शक्ति, भक्ति और बुद्धिमत्ता के साक्षात विग्रह श्री हनुमान

विक्रम पंचांग के अनुसार, चैत्र पूर्णिमा की आज सुबह 7 बजकर 6 मिनट पर हो चुकी है, जो 2 अप्रैल, गुरुवार की सुबह 7 बजकर 41 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर 2 अप्रैल, गुरुवार को चैत्र पूर्णिमा मनाई जाएगी।

हनुमान जयंती शक्ति, भक्ति और बुद्धिमत्ता के साक्षात विग्रह श्रीहनुमान के प्राकट्य का पावन उत्सव है। आदिकाव्य वाल्मीकि रामायण हनुमान के चरित्र को मात्र एक वानर के रूप में नहीं, बल्कि एक अद्वितीय विद्वान, महापण्डित, वाक चतुर, राजनीतिज्ञ और निष्काम कर्मयोगी के रूप में प्रस्तुत करती है। किष्किन्धा काण्ड के अनुसार जब हनुमान पहली बार भगवान राम से ऋष्यमूक पर्वत पर मिलते हैं, तो वे एक ब्राह्मण भिक्षु का रूप धरकर उनसे संवाद करते हैं। उनकी भाषा और शैली को सुनकर श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं-

न ऋग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिण।
नासामवेदविदुष शक्यमेवं प्रभाषितुम्।।
-किष्किन्धा काण्ड 3/28

अर्थात- जिसने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का गहन अध्ययन न किया हो, वह इतनी शुद्ध और व्याकरण सम्मत भाषा नहीं बोल सकता। श्रीराम आगे कहते हैं कि हनुमान के पूरे वक्तव्य में न तो कोई शब्द अशुद्ध था, न उच्चारण में कोई दोष। उनके मुख, नेत्र, ललाट या भौंहों में कोई विकार नहीं आया। यह एक आदर्श वक्ता और व्याकरणवेत्ता के लक्षण हैं।

अशोक वाटिका में हनुमान की कूटनीति और भाषा चयन की विद्वता

सुन्दरकाण्ड में लंका में संवाद के क्रम में हनुमान की कूटनीति और भाषा चयन की क्षमता को देखा जा सकता है। जब हनुमान अशोक वाटिका में सीता माता को देखते हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वे माता का विश्वास कैसे जीतें? यहां उनकी विद्वता का मनोवैज्ञानिक पक्ष दिखता है। वे स्वयं से विचार करते हैं-

यदि वे संस्कृत अर्थात द्विजातिरिवा संभाषन में बात करेंगे, तो सीता उन्हें रावण का छद्म रूप समझकर डर जाएंगी। इसलिए उन्होंने मानुषी अर्थात आम जनमानस की भाषा का चुनाव किया ताकि वे सीता को सहज कर सकें।
यह प्रसंग सिद्ध करता है कि एक सच्चा विद्वान केवल शास्त्र नहीं जानता, बल्कि यह भी जानता है कि किस समय, किससे और किस भाषा में बात करनी है।

रावण की सभा में हनुमान ने अपनी विद्वता और निर्भीकता दिखाई

पौराणिक ग्रंथों और वाल्मीकि रामायण के संकेतों के अनुसार हनुमान को नव व्याकरणवेत्ता कहा गया है। उन्होंने सूर्यदेव से वेदों की शिक्षा ली थी। जब वे सूर्य के रथ के साथ चलते हुए विद्या ग्रहण कर रहे थे, तब उनकी एकाग्रता इतनी तीव्र थी कि उन्होंने अल्पकाल में ही समस्त शास्त्रों का रस पी लिया था। वाल्मीकि उन्हें बुद्धिमतां वरिष्ठम् अर्थात बुद्धिमानों में श्रेष्ठ कहते हैं। उनकी विद्वता का प्रमाण यह है कि वे रावण जैसी महान, लेकिन अहंकारपूर्ण विद्वता के सामने अध्यात्म और नैतिकता से युक्त विद्वता का प्रतिनिधित्व करते हैं।

रावण की सभा में हनुमान का संवाद उनकी कूटनीतिक निपुणता और निर्भीकता का सर्वोत्तम उदाहरण है। वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड में यह प्रसंग अत्यंत ओजपूर्ण है। जब हनुमान को बंदी बनाकर रावण के सामने लाया गया, तो उन्होंने रावण के सामने अपनी विद्वता का परिचय डरे बिना स्वयं को रामदूत के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने रावण को याद दिलाया कि वे केवल एक वानर नहीं, बल्कि उस राजा के प्रतिनिधि हैं जिसके प्रताप से प्रकृति भी कांपती है। हनुमान जानते थे कि रावण परम विद्वान है, इसलिए उन्होंने उसे शास्त्र सम्मत तर्क दिए। उन्होंने रावण से कहा-

धर्मविरुद्धं च लोकविद्विष्टमेव च।
न कर्तव्यं नरेन्द्रण तस्माद्धर्मं समाचरेत्।।
-वाल्मीकि रामायण, सुन्दरकाण्ड 51/27

अर्थात- हे राजन! जो कार्य धर्म के विरुद्ध हो और लोक में निन्दित हो, उसे राजा को कभी नहीं करना चाहिए। अत: आप धर्म का आचरण करें और माता सीता को ससम्मान लौटा दें।

रावण को चेतावनी और मानसिक रणनीति का उदाहरण

शक्ति का सूक्ष्म प्रदर्शन करते और चेतावनी देते हुए, हनुमान ने रावण के अहंकार को सीधी चुनौती देते हुए स्पष्ट किया कि रावण को जो वरदान मिले हैं, वे देवताओं और असुरों से रक्षा के लिए हैं, लेकिन मानव (राम) और वानर (हनुमान) उस वरदान की परिधि से बाहर हैं। उन्होंने रावण को चेतावनी दी कि उसने जिसे सीता समझकर हरण किया है, वह वास्तव में कालरात्रि है, जो लंका के विनाश का कारण बनेगी।

उनकी कूटनीति यहां दिखती है कि उन्होंने रावण को डराया नहीं, बल्कि उसे आने वाले परिणाम का आईना दिखाया। उन्होंने रावण को महातेजस्वी और तपस्वी कहकर संबोधित किया ताकि वह उनकी बात सुनने को तैयार हो। शत्रु के गढ़ में रहकर भी उन्होंने निडरता से श्रीराम की महिमा का गान किया। उनका उद्देश्य केवल संदेश देना नहीं, बल्कि रावण की मानसिक स्थिति और लंका की सुरक्षा व्यवस्था को भांपना भी था। रावण इतना क्रोधित हुआ कि उसने हनुमान के वध की आज्ञा दी, लेकिन विभीषण ने जब दूत अवध्य अर्थात दूत को मारना नीति विरुद्ध है, का तर्क दिया, तो हनुमान की कूटनीति की एक और जीत हुई।

लंका-दहन: हनुमान की रणनीति और रावण के अहंकार का विनाश

लंका-दहन को अक्सर केवल हनुमान के क्रोध की अभिव्यक्ति माना जाता है, लेकिन यह हनुमान की एक सोची-समझी सामरिक रणनीति थी। हनुमान जानते थे कि रावण की सेना अपनी अजेय शक्ति और लंका की अभेद्य सुरक्षा पर घमंड करती है। लंका जलाकर उन्होंने राक्षसों के मन में भय पैदा कर दिया। उन्होंने यह संदेश दिया कि जब एक साधारण दूत वानर तुम्हारी सोने की लंका को राख कर सकता है, तो जब श्रीराम अपनी पूरी सेना के साथ आएंगे, तब तुम्हारा क्या होगा?

आग लगाने के बहाने हनुमान ने पूरी लंका का भ्रमण किया। उन्होंने बारीकी से लंका के प्रवेश-द्वार, रावण के शस्त्रागार और रसद भंडार, राक्षस सेना की प्रतिक्रिया समय आदि गहरे से निरीक्षण किया। यह जानकारी बाद में राम-रावण युद्ध के समय श्रीराम की सेना के बहुत काम आई। वाल्मीकि रामायण के अनुसार हनुमान ने विशेष रूप से रावण के मंत्रियों और प्रमुख योद्धाओं के महलों को निशाना बनाया। उन्होंने सोने की लंका के वैभव को नष्ट कर रावण के अहंकार को तोड़ा।

लंका-दहन में हनुमान की विद्वता और उत्तरदायित्व का अद्भुत प्रदर्शन

महत्वपूर्ण इमारतों के जलने से लंका की प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा गई, जिससे युद्ध से पहले ही राक्षसों का मनोबल टूट गया। लंका जलाने के बाद हनुमान को अचानक चिंता हुई कि कहीं इस आग में माता सीता न जल गई हों। यह प्रसंग उनकी विद्वता और उत्तरदायित्व को दर्शाता है-

धन्यास्ते पुरुषश्रेष्ठा ये बुद्ध्या कोपमुत्थितम्।
निगृह्णन्ति महात्मानो दीप्तमग्निमिवाम्भसा।।
-सुन्दरकाण्ड 55/4

अर्थात- वे महापुरुष धन्य हैं जो अपने क्रोध को वैसे ही शांत कर लेते हैं जैसे जलती आग को पानी से बुझाया जाता है। जब उन्हें पता चला कि अशोक वाटिका और माता सीता सुरक्षित हैं, तभी वे शांत हुए। यह सिद्ध करता है कि लंका दहन कोई भावुक आवेश नहीं, बल्कि एक सुनियोजित सैन्य कार्यवाही थी। हनुमान का व्यक्तित्व शक्ति और भक्ति के साथ बुद्धि का एक दुर्लभ संगम है। वाल्मीकि रामायण में ये दोनों पक्ष एक-दूसरे के पूरक बनकर उभरते दिखाई देते हैं। अक्सर जहां अपार शक्ति होती है, वहां अहंकार या उग्रता आ जाती है, लेकिन हनुमान के पास अपार बल होने के बाद भी वे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं।

हनुमान जी की विद्वता और विनम्रता का रामायण में अद्वितीय चित्रण

उनकी शक्ति उन्हें समुद्र लांघने का साहस देती है। उनकी विद्वता उन्हें लंका में सीता माता को खोजने की युक्ति देती है। जब लक्ष्मण मूर्छित हुए, तो हनुमान की विद्वता ने उन्हें सही समय पर सही औषधि संजीवनी की पहचान करने की दिशा दी, और उनकी शक्ति ने उन्हें पूरा पर्वत उठा लाने में सक्षम बनाया। उनकी विद्वता का सबसे बड़ा प्रमाण उनकी विनम्रता है। वे रावण जैसे दिग्गजों के सामने अत्यंत शक्तिशाली और तेजस्वी बनकर खड़े होते हैं, लेकिन श्रीराम के सामने एक विनम्र सेवक।

यह एक सच्चे विद्वान की पहचान है। हनुमान की एकाग्रता और स्वामी-भक्ति का सबसे उत्कृष्ट प्रसंग वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड में मिलता है, जिसे अति-मानवीय संकल्प का प्रतीक माना जाता है। जब हनुमान समुद्र लांघ रहे थे, तब समुद्र ने हनुमान के विश्राम के लिए स्वर्ण पर्वत मैनाक को ऊपर भेजा। मैनाक ने उनसे आग्रह किया कि वे थोड़ा विश्राम कर लें और कंद-मूल फल खाकर आगे बढ़ें। यहां हनुमान की एकाग्रता और लक्ष्य-निष्ठा स्पष्ट होती है। उन्होंने मैनाक से कहा-

हनुमान्नातिपाम राघवार्थे चिकीर्षया।
स तं पर्वतमाभाष्य तदा प्रीतेन चेतसा।।
-सुन्दरकाण्ड 1/107

अर्थात- हनुमान ने राम-कार्य के लिए अपनी यात्रा में रुकना उचित नहीं समझा। उन्होंने मैनाक का अनादर नहीं किया, बल्कि उसे हाथ से स्पर्श कर सम्मानित किया। यह सिखाता है कि जब लक्ष्य बड़ा हो, तो रास्ते में मिलने वाली सुविधाएं और प्रलोभन भी बाधा बन सकते हैं।

हनुमान के गुण आज के प्रतिस्पर्द्धा के युग में एक आदर्श विद्यार्थी की तरह काम आते हैं। सफलता के रास्ते में आने वाले आराम को सम्मान दें, पर उसे अपना लक्ष्य न बनने दें। हनुमान जयंती पर वाल्मीकि रामायण के इन संदर्भों का स्मरण हमें उनके वास्तविक और गंभीर स्वरूप से जोड़ता है। वे चिरंजीवी हैं, जो आज भी अपने भक्तों के हृदय में भक्ति और साहस का संचार करते हैं।

-अशोक प्रवृद्ध

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