांव में फैल गई कि स्यन्तक रात को घर नहीं आता।
गांव के बड़े-बूढ़ों ने उसके माता-पिता को समझाया कि इसकी शादी कर दो। गृहस्थी होने पर स्वयं ही घर लौट आया करेगा।
स्यन्तक की शादी दूसरे गांव में तय हो गई। निश्चित दिन बारात धूमधाम से चल दी। पीटर बोथ की पहाड़ी पर पहुंचने तक रात हो गई। अत बारातियों ने वहीं डेरा डाल दिया।
स्यन्तक के मित्र उसे घेर कर बैठ गए और उसके रात को घर न आने का कारण पूछने लगे। पहले तो वह टालता रहा, पर उससे नहीं रहा गया। उसने सोचा कि इतने दिनों का साथ होने के कारण अब परियां तो कुछ कहेंगी नहीं, इसलिए इन लोगों को सच्चाई बता देता हूं। वह आराम से पहाड़ी पर बैठ गया और अपनी बात कहने लगा।
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अभी वह कह भी नहीं पाया था कि बड़ी तेज बिजली चमकी और जोर से गड़गड़ाहट हुई। सभी सहम गए। होश आने पर सबने देखा कि स्यन्तक का शरीर पत्थर में बदल गया। आज भी मॉरीशस में पीटर बोथ की पहाड़ी पर आदमी के शरीर के आकार में पत्थर की शिला दूर से ही देखी जा सकती है। इस पहाड़ी को गुडिया पहाड़ी भी कहा जाता है। स्यन्तक अपना वचन-भंग करने की सज़ा आज भी भोग रहा है।
गुरिन्द्र भरतगढिया
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