‘स्त्रीवाद का उद्भव और आवश्यकता’ पर हुई राज्य स्तरीय संगोष्ठी

हैदराबाद, कामारेड्डी सरकारी कला एवं विज्ञान महाविद्यालय के हिन्दी विभाग के तत्वावधान में स्त्रीवाद का उद्भव और आवश्यकता विषय पर एक दिवसीय राज्य स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के उप-प्राचार्य डॉ. के. किष्टय्या ने की। उन्होंने ज्योत प्रज्ज्वलित कर संगोष्ठी का शुभारंभ किया। साथ ही हिन्दी साहित्य में स्त्रीवाद पर चर्चा को शुभ संकेत बताया।

हैदराबाद में स्त्रावाद संगोष्ठी का दृश्य

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित निर्मल सरकारी डिग्री कॉलेज की असोसिएट प्रोफेसर डॉ. डी. हेमलता ने स्त्रीवाद का विस्तृत विश्लेषण करते हुए कहा कि राजा राममोहन राय स्त्रीवाद के अग्रदूत थे, जबकि महात्मा ज्योतिराव फुले इसके महान उद्धारक रहे। 1920 के दशक में मतदान के अधिकार से शुरू हुआ यह आंदोलन 1960 के दशक में कानूनी अधिकारों तक पहुँचा और आज मी टू जैसे डिजिटल आंदोलनों के माध्यम से चौथे चरण में है। प्रसिद्ध लेखिका सिमोन द बोउआर के कथन स्त्रा पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती है को उद्धृत करते हुए उन्होंने विद्यार्थियों को अनुशासन के साथ स्वतंत्रता का सही उपयोग करने की प्रेरणा दी।

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हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं संगोष्ठी संयोजक डॉ. जी. श्रीनिवास राव ने स्वागत भाषण में कहा कि प्रेमचंद के युग से ही पुरुष रचनाकारों ने महिलाओं की समस्याओं को स्वर दिया। उन्होंने ऊषा प्रियंवदा, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, शिवानी जैसी लेखिकाओं के योगदान पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि डॉ. डी. हेमलता का शॉल और स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मान किया गया। अवसर पर समन्वयक डॉ. पी. विश्व प्रसाद, अंकम जयप्रकाश, डॉ. दिनकर, एन. रामुलू, हिन्दी प्राध्यापक डॉ. बालाजी व बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित थे।

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