नस्लवाद कलंक है !
हाल ही में दिल्ली के मालवीय नगर में घटी एक घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। अरुणाचल प्रदेश की तीन युवतियों को उनके पड़ोसियों द्वारा कथित रूप से नस्लीय गालियाँ दी गईं, तथा मोमो और धंधेवाली जैसे अपमानजनक शब्द कहे गए। यह विवाद एक मामूली एयर कंडीशनर की धूल से शुरू हुआ, लेकिन जल्दी ही नस्लभेदी दुर्व्यवहार में बदल गया। यह न केवल उन महिलाओं की गरिमा पर हमला है, बल्कि भारत की एकता और विविधता पर भी कलंक है।
खेद है कि यह घटना कोई पहली नहीं है। उत्तर-पूर्वी राज्यों के निवासी (विशेषकर महिलाएँ) दिल्ली जैसे महानगरों में अक्सर नस्लवाद का शिकार होते हैं। उनके चेहरे की बनावट, परिधान या भाषा को आधार बनाकर उन्हें चाइनीज या विदेशी कहकर अपमानित किया जाता है। इस मामले में तो आरोपी दंपति ने न केवल अपशब्द कहे, बल्कि कथित तौर पर धमकी भी दी। दिल्ली पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया है और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है। लेकिन क्या इतने भर से समस्या का समाधान हो जाएगा?
नहीं, यह तो सिर्फ लक्षण का इलाज है; रोग की जड़ तो गहरी है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत एक बहुलतावादी राष्ट्र उत्तर-पूर्व के राज्य (अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, नागालैंड और मणिपुर आदि) हमारी सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न हिस्सा हैं। इन राज्यों के लोग सैनिकों और कलाकारों से लेकर खिलाड़ियों और वैज्ञानिकों तक के रूप में भारत के गौरव का हिस्सा हैं। फिर भी, मुख्यभूमि में उन्हें अलग-थलग महसूस कराया जाता है।
दिल्ली सबकी है, भेदभाव नहीं : रेखा गुप्ता
यह शर्मनाक है। कोविड-19 विश्वमारी के दौरान इन्हें कोरोना वायरस तक कहकर सताया गया! अब यह घटना फिर से याद दिलाती है कि शिक्षा और जागरूकता की कमी कितनी घातक है। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने इसे अस्वीकार्य बताते हुए सभ्य समाज में ऐसे व्यवहार की कोई जगह नहीं होने की बात कही। सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग गोलाय और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी इसकी निंदा की और कहा कि दिल्ली सबकी है। बेशक इन नेताओं की प्रतिक्रिया सकारात्मक है। लेकिन क्या यह पर्याप्त है?
दरअसल, नस्लवाद की जड़ें हमारे इतिहास और समाज-मानस में हैं। ब्रिटिश काल से चली आ रही फूट डालो और राज करो की नीति ने हमें आपस में बाँटा। आजादी के बाद भी, उत्तर-पूर्व को मुख्यभूमि से जोड़ने के प्रयास अपर्याप्त ही रहे। शिक्षा प्रणाली में उत्तर-पूर्व की संस्कृति को कम स्थान मिलना इन क्षेत्रों और वहाँ के निवासियों के बारे में घोर अज्ञानता की बड़ी वजह है। मीडिया भी अक्सर स्टीरियोटाइप्स को बढ़ावा देता है। उदाहरण के लिए, बॉलीवुड फिल्मों में उत्तर-पूर्वी चरित्रों को हास्यास्पद या विदेशी के रूप में दिखाया जाता है। ऐसी चीजें पूर्वाग्रहों को मजबूत करती हैं। महिलाओं के मामले में यह और भी गंभीर है, क्योंकि नस्लवाद लिंगवाद से जुड़ जाता है। इन महिलाओं को धंधेवाली कहना न केवल नस्लीय है, बल्कि महिलाओं की गरिमा पर वीभत्स हमला है।
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जागरूकता अभियानों से समाज में बदल सकती है सोच
सवाल है कि ऐसे में हमें क्या करना चाहिए? सबसे पहले, कानूनों का सख्ती से पालन। एससी/एसटी अधिनियम जैसे कानून हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन कमजोर है। पुलिस को संवेदनशील बनाना जरूरी है। दूसरा, शिक्षा में बदलाव। स्कूली पाठ्यक्रम में उत्तर-पूर्व के इतिहास, संस्कृति और योगदान को शामिल करें। एक भारत, श्रेष्ठ भारत जैसे जागरूकता अभियान चलाएँ। मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है।
हमें सकारात्मक कहानियां दिखानी चाहिए, जैसे मैरी कॉम के संघर्ष और सफलता की कहानी। तीसरा, सामुदायिक स्तर पर प्रयास। महानगरों में उत्तर-पूर्वी छात्रावासों में सुरक्षा बढ़ाएँ और सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम आयोजित करें। केंद्र सरकार के पूर्वोत्तर विकास मंत्रालय को और सक्रिय होना चाहिए। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री और दिल्ली पुलिस आयुक्त से बात की और ज़ीरो टॉलरेंस की नीति दोहराई। यह अच्छा कदम है, लेकिन इसे क्षणिक नहीं निरंतर लागू रहना चाहिए!
इस घटना से हमें सीखना चाहिए कि विविधता हमारी ताकत है, कमजोरी नहीं। यदि मुख्यभूमि के लोग उत्तर-पूर्व को अलग मानेंगे, तो राष्ट्र कमजोर होगा। उन महिलाओं की पीड़ा हमारी सामूहिक पीड़ा है। दिल्ली भारत का दिल है। उसे सबके लिए सुरक्षित बनाना होगा। इसलिए स्वयं दिल्लीवासियों को मिलकर नस्लवाद के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और अपने सभ्य नागरिक होने को चरितार्थ करना चाहिए।
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