तालिबान का नया कानून : महिलाओं पर बर्बरता वैध
अफगानिस्तान में तालिबान शासन ने एक बार फिर दुनिया को स्तब्ध कर दिया है। हाल ही में लागू की गई नई दंड संहिता में प्रावधान है कि पति अपनी पत्नी को तब तक पीट सकता है, जब तक हड्डी न टूटे या घाव न बने। यदि अनुचित बल से दृश्यमान चोटें लगें, तो भी सजा महज 15 दिनों की कैद है। यह 90 पृष्ठों की दंड संहिता न केवल घरेलू हिंसा को वैधानिकता प्रदान करती है, बल्कि महिलाओं और बच्चों को संपत्ति की तरह मानती है। यह कानून 2009 के महिला हिंसा उन्मूलन कानून को रद्द करता है, जो महिलाओं के लिए एकमात्र कानूनी सुरक्षा था।
आइए तनिक इस कानून का मतलब समझें। अनुच्छेद 32 के अनुसार, यदि पति अपनी पत्नी को अत्यधिक पिटाई से फ्रैक्चर, चोट या खरोंच पहुँचाए और पत्नी अदालत में इसे साबित करे, तो पति को अपराधी माना जाएगा और जज उसे 15 दिनों की सजा दे सकता है। लेकिन यदि कोई दृश्यमान घाव या हड्डी टूटने जैसी गंभीर चोट न हो, तो यह हिंसा अपराध ही नहीं मानी जाएगी! यानी, सामान्य पिटाई को विवेकाधीन दंड के तहत पति द्वारा लागू करने की अनुमति है, जो शरिया पर आधारित है।
पति को पत्नी को दंड देने का अधिकार मिला
कानून में महिलाओं को दास की श्रेणी में रखा गया है और मालिक (पति) को उन्हें दंड देने का अधिकार है। दिलचस्प बात यह है कि जानवरों पर हिंसा के लिए कड़ी सजा है, लेकिन महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता को कम महत्व दिया गया है! इस कानून में यह भी व्यवस्था है कि बिना पति की अनुमति के परिवार से मिलने पर पत्नी को तीन महीने की कैद की सज़ा दी जा सकती है।
आखिर इस कानून का मकसद क्या है? भले ही तालिबान इसे शरिया की व्याख्या बताता है, लेकिन वास्तव में यह महिलाओं पर नियंत्रण मजबूत करने का औजार है। 2021 में सत्ता में लौटने के बाद से तालिबान ने महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन पर अनेक पाबंदियाँ लगाई हैं। यह कानून उसी श्रृंखला की नई कड़ी है, जिसका प्रयोजन महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैद रखना है।
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समाज पर इस्लामी मूल्यों के नाम पर नियंत्रण
मकसद है समाज को इस्लामी मूल्यों के नाम पर दबाना, जहाँ पुरुषों को सर्वोच्चता मिले और महिलाएँ आज्ञाकारी रहें। कहना न होगा कि यह बर्बर दंड प्रणाली आधुनिक मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिनिधि रीम अल्सालेम ने उचित ही इस कानून को भयावह बताया है, क्योंकि यह दमन को कानूनी जामा पहनाता है। दरअसल, तालिबान का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय दबाव को नजरअंदाज कर अपनी विचारधारा थोपना है, जिससे महिलाओं की आवाज दब जाए।
सयाने बता रहे हैं कि यह कानून अफगान महिलाओं के लिए विनाशकारी है। पहले से ही डर के साए में जी रही महिलाएँ अब घरेलू हिंसा का शिकार होंगी। बिना किसी कानूनी सहारे के! इससे महिलाओं की स्वतंत्रता और भी सीमित हो जाएगी। बच्चे भी प्रभावित होंगे, क्योंकि कानून उनकी भी पिटाई की इजाजत देता है। सामाजिक स्तर पर, यह अफगान समाज को मध्ययुग में धकेल देगा। डर और दमन से विरोध की आवाजें दब जाएँगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, इससे तालिबान की मान्यता की माँग को झटका लग सकता है। लेकिन आर्थिक संकट झेल रहे अफगानिस्तान में यह कानून महिलाओं की स्थिति को और बदतर करेगा।
संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार समूह इसकी निंदा तो ज़रूर कर रहे हैं, लेकिन वह अपर्याप्त और निष्फल है। क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि हम एक ऐसी विचित्र दुनिया में जी रहे हैं जहाँ एक हथियारबंद समूह ने एक समूचे देश की आधी आबादी को बंधक बना लिया है और बाकी सारी दुनिया साक्षी भाव से इस बर्बरता को ताकते रहने के अलावा कुछ नहीं कर सकती!
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