खतरनाक हो चली खाद्य मिलावट से सरकार को सख्ती से निपटना चाहिए

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण द्वारा सभी भोजनालयों के लिए उनके दरवाजों पर स्वच्छता-रेटिंग प्रदर्शित करना अनिवार्य बनाने की दिशा में जो कदम उठाया है, वह प्रशंसनीय है। लेकिन यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऐसा सचमुच हो, सिर्फ बातें भर न हों और इस रेटिंग में रसोई व भंडारण क्षेत्रों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

आजकल यह आम बात है कि हानिकारक तेलों और पशु-चर्बी का व्यापक रूप से इस्तेमाल सड़क किनारे के ढाबों और कुछ भोजनालयों में मक्खन के रूप में किया जाता है। केंद्र और राज्य सरकारों को इस संबंध में आवश्यक कदम उठाने चाहिए, जिससे देश में मिलावटी मक्खन का उपभोग संभव न हो सके। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम में कुछ साल पहले लड्डुओं के पवित्र प्रसाद में मिलावटी घी के उपयोग की चौंकाने वाली घटना सामने आयी थी, जिससे यह साफ हो गया है कि ऐसे निवारक कदम उठाए जाएं जिससे हलवाइयों और भोजनालयों द्वारा इस प्रकार का मिलावटी देसी घी उपयोग में न लाया जा सके।

देसी घी के निर्माता का ब्रांड-नाम और दूसरी जरूरी जानकारी अनिवार्य रूप से भारतीय खाद्य सुरक्षा तथा मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के साथ साझा की जानी चाहिए। साथ ही ऐसी जानकारियों को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए, जिसमें घी और तेल सहित ब्रांडेड कच्चे माल का विवरण मौजूद हो। ये विवरण हलवाइयों के दुकानों और भोजनालयों में प्रमुख स्थानों पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए।

उत्तर प्रदेश में खाद्य सुरक्षा के लिए कड़े निर्देश जारी

उत्तर प्रदेश में खाद्य पदार्थों में थूकने और मूत्र मिलाने की कथित घटनाओं को संज्ञान में लेते हुए, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सही दिशा में निर्देश दिया कि सभी खाद्य केंद्रों के संचालकों, मालिकों और प्रबंधकों का नाम और पता प्रदर्शित किया जाए, साथ ही रसोइयों और वेटरों के लिए मास्क व दस्ताने पहनना अनिवार्य किया जाए। इसके साथ ही होटलों और रेस्तरां में सीसीटीवी कैमरे लगाया जाना भी जरूरी है।

यहां तक कि कांग्रेस-शासित हिमाचल प्रदेश सरकार में मंत्री पामादित्य सिंह ने भी इसी नियम के पालन की इच्छा जतायी है। भारत में इतने अधिक रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की मौजूदगी को देखते हुए, छद्म-धर्मनिरपेक्षता से ऊपर उठकर सभी राज्यों को ये कदम उठाने चाहिए। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण द्वारा सभी भोजनालयों के लिए उनके दरवाजों पर स्वच्छता-रेटिंग प्रदर्शित करना अनिवार्य बनाने की दिशा में जो कदम उठाया है, वह प्रशंसनीय है। लेकिन यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऐसा सचमुच हो, सिर्फ बातें भर न हों और इस रेटिंग में रसोई व भंडारण क्षेत्रों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

भोजनालयों में चूहों के कारण रसोई की स्वच्छता खतरे में

यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि हमारे यहां भोजनालयों के भंडारों में चूहों का भागना-दौड़ना बहुत आम है, जिससे रसोई गंदी होती हैं। एफएसएसएआई ने खाना पकाने के लिए बार-बार तले जाने वाले तेल के नियंत्रण पर महत्वपूर्ण कदम उठाया है। क्योंकि बार-बार ऐसा करने से यह तेल हमारे स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन जाता है। समय आ गया है कि भोजनालय चाहे कितना छोटा क्यों न हो, वहां आरओ जल-शुद्धिकरण यंत्र लगाना जरूरी है।

इसे अनिवार्य किया जाए कि प्रत्येक भोजनालय इस नियम का पालन कर रहा है और एफएसएसएआई को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शाकाहारी और मांसाहारी भोजन के लिए रसोई के बर्तन अलग-अलग हों, ताकि शाकाहारी लोगों की भावनाओं का सम्मान किया जा सके। इस बात को भी सभी भोजनालयों में प्रमुख रूप से प्रदर्शित करना जरूरी हो। केंद्र सरकार को चाहिए कि वह योग की तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शाकाहारी भोजन को बढ़ावा दे और सभी सरकारी आयोजनों में केवल शाकाहारी भोजन ही परोसा जाए, इसे सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

यहां तक कि विदेशी गणमान्य व्यक्ति भी प्रसिद्ध भारतीय शाकाहारी भोजन का स्वाद लेकर इसे सुखद परिवर्तन के रूप में लेंगे। अयोध्या और मथुरा जैसे पवित्र शहरों में, जहां बहुसंख्यक हिंदुओं की भावनाओं के अनुरूप मांस की पी पहले से ही प्रतिबंधित है, वहां शाकाहार को बढ़ावा मिल रहा है। इसलिए भारत सरकार को संयुक्त राष्ट्र से संपर्क करके 1 अक्तूबर को विश्व शाकाहार दिवस मनाए जाने का अनुरोध करना चाहिए।

शाकाहारी व मांसाहारी भोजन के लिए अलग बर्तन और रसोई

केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देना चाहिए कि शाकाहारी व मांसाहारी भोजन पकाने के लिए अलग-अलग बर्तन ही नहीं, अलग-अलग रसोईयों का भी इस्तेमाल हो। इस व्यवस्था को उनके परिसर के अंदर और बाहर प्रमुख रूप से प्रदर्शित किया जाए। ऐसे में ग्राहक बढ़ेंगे, क्योंकि दोनों ही किस्म के ग्राहक नहीं चाहते कि उनके भोजन के साथ घालमेल हो।

स्कूलों और रेलगाड़ियों में ताजा पकाये गये भोजन की जगह ब्रांडेड पैक्ड खाद्य पदार्थ मिलने चाहिए क्योंकि आये दिन समाचारों में ऐसी रिपोर्ट्स देखने को मिलती हैं कि स्कूलों में मध्यान्ह भोजन के रूप में पकाये गये चावल और दाल घटिया क्वालिटी के हैं। यहीं नहीं उनमें कीड़े-मकोड़े, मेंढक, छिपकली और चूहे तक पाये जाते हैं। कई ऐसी घटनाएं हुई हैं कि स्कूल के बच्चे ताजा पका भोजन खाने के बाद बीमार पड़ गये।

इसलिए पैक्ड भोजन ज्यादा भरोसेमंद होगा और हां, इसमें कुछ बच्चों के प्याज और लहसुन के न खाने की बात को भी ध्यान में रखा जाए। एक बार 30 सांसदों ने सरकार से अपील की थी कि मुंबई स्थित बिस्कुट मैन्युफैक्चरर्स वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा अनुशंसित प्रतिष्ठित कंपनियों से खरीदे गए पैकेज्ड बिस्कुट को मध्यान्ह भोजन योजना में पके हुए भोजन की जगह शामिल किया जाए।

यह भी पढ़ें… राज्य की बेहतरी के लिए उठाए गए अनेक कदम : एन. इंद्रसेन रेड्डी

पैकेज्ड भोजन से सरकार का बजट रहेगा नियंत्रण में

इससे सरकार का बजट नियंत्रण में रहेगा और कारपोरेट कंपनियां अपनी सोशल रिस्पोंसिबिलिटी के चलते पैकेज्ड भोजन उपलब्ध कराकर अपनी जिम्मेदारी को पूरा कर सकते हैं। सरकार को चाहिए कि वो भारतीय रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉरपोरेशन लिमिटेड की इकाइयां देश के हर जिले में स्थापित करे, जहां वे बड़े पैमाने पर बेक्ड उत्पाद बनाएं, जिसे स्कूलों और रेलगाड़ियों में उपलब्ध कराया जाए। क्योंकि ताजे पके भोजन को लेकर अकसर शिकायतें आती रहती हैं।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने 19 अप्रैल 2021 को केंद्र और राज्य सरकारों से उन रिपोर्टों पर टिप्पणी मांगी थी, जिनमें कहा गया था कि भारत में प्रसिद्ध कंपनियों के लोकप्रिय ब्रांडों में भी मिलावटी शहद बेचा जा रहा है। पाया गया था कि चीन से आयातित एक विशेष प्रकार की चीनी को शहद में मिलाकर एफएसएसएआई के परीक्षण मानक को भी पास किया जा सकता है।

राजधानी दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड इनवार्यन्मेंट द्वारा किये गये शोध के अनुसार भारत में बेचे जा रहे शहद के 70 नमूनों में से केवल 3 ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत हो सके थे। यह भारतीय लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ है। क्योंकि मधुमेह (डायबिटीज) से पीड़ित लोग शहद का सेवन करते हैं। शहद उनके लिए सुरक्षित माना जाता है, लेकिन मिलावटी शहद बेहद खतरनाक हो सकता है।

अमूल को विश्व के 100 शीर्ष खाद्य ब्रांडों में 15वां स्थान

सहकारी क्षेत्र के दिग्गज अमूल को विश्व के 100 शीर्ष खाद्य ब्रांडों में 15वां स्थान मिला है। भारत सरकार द्वारा जनहित में यह सूचना लोगों तक पहुंचायी जानी चाहिए। जबकि निजी क्षेत्र की ब्रिटानिया इंडस्ट्री इसी पैमाने पर 54वें स्थान पर आती है, लेकिन भारत सरकार की सार्वजनिक कंपनियां तमाम सुविधाएं और सब्सिडी पाकर भी कोई अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग क्यों नहीं पाती हैं।

इसी संदर्भ में इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉरपोरेशन तथा मदर डेयरी के प्रबंधन से पूछा जाना चाहिए कि सार्वजनिक पैसे ढंग से भारी निवेश के बावजूद आखिर वे विश्व के शीर्ष 100 ब्रांडों में अपनी जगह क्यों नहीं बना सके? सरकार को पानी की बोतलों और खाद्य वस्तुओं की दोहरी कीमत की अनुमति भी नहीं देनी चाहिए। क्योंकि प्रसिद्ध ब्रांडेड कंपनियां अपने पैकेज्ड पानी की बोतलें और कोल्ड ड्रिंक्स बेचती हैं।

सुभाषचंद्र अग्रवाल
सुभाषचंद्र अग्रवाल

वे एक ही उत्पाद के लिए दोहरी कीमत रखती हैं… एक सामान्य कीमत खुले बाजार के लिए और दूसरी उड़ानों, थिएटरों और पांच सितारा होटलों के लिए। यह उपभोक्ता-विरोधी प्रथा बंद होनी चाहिए। भारत उन देशों में आता है जहां अन्न की बर्बादी को खराब माना जाता है, फिर भी भारत में शादियों के आयोजन में खाने की जबर्दस्त बर्बादी होती है। लोग अपनी थालियों में अनाप-शनाप खाने की चीजें रख लेते हैं और फिर आधा-अधूरा खाकर पूरा फेंक देते हैं, जिससे बहुत ज्यादा खाने की बर्बादी होती है। इन बातों पर गौर फरमाया जाना चाहिए।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button