रघुवर छवि के समान, रघुवर छवि बनियाँ
ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैजंनिया… सुनते-सुनते आँखों से पानी गिरने लगता है। कहा जाता है कि बचपन ईश्वर का दूसरा नाम है-जहाँ केवल प्रसन्नता का वास रहता है। बिना किसी चिंता के स्वाभाविक व्यवहार कभी हँसना, कभी रोना। पेट भरा हो तो निश्छलता से सबको मुस्कान सहित निहारना। कई बार गहरी निद्रा में सो जाना।
सांस लेते समय नाभि का धीरे-धीरे हिलना। परिचितों को देखकर मुस्कुराना और अपरिचितों को देखकर चिल्ला उठना। सचमुच, घर की आत्मा तो शिशु में ही बसती है। ईश्वर जब जन्म लेते हैं तो उनकी बाल-लीला आठों पहर मन को शुद्ध रखती है और चेहरे पर मुस्कान बिठा देती है। जो इस लीला में गहरे डूब जाता है, वह तुलसी हो जाता है, वह सूरदास हो जाता है।
यही कारण है कि परम मित्र प्रथम पूज्य गणेश, मर्यादा पुरुषोत्तम राम, दास्य भक्ति के सर्वोच्च प्रतीक हनुमान और सोलह कलाओं से पूर्ण कृष्ण की बाल लीलाएँ सनातन धर्म के घर-घर में बार-बार दोहराई जाती हैं, जब भी अपने घर या पड़ोस के बच्चों की मनोरंजक गतिविधियाँ दिखाई देती हैं। वसंत के नवरात्र आते ही आदिशक्ति के साथ-साथ राम की लीलाओं का गान आरम्भ हो जाता है। फिर राम, जिनके विषय में कहा गया है-
रमन्ते क्रीडन्ते योगिनो यस्मिन् स एव राम।
अर्थात जिस परम तत्व में योगीजन रमण करते हैं, उसी तत्व को राम कहा गया है। सनातन घरों में आज भी शिशु के जन्म पर राम या ॐ चाँदी या सोने की शलाका से मधु में डुबोकर जीभ पर अंकित किया जाता है। यह धारणा रहती है कि संतान में राम के आदर्श प्रवेश करें, मर्यादा का वास हो, वह आदर्श पुत्र, भाई, मित्र और प्रजा-वत्सल राजा बने। आज भी हम राम-राज्य की कल्पना करते हैं।
राम शब्द की व्युत्पत्ति भी अत्यंत अर्थपूर्ण है। रम् धातु में घञ् प्रत्यय लगने से राम शब्द बनता है। रम् का अर्थ है- प्रसन्न होना, विश्राम करना, खेलना। इस प्रकार राम वह हैं, जो स्वयं रमण करते हैं और सबको प्रसन्नता प्रदान करते हैं।
देवताओं की इच्छा थी कि राम का चरित्र लिखा जाए। उस समय की देवभाषा संस्कृत में महर्षि वाल्मीकि ने ब्रह्मा के निर्देश पर रामचरित का लेखन किया-
रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरु त्वमृषिसत्तम।
धर्मात्मनो भगवतो लोके रामस्य धीमत।।
अर्थात-हे मुनिश्रेष्ठ! तुम परम बुद्धिमान, धर्मात्मा राम के संपूर्ण चरित्र का वर्णन करो।
वाल्मीकि रामायण में नारद मुनि वाल्मीकि से कहते हैं-
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुत।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी।।
अर्थात इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न एक ऐसे पुरुष हैं, जो राम नाम से विख्यात हैं। मन को वश में रखने वाले, महाबलवान, तेजस्वी, धैर्यवान और जितेन्द्रिय हैं। अयोध्या नरेश दशरथ, जो वृद्धावस्था की ओर बढ़ चुके थे, संतान प्राप्ति के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ कराते हैं। अग्निदेव प्रसन्न होकर देवताओं द्वारा निर्मित खीर का पात्र उन्हें प्रदान करते हैं।
बड़ी रानी कौशल्या को उसका आधा भाग मिलता है और आधा कैकेयी को। कौशल्या और कैकेयी अपने हिस्से में से सुमित्रा को देती हैं। चैत्र शुक्ल नवमी के मध्याह्न जब सूर्य आकाश में ऊँचा होता है, राम का जन्म होता है। कौशल्या के गर्भ से राम, कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण व शत्रुघ्न जन्म लेते हैं। विष्णु चार रूपों में प्रकट हो जाते हैं।
वाल्मीकि रामायण में बाल-लीलाओं का विस्तार उतना नहीं है, जितना अवधी में रचित रामचरितमानस के बालकाण्ड में मिलता है। तुलसीदास ने भाव-विभोर होकर बाल-राम का अत्यंत कोमल चित्रण किया है। माता कौशल्या जब विष्णु के दिव्य रूप का दर्शन करती हैं तो मोक्ष-भाव में डूब जाती हैं। फिर उन्हें स्मरण होता है कि उन्हें तो पुत्र का स्नेह पाना है।
वे प्रार्थना करती हैं- प्रभु! अपने इस दिव्य रूप का त्याग कर दीजिए और शिशु-लीला कीजिए। वही सबके मन को प्रिय लगती है। भगवान तुरंत बाल-रूप धारण करते हैं और रोने लगते हैं। शिशु के रोदन की वह ध्वनि अयोध्या में उत्सव का संगीत बन जाती है। अयोध्या-जिसका अर्थ है, जहाँ किसी का वध नहीं होता। वहाँ नारायण चार रूपों में बाल-लीला कर रहे हैं। दशरथ सहित पूरी अयोध्या मंत्रमुग्ध है। तुलसीदास बाल-राम का रूप वर्णित करते हैं-
सुन्दर श्रवण सुचारु कपोला।
अति प्रिय मधुर तोतरे बोला।।
कभी माता उन्हें गोद में लेकर झुलाती हैं, कभी पालने में सुलाती हैं-
लै उछंग कबहुँक हलरावै।
कबहुँ पालने घालि झुलावै।।
एक कथा में कहा जाता है कि जब शिवजी राम के दर्शन करने अयोध्या पहुँचे तो गणेश ने भी साथ चलने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने कहा- मैं खिलौना बनूँगा, राम मेरे साथ खेलेंगे। शिवजी खिलौने बेचने वाले का रूप धारण कर अयोध्या पहुँचे। बाल-राम खिलौनों की जिद करने लगे। शिवजी भाव-विभोर थे, राम के दर्शन से और गणेश प्रसन्न थे, राम के साथ खेलकर।
लोक-कथाओं में हनुमान की बाल-लीला भी मिलती है। कहा जाता है कि राम के जन्म के कुछ दिन बाद ही बाल-हनुमान उनसे मिलने अयोध्या पहुँचे थे और दोनों ने साथ खेला था। असल में, हम किसी महान व्यक्तित्व को याद क्यों करते हैं? क्योंकि मन ताँबे के बर्तन की तरह है, उसे रोज़ माँजना पड़ता है। यदि हम उसे रोज़ माँजेंगे तो वह चमकेगा, नहीं तो काला हो जाएगा।
महान व्यक्तित्वों का स्मरण दरअसल मन को माँजना है। रामनवमी आदर्शों की प्रतिष्ठा का दिवस है। संदेश है कि हम अच्छे इंसान बनें। आदर्श हमारे कर्मों में दिखाई दे। तभी हम पुत्र, पिता, मित्र और पति-हर रूप में राम की छवि को अपने जीवन में उतार पाएँगे। संत तुलसीदास कहते हैं- रघुवर छवि के समान, रघुवर छवि बनियाँ।
भानु प्रताप नारायण मिश्र
अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।



