शीतला अष्टमी का पर्व परंपरा और विज्ञान का अद्भुत संगम है

तिथि मुहूर्त

सप्तमी तिथि

विक्रम पंचांग के अनुसार इस वर्ष चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि आज दोपहर 11 बजकर 27 मिनट से शुरु हो रही। अत सप्तमी का व्रत आज रखा जाएगा। आज मित्र, मानस, हर्षण और सर्वार्थसिद्धि योग रहेगा, जिससे इस पर्व का महत्व और भी बढ़ जाएगा।

अष्टमी तिथि

पंचांग के अनुसार, इस साल चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 11 मार्च, बुधवार की मध्यरात्रि 1 बजकर 54 मिनट पर शुरु हो रही है, जो 12 मार्च, गुरुवार की सुबह 4 बजकर 29 मिनट पर समाप्त होगी। अत इस साल 11 मार्च, बुधवार को शीतला अष्टमी का व्रत रखा जाएगा।

हिन्दू पंचांग के मुताबिक, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्टमी को ठंडा भोजन खाने की परंपरा है। इन तिथियों को शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी कहा जाता है। इस दिन माता शीतला की पूजा की जाती है, जो देवी दुर्गा का ही एक रूप है। शीतला अष्टमी को बसोड़ा भी कहते हैं, क्योंकि इस दिन माता को बासी रोटी, गुड़ या दही के साथ प्रसाद का भोग लगाया जाता है। शीतला सप्तमी या अष्टमी को घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है, यही पंरपरा इसे विशेष और अलग बनाती है।

इस पर्व में जितनी धार्मिक आस्था है, उतनी ही स्वास्थ्य की वैज्ञानिक परंपरा भी है। यह पर्व होली के 8वें दिन मनाया जाता है। इसे उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, बिहार, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली आदि जगहों में मनाया जाता है। वास्तव में शीतला अष्टमी महज धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की सबसे प्राचीन स्वास्थ्य चेतना और पर्यावरणीय समझ का आईना है। शीतला माता को रोगों की देवी भी कहा जाता है।

गांवों में नीम के पेड़ पर शीतला मां के लिए जल चढ़ाया जाता है, जो स्वास्थ्य चेतना का ही विहंगम उदाहरण है। जब देश में चेचक जैसे बीमारी का प्रकोप हुआ करता था, उसे शीतला माता से जोड़कर देखा जाता था। माना जाता है कि मां शीतला त्वचा रोगों और पांमणों से रक्षा करने वाली देवी है। शीतला शब्द का मतलब है- शीतलता प्रदान करने वाली।

शीतला माता के प्रतीकों में छिपा स्वच्छता और स्वास्थ्य का संदेश

शीतला माता को गधे पर सवार, हाथ में झाड़ू, कलश और नीम की पत्तियों के साथ चित्रित किया जाता है। इन सभी प्रतीकों का गहरा स्वास्थ्य दर्शन है। झाड़ू दरअसल साफ-सफाई, रोगों और अशुद्धियों को दूर करने का प्रतीक है। कलश जीवन और स्वास्थ्य का स्त्रोत है। नीम की पत्तियां औषधीय गुणों और रोग-प्रतिरोध का प्रतीक है, जबकि गधा विनम्रता और सेवाभाव का प्रतीक है। यह पूरी प्रतीकात्मकता दर्शाती है कि शीतला माता केवल धार्मिक देवी नहीं बल्कि स्वास्थ्य और स्वच्छता की प्राचीन भारतीय अवधारणा है।

भारत में प्राचीन काल से ही चेचक तथा कई अन्य पांमक रोगों का व्यापक प्रकोप होता रहा है। इसलिए आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के विकास के पहले लोग इन रोगों से बचाव के लिए देवी-देवताओं की पूजा किया करते थे। माता शीतला की पूजा इसी सामाजिक और स्वास्थ्य संदर्भ से जुड़ी हुई है। पिछली सदी में जब गांवों में चेचक का जबर्दस्त प्रकोप होता था, तो लोग मानते थे कि शीतला माता उनसे नाराज है। उन्हें प्रसन्न करने के लिए लोग उनकी पूजा करते थे। इस पूजा के दौरान कई तरह के नियम बनाये गये थे, जो वास्तव में अप्रत्यक्ष रूप से स्वच्छ रहने के लिए बनाये गये थे।

शीतला मां को प्रसन्न करने की जो प्रक्रिया होती थी, वह दरअसल स्वास्थ्य चेतना का एक अनुपम उदाहरण है। क्योंकि शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए घर की साफ-सफाई करने का प्रावधान है। दिन में ठंडा भोजन करने की परंपरा है, जिससे अग्नि और गर्मी कम हो जाए। इस दौरान नीम का प्रयोग और बीमार को मूलत नीम के पेड़ के नीचे ठंडक में रखने का चलन था, जिससे रोगी को इन वैज्ञानिक तौर-तरीकों से आराम मिलता था।

शीतला अष्टमी: परंपरा के पीछे छिपा स्वास्थ्य और प्रकृति का ज्ञान

इसलिए जान बचाने की वैज्ञानिक प्रक्रिया ही वास्तव में शीतला माता का पूजा और अनुष्ठान है, जो धर्म से ज्यादा आपके स्वास्थ्य की रक्षा तय करता है। शीतला अष्टमी मनाये जाने के सदियों से तीन प्रमुख कारण रहे हैं- बीमार की रोगों से रक्षा, स्वच्छता और प्रकृति में परिवर्तन का स्वागत। विशेषकर मांएं शीतला अष्टमी का व्रत रखती हैं, तो उनकी कामना होती है कि शीतला मां परिवार को रोगों से दूर रखें। जहां तक शीतला अष्टमी व्रत मनाये जाने की परंपरा का सवाल है तो इस दिन घर में बासी भोजन किए जाने की परंपरा है, जिसमें शामिल होती हैं- पूरी, हलवा, कड़ी-चावल, दही, पकवान।

कुछ लोग इसे शरीर को शीतल रखने और पाचन को संतुलित रखने का पर्व कहते हैं। शीतला अष्टमी का व्रत रखने के बाद अगले दिन सुबह जल्दी से जगकर मंदिर जाकर पूजा की जाती है, जिसमें वही सब चीजें शामिल होती हैं, जो भोग का हिस्सा होती हैं। शीतला अष्टमी की परंपरा में एक सोच यह भी छिपी है कि चाहे जितना पुराना हो नीम, लेकिन यह स्वास्थ्य के लिए हमेशा एंटी बैक्टीरियल और एंटी वायरल होता है।

नीम हमारी अनेक तरह से स्वास्थ्य सुरक्षा में सहायक होती है। इसलिए इस दिन विशेष तौरपर नीम के पेड़ को महत्व दिया जाता है। शीतला अष्टमी का महत्व लोगों को 2019 में दुनियाभर में फैले कोराना वायरस के समय महत्वपूर्ण माना गया था। महामारी के बाद लोगों ने यह जाना कि कैसे भारतीय समाज में प्राचीन काल से ऐसे ही ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने की परंपरा रही है।

आर.सी.शर्मा

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