सुशासन बाबू का अनिच्छुक दिल्ली-प्रवास
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी अब देश के उच्च सदन की शोभा बढ़ाएँगे। अब वे इसी योग्य रह गए हैं न? राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करना था, तो अमित शाह को खुद पटना जाना पड़ा। डर रहा होगा, कहीं पलटी न मार जाएँ! मजबूरन ट्वीट करना पड़ा- शुरू से ही बिहार विधान परिषद और विधानसभा की तरह संसद के भी दोनों सदनों में सेवा करने की इच्छा थी। इच्छा! वाह क्या बात है। चार महीने पहले नवंबर 2025 में एनडीए की भारी जीत के बाद दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, 202 सीटें जीतीं (भाजपा 89, जदयू 85)। इस तथाकथित स्वेच्छा-प्रवास की पटकथा तो तभी से लिखी जा रही थी।
जी हाँ, ये वही नीतीश कुमार हैं, जिन्हें बिहार की जनता सुशासन बाबू कहती थी; और पलटू राम भी। भ्रष्टाचार और वंशवाद के चिर विरोधी। लेकिन अंत काल में पुत्र-मोह के आगे पराजित हो ही गए। सत्ता सुंदरी के लिए 2005 से लेकर अब तक कितनी बार गठबंधन बदला? एनडीए से महागठबंधन, फिर वापस, फिर टूटे, फिर जुड़े। टूटने-जुड़ने में जाने कितनी गाँठें पड़ी होंगी। पर यह धागा प्रेम का नहीं, कुर्सी का है।
गठबंधन बदलकर कुर्सी बचाने की सियासत
सत्ता की खातिर कभी लालू-राबड़ी के साथ, फिर भाजपा के साथ, फिर तेजस्वी के साथ, फिर भाजपा के साथ। एक ही मंत्र- लागी छूटे ना, कुर्सी खिसके ना! अब 75 की वय में अचानक दोनों सदनों वाली इच्छा जाग गई। चुने भी गए। पर मुख्यमंत्री पद का मोह है कि छूटता ही नहीं। इस्तीफा देते नहीं बन रहा। देना तो पड़ेगा। भाजपा ने पैकिंग का पुख्ता इंतजाम जो किया है। आप उच्च सदन में ऊँघिए, बिहार हम देख लेंगे।
पटना में जूनियर पार्टनर बनकर रहने की फाँस तो आपके कलेजे से निकल जाएगी, दिल्ली जाकर। आपने कभी गृह विभाग छोड़ा नहीं था, पर इस बार छोड़ना पड़ा न। और अब गृहत्याग की भी वेला आ ही गई। वैसे यह मन-समझावन भी क्या खूब है कि नई सरकार बनेगी तो आप सहयोग और मार्गदर्शन देंगे। यानी, आपने भी मान ही लिया कि सचमुच आप अब मार्गदर्शन मंडल की गति को प्राप्त हो रहे हैं! आपकी जबरिया स्वेच्छा ने भाजपा की इच्छापूर्ति का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
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जनादेश से विश्वासघात का विपक्ष का आरोप
कांग्रेस कह रही है – जनादेश के साथ घोर विश्वासघात। राजद को यह सब राजनीतिक अपहरण लग रहा है। सयाने पहले ही भविष्यवाणी कर चुके थे। लेकिन नीतीश जी? स्वेच्छा का ढोंग! कितना गौरवपूर्ण होता अगर थुक्का फ़ज़ीहत से पहले ही राजनीति से संन्यास ले लेते। लेकिन सत्ता-लोलुपता जो न कराए कम है। उसी के लिए तो इतनी बार गठबंधन बदल-बदलकर कुर्सी बचाई। लेकिन भाजपा ने अब उलटा खेल खेल लिया। बीस साल तक बिहार पर राज, लेकिन अब दिल्ली का बुलावा। राज्यसभा में बैठकर क्या करेंगे? पुराने भाषण दोहराएँगे? या बिहार के नए मुख्यमंत्री को मार्गदर्शन देंगे, जैसे कोई रिटायर्ड टीचर?
जनता जानती है, यह अनिच्छापूर्ण विवशता है। सत्ता छोड़ने की मजबूरी। 75 साल की उम्र, पार्टी की कमजोरी, अस्थिर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, भाजपा की दबंगई। नीतीश जी ने कभी कहा था- जनता का विश्वास मेरे साथ है। लेकिन भाजपा ने पलटूराम को ही पलट दिया। राजनीति की दोस्तियाँ दोस्तियाँ नहीं, मजबूरियाँ हुआ करती हैं। कल भाजपा मजबूर थी। आज नीतीश जी मजबूर हैं। कुनबा ज्यों का त्यों।
बेशक, मुख्यमंत्री पद से नीतीश जी के इस्तीफे के साथ ही बिहार की राजनीति में एक युग का अंत हो जाएगा। और हाँ, अब उन्हें जिस जगह भेजा जा रहा है, वहाँ कोई इस्तीफा नहीं देना पड़ता, बस वोटिंग करनी होती है! जितनी चाहें पलटियाँ मारें या गुलाटियाँ खाएँ।
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