सीमा से सृजन

‘पच्चक्खाय पाव कम्मे’ अर्थात् पाप-कर्म के द्वार बंद हो गए, पाप आना बंद हो गया। जैन-विज्ञान कहता है कि जब पाप के द्वार बंद होते हैं तब पुण्य का द्वार खुल जाता है।

जब व्यक्ति कोई कार्य करे और उसमें सफलता प्राप्त हो एवं जब वह विश्राम करे, तब सुखद निद्रा प्राप्त हो इन दोनों के लिए किसी ज्योतिष शास्त्र, वास्तु शास्त्र या अंधविश्वास के सहयोग की आवश्यकता नहीं होती है, मात्र अपनी लेश्या पर प्रयोग करें, आपकी अभिलाषा पूर्ण हो जाएगी। इस उपलब्धि के लिए दो सूत्र हैं- उठते समय क्रियात्मक संकल्प (व्रत एवं प्रत्याख्यान) तथा सोने से पूर्व परीक्षण-निरीक्षण (प्रतिक्रमण)।

सवेरे उठते ही पूरे दिन की योजना बनाएँ कि आज क्या करना है और क्या नहीं। इसकी भावनात्मक, क्रियात्मक, व्यवहारात्मक रूपरेखा उठते ही बना लें। अधिकांश व्यक्ति रात को सोने से पूर्व अगले दिन की योजना बनाते हैं, परन्तु योजनाओं का बोझ लेकर कभी न सोएँ। कल क्या करना है, इन विचारों के साथ कभी न सोएँ।

सवेरे उठने के बाद सोचें कि आज क्या करना है और क्या नहीं। क्या करेंगे और क्या नहीं, दोनों तय करना आवश्यक है। जो जो कार्य करना रना है, उसे तय करना व्रत है और जो नहीं करना है, उसे तय करना प्रत्याख्यान। व्रत और प्रत्याख्यान एक-दूसरे के पूरक हैं। यह गति का नियम है कि एक दिशा मैं गति और अन्य दिशाओं में अगति। व्रत गति है और प्रत्याख्यान अगति। गति एवं अगति के इस द्वन्द्व से विश्व संचालित है।

प्रत्याख्यान: बुरी आदतों पर नियंत्रण की सरल शक्ति

जब सवेरे तय कर लेते हैं कि आज क्या नहीं करेंगे, तब आपकी ऊर्जा को यह संदेश पहुँचता है कि इस मार्ग पर नहीं जाना है। जैन साधना पद्धति में प्रत्याख्यान लेने की सरल प्रक्रिया है। उदाहरण के लिए आपको चाय की लत है, जिसे कम करना चाहते हैं। एक दिन के लिए प्रत्याख्यान करें कि आज मुझे चाय नहीं पीनी है।

अब पूरे दिन आपकी चेतना व ऊर्जा चाय की ओर नहीं जाएगी। जब आप सिर्फ सोचते हैं परंतु प्रत्याख्यान नहीं लेते हैं तब जैसे ही चाय सामने आएगी, मन उधर दौड़ेगा व ऊर्जा उधर जाएगी। जब आप प्रक्रियापूर्वक निश्चित करते हैं तब निर्णय-शक्ति एकदम सशक्त हो जाती है।

दूसरा उदाहरण- जैसे आपने तय किया कि मुझे अहमदनगर पहुँचना है, तब मार्ग में बैजापुर आए या लातूर, आपका मन उधर नहीं दौड़ेगा, ऊर्जा उधर नहीं जाएगी, वह अहमदनगर की ओर ही जाएगी। प्रत्याख्यान का अर्थ है कि जो नहीं करना है, उस ऊर्जा के रिसाव तथा छिद्र को बंद कर दिया है।

जीवन के हर कदम पर आपके समक्ष दो द्वार हैं, दो विकल्प हैं- शुभ और अशुभ या पुण्य और पाप। एक द्वार बंद करेंगे तब दूसरा द्वार खुल जाएगा। यही प्रत्याख्यान का अर्थ है। ‘पच्चक्खाय पाव कम्मे’ अर्थात् पाप-कर्म के द्वार बंद हो गए, पाप आना बंद हो गया। जैन-विज्ञान कहता है कि जब पाप के द्वार बंद होते हैं तब पुण्य का द्वार खुल जाता है।

उठते ही दिन की रूप-रेखा बनाएँ

प्रतिदिन सवेरे तय करें कि आज आपको क्या करना है। तत्पश्चात अपने श्रद्धेय को नमन करें और उनके प्रकाश को ग्रहण करें। पूर्ण श्रद्धाभाव से कहें –

‘तव पसायाए ! तव पसायाए ! तव पसायाए!’ अर्थात् आपकी कृपा से, आपकी कृपा से, आपकी कृपा से। आपकी कृपा से मेरी योजना ‘अभग्गो अविरहिओ’ हो, अर्थात् अभंग हो, अविराधित हो, निर्दोष हो।

इस अनुभूति अनुभूति के साथ अपने आराध्य प्रभु व गुरु से निवेदन करें कि मैंने आज के दिन की यह रूप-रेखा बनाई है। तीर्थंकर की कृपा ग्रहण करें, जिससे कार्य खण्डित न हो, कोई रिसाव नहीं हो, कोई दोष न लगे। इस भाव के साथ दिनचर्या प्रारंभ करें।

सोने से पूर्व प्रतिक्रमण करें

रात को पुनः देखें कि सवेरे जो योजना बनाई थी, उसमें से क्या कर पाए, क्या नहीं? कहाँ प्रतिज्ञा में, संकल्प में गड़बड़ी हुई, उसे ठीक करें और स्वीकार करें। अपनी ऊर्जा को संदेश दें कि ऐसा पुनः कभी नहीं होगा।

ध्यानमग्न व्यक्ति, जो लेश्या के माध्यम से आत्मपरिवर्तन कर रहा है।

-प्रवीण ऋषि

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