होर्मुज स्ट्रेट रणनीतिक घेराबंदी: भारत के पास चीन की ‘नस’

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नई दिल्ली, दुनिया के नक्शे पर ईरान का होर्मुज जलडमरूमध्य जिस तरह तेल की सप्लाई के लिए मशहूर है, ठीक वैसा है। ही एक रणनीतिक चोक पॉइंट भारत के पास भी मौजूद है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के पास स्थित यह इलाका मलक्का जलडमरूमध्य का मुख्य द्वार है, जहाँ से होकर दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार गुजरता है। भारत इस क्षेत्र में अपनी सैन्य और व्यापारिक ताकत को जिस तरह बढ़ा रहा है, उसने ड्रैगन यानी चीन की नींद उड़ा दी है। अगर भारत ने इस रास्ते की नब्ज दबा दी, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में भूचाल आना तय है।

व्यापारिक और सैन्य आवाजाही को नियंत्रित कर सकता

समुद्र विज्ञान और युद्ध नीति में चोक पॉइंट उस संकरे रास्ते को कहते हैं, जहाँ से जहाजों का गुजरना अनिवार्य होता है। भारत के पास अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के रूप में एक ऐसी प्राकृतिक दीवार है, जो हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाले मलक्का जलडमरूमध्य के मुहाने पर खड़ी है। दुनिया का लगभग 25 प्रतिशत समुद्री व्यापार और चीन की 80 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति इसी रास्ते से होकर गुजरती है। भारत की यहाँ मौजूदगी उसे हिंद महासागर व ‘थानेदार’ बनाती है, जो किसी भी संकट के समय व्यापारिक और सैन्य आवाजाही को नियंत्रित कर सकता है।

भारत सरकार अंडमान-निकोबार क्षेत्र में ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ और ‘गलेथिया बे पोर्ट’ के माध्यम से अपनी उपस्थिति को ऐतिहासिक रूप से मज़बूत कर रही है। यह महज एक बंदरगाह नहीं, बल्कि एक रणनीतिक किला है। यहाँ विकसित किया जा रहा इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल चीन के लिए मिनी होर्मुज जैसी चुनौती बन सकता है। इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद भारत न केवल बड़े मालवाहक जहाजों को सेवा दे सकेगा, बल्कि इस पूरे शिपिंग लेन पर अपनी पैनी नज़र भी रख सकेगा।

चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह मलक्का के रास्ते पर निर्भर है। चीनी नेतृत्व इसे अपनी सबसे बड़ी कमज़ोरी यानी मलक्का डिलेमा मानता है। उन्हें डर है कि यदि भारत के साथ किसी तरह का संघर्ष होता है, तो भारतीय नौसेना अंडमान सागर में उनके तेल टैंकरों का रास्ता रोक सकती है। भारत का यह चोक पॉइंट चीन के गले की फांस बना हुआ है, जिसे नजरअंदाज करना बीजिंग के लिए नामुमकिन है।

तेल और गैस की कमी से देश की आर्थिक स्थिरता को नुकसान पहुंच सकता है

मलक्का भारत का रणनीतिक चोक पॉइंट है, वहीं भारत खुद होर्मुज जलडमरूमध्य (फारस की खाड़ी) पर काफी निर्भर है. भारत अपनी जरूरत का लगभग 46-50 प्रतिशत कच्चा तेल होर्मुज के रास्ते आयात करता है। इसका मतलब यह है कि भारत के पास दूसरों को रोकने की ताकत तो है, लेकिन वह खुद भी वैश्विक चोक पॉइंट्स के प्रति संवेदनशील है। यही कारण है कि भारत अंडमान में अपनी शक्ति बढ़ाकर एक ऐसा संतुलन बनाना चाहता है, जिससे उसकी ऊर्जा सुरक्षा पर कोई आँच न आए और जरूरत पड़ने पर वह पलटवार भी कर सके। अगर अंडमान के पास स्थित इस समुद्री मार्ग को बंद किया जाता है, तो इसके परिणाम विनाशकारी होंगे।

दुनिया भर के शिपिंग बेड़े को अपना रास्ता बदलना पड़ेगा। जहाजों को मलक्का की जगह लोम्बोक जलडमरूमध्य जैसे लंबे रास्तों से जाना होगा, जिससे यात्रा का समय और लागत कई गुना बढ़ जाएगी। तेल लगेंगी, जिससे वैश्विक मंदी का खतरा पैदा हो जाएगा। कच्चे माल और खाद की सप्लाई रुकने से पूरी दुनिया में खाद्य सुरक्षा और महंगाई का संकट गहरा सकता है।

समुद्री रास्तों पर तनाव बढ़ते ही जहाजों का इंश्योरेंस (बीमा) प्रीमियम कई गुना बढ़ जाता है। इसका सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है. कार से लेकर कंप्यूटर तक, हर उस चीज की कीमत बढ़ जाएगी जो समुद्र के रास्ते एक देश से दूसरे देश भेजी जाती हैं। बंदरगाहों पर जहाजों की कतारें लग जाएंगी और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को समय पर सामान नहीं मिल पाएगा।

हालांकि भारत इस चोक पॉइंट को नियंत्रित करता है, लेकिन इसके बंद होने का असर भारत पर भी पड़ेगा। भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है और घरेलू स्तर पर महंगाई अनियंत्रित हो सकती है। तेल और गैस की कमी से देश की आर्थिक स्थिरता को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए, भारत की रणनीति इस रास्ते को बंद करने की नहीं, बल्कि इसे सुरक्षित रखने और अपनी सामरिक बढ़त बनाए रखने की है। (भाषा) 

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