फ़ज़ीहत एक महाबली की

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दुनिया के सबसे ताकतवर देश के स्वयंभू मैनेजर और व्हाइट हाउस के परमानेंट किराएदार (कम से कम उनके अपने दावों के मुताबिक), डोनल्ड ट्रंप महाशय इन दिनों एक नई फिल्म के निर्देशक बने हुए हैं। फिल्म का नाम है – ईरान का इलाज। दिक्कत बस यह है कि फिल्म की पिप्ट उनके एक्स हैंडल के चरित्रों की तरह छोटी है; और हकीकत का पर्दा बहुत बड़ा हो गया है। यह टिप्पणी लिखे जाने तक, अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान जंग को तीन हफ्ते हो गए हैं; और ट्रंप महाशय की हालत उस हलवाई जैसी हो गई है जिसने स्पेशल मिठाई बनाने के चक्कर में पूरी दुकान में धुआँ भर लिया है।

शुरुआत में ट्रंप महाशय ने अपनी खास मूँछविहीन मुस्कुराहट के साथ कहा था, यह काम बस दो-चार दिन का है। हम जाएँगे, धमाका करेंगे और वापस आकर बर्गर खाएँगे। इक्कीस दिन बीत चुके हैं, बर्गर तो दूर, ट्रंप महाशय को अब व्हाइट हाउस की डाइनिंग टेबल पर शांति का सूप भी कड़वा लग रहा है। दुनिया के सबसे तगड़े डील-मेकर को शायद किसी ने बताया नहीं था कि जंग कोई रियल एस्टेट की डील नहीं है कि आपने दीवार बनाने की धमकी दी और सामने वाला डरकर जमीन छोड़ देगा। यहाँ सामने ईरान है, जिसने अपनी कसमों और मिसाइलों को उतना ही पुराना और सख्त रखा है, जितना उसका कालीन होता है।

ट्रंप खुद बन गए जंग के मोहरे, इज़राइल के साथ बिछाई बिसात

इजराइल के अपने खास दोस्त के साथ मिलकर ट्रंप महाशय ने जो बिसात बिछाई थी, उसमें अब वे खुद ही मोहरा बनते दिख रहे हैं। दरअसल, उनका युद्ध लड़ने का तरीका भी बड़ा कॉरपोरेट है। वे चाहते हैं कि जंग में भी प्राइम टाइम रेटिंग मिले। पर इक्कीसवें दिन की सुबह जब उन्होंने आईने में अपना चेहरा देखा होगा, तो शायद उन्हें मेक अमेरिका ग्रेट अगेन वाले नारे में ग्रेट शब्द धुँधलाता हुआ और उसकी जगह फ़ज़ीहत शब्द चमक के साथ उभरता दिखाई दिया हो!

वैसे ट्रंप महाशय की खीझ, झुँझलाहट और बौखलाहट इन दिनों प्रेस कॉन्फ्रेंसों में देखते ही बनती है। उनकी बॉडी लैंग्वेज ऐसी होती है जैसे वे ईरान को नहीं, बल्कि किसी जिद्दी कर्मचारी को यू आर फायर्ड कहने आए हों। लेकिन हकीकत यह है कि न तो ईरान फायर हो रहा है और न ही ट्रंप की धौंस काम आ रही है। उधर इजराइल अपने आयरन डोम के नीचे बैठकर सोच रहा है कि ट्रंप महाशय की बातों का डोम कब तक सुरक्षा देगा? इसलिए उन्हें बिना बताए भी मौका देखकर ईरान के खिलाफ चौका जड़ने से गुरेज नहीं कर रहा।

हिंदुस्तानी मुहावरे में कहें तो ट्रंप महाशय ने पराया रायता अपने हाथों से फैला लिया है। वे चले थे ईरान के परमाणु ठिकानों को धुआँ करने और यहाँ खुद उनकी साख का धुआँ निकल रहा है। जंग के तीन हफ्ते गवाह हैं कि युद्ध ट्रंप टावर की तरह ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि सब्र और समझदारी से जीते जाते हैं – दो चीजें जो चौधरी ट्रंप साहब के शब्दकोश में शायद डिलीट बटन के नीचे दबी हुई हैं!

ट्रंप की मध्य-पूर्व चालें और वास्तविकता का बड़ा अंतर

अपनी चौधराहट के नशे में महाशय ट्रंप को लग रहा था कि वे मध्य-पूर्व के अखाड़े के गामा पहलवान बनेंगे, लेकिन फिलहाल तो वे उस अनाड़ी खिलाड़ी की तरह दिख रहे हैं जो अखाड़े की मिट्टी फाँक रहा है और बाहर खड़े लोग तालियाँ बजाने की जगह ठहाके लगा रहे हैं। मात्र इक्कीस दिन में अमेरिका की सुपरपावर वाली चमक पर ईरान की धूल चढ़ गई है। दुनिया देख रही है कि कैसे एक बड़बोला राष्ट्रपति अपनी ही चालों में उलझकर अपनी फ़ज़ीहत की नित नई पटकथा लिख रहा है।

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हर रोज तकरीबन 2 अरब डॉलर का नुकसान झेलकर शायद ट्रंप महाशय जान गए हों कि जंग और जुमलेबाजी में उतना ही फर्क होता है जितना असली शेर और सर्कस के शेर में। सर्कस वाला शेर हंटर देखकर बैठ जाता है, लेकिन हकीकत का मैदान अलग होता है। इतने दिन बाद सवाल यह नहीं है कि ईरान का क्या होगा, सवाल यह है कि ट्रंप महाशय अपनी बची-खुची इज्जत का कौन सा नया ब्रांड लॉन्च करेंगे? जनाबे आली, यह जंग है, कोई ब्यूटी पेजेंट नहीं कि आप जजों को खरीद लेंगे। यहाँ हर दिन आपकी फ़ज़ीहत का नया सीजन रिलीज हो रहा है और दुनिया इसे देखकर सिर पीट रही है। क्योंकि दोनों ओर के पागल हाथियों के इस अविवेकपूर्ण युद्धोन्माद का खामियाजा तो उसी को भरना है!

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