हे युद्धरत राष्ट्रों के अजीज कर्णधारों!
अपने देशों की नैयाओं के खेवनहारों !
कृपा करके अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह तज दीजिये,
फिर शांत और शुद्ध मन से खुद से सवाल कीजिये-
क्या वास्तव में, शांति के वास्ते ही महासमर कर रहे ?
या फिर एक-दूजे को बर्बाद करने का खेल, खेल रहे ?
करतूतों से तो लगता, अशांति की आग ही फैला रहे,
अपना-अपना स्वार्थ सिद्ध करने का कुचक्र चला रहे।
कहीं ऐसा तो नहीं, आपकी बुद्धि विपरीत दिशा में काम कर रही,
हो न हो अपने हाथों अपनी कब्र खोदने के लिये प्रेरित कर रही।
खैर, अगर सचमुच अपने-अपने वतन के बाशिंदों का भला चाहते,
मासूम नागरिकों को उत्थान, शांति के शिखर पर पहुँचाना चाहते,
अविलंब, अवांछित हठीलेपन को त्याग दें, येन-केन-प्रकारेण महासंग्राम को विराम दें।
अन्यथा, ‘हम तो डूबेंगे, तुम्हें भी ले डूबेंगे’ वाली स्थिति बनने में देर नहीं लगेगी,
यानी युद्धरत राष्ट्रों में ही नहीं, अयुद्धरत राष्ट्रों में भी विनाश की अग्नि पहुँचेगी।
अतः हे रणरत राष्ट्रों के रहनुमाओं ! भले ही आप अपने-आपको सर्वशक्तिमान मान रहे,
पर उस अदृश्य सर्वव्यापी, सर्वोच्च की अकल्पनीय, अलौकिक शक्ति को कम आँक रहे।
मत भूलिये, वह परवरदिगार सभी की गतिविधियों को भलीभाँति देख रहे,
ईनाम और दंड देने के लिये अच्छे और बुरे कार्यों का लेखा-जोखा रख रहे।
उस असली सर्वशक्तिमान के कहर से तो डरिये, अपने अहंकार के आगे उसे तुच्छ तो न बूझिये।
अस्तु, अभी भी वक्त है, संभल जाइये, वरना, सर्वनाश के लिये तैयार रहिये।
बीती ताहि बिसार के आगे की सुधि लीजिये, मानवता को कदापि शर्मसार न होने दीजिये।
महेन्द्र अग्रवाल, (कोलकाता)
