आस्था की नगरी में उपेक्षित मातृशक्ति : वृंदावन की विधवाएँ
मंदिरों की घंटियाँ, भजन की स्वर लहरियाँ और श्रद्धालुओं की भीड़ वृंदावन को एक विशिष्ट आध्यात्मिक वातावरण देती है। इन्हीं मंदिरों के बाहर सफेद साड़ी में बैठी एक वफद्ध महिला भजन गुनगुना रही थी। पास रखे छोटे से कटोरे में कुछ सिक्के पड़े थे। देश के अलग-अलग हिस्सों से अनेक विधवा महिलाएँ यहाँ आकर बसती रही हैं।
कई बार यह निर्णय उनका अपना नहीं, बल्कि परिस्थितियों का परिणाम होता है। पति के निधन के बाद परिवार में उपेक्षा, आर्थिक असुरक्षा या सामाजिक तिरस्कार उन्हें यहाँ ले आता है। आस्था की इस नगरी में उन्हें रहने की जगह तो मिल जाती है, पर जीवन की कठिनाइयाँ पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं। इनमें से अनेक महिलाएँ छोटे-छोटे आश्रमों में रहती हैं।
विधवाओं का सम्मान: केवल आस्था नहीं, जीवन की सुरक्षा भी जरूरी
दिन का बड़ा हिस्सा मंदिरों या भजन मंडलियों में बीतता है। कहीं-कहीं भजन गाने के बदले उन्हें थोड़ा भोजन या मामूली आर्थिक सहायता भी मिल जाती है। लेकिन बढ़ती उम्र, सीमित साधन और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी उनके जीवन को लगातार चुनौतीपूर्ण बनाए रखती है। दरअसल यह समस्या केवल आर्थिक या व्यवस्थागत नहीं है; इसके पीछे विधवाओं को लेकर समाज की पूर्वाग्रहपूर्ण गहरी मानसिकता भी काम करती है।

जबकि किसी भी स्री का जीवन उसके वैवाहिक संबंध से कहीं अधिक व्यापक होता है। उसका सम्मान, उसकी स्वतंत्रता और उसके अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने किसी अन्य व्यक्ति के। हाल के वर्षों में सरकार और कई सामाजिक संस्थाओं ने इस दिशा में प्रयास किए हैं। आश्रय गफह, पेंशन योजनाएँ और पुनर्वास कार्पाम चलाए जा रहे हैं।

लेकिन जब तक समाज की सोच में परिवर्तन नहीं आएगा, तब तक वास्तविक बदलाव अधूरा ही रहेगा। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या हम किसी स्री को केवल उसके वैवाहिक दर्जे से परिभाषित करेंगे, या उसे एक पूर्ण व्यक्ति के रूप में स्वीकार करेंगे? यदि परिवार और समाज अपने दृष्टिकोण में संवेदनशीलता और सम्मान को स्थान दें, तो शायद किसी भी स्री को अपने जीवन की अंतिम यात्रा अकेलेपन और उपेक्षा के बीच नहीं बितानी पड़ेगी। न सिर्फ आस्था की नगरी का वरन मातृशक्ति को पूजने वाले इस देश का वास्तविक अर्थ तभी पूर्ण होगा, जब यहाँ हर स्री सम्मान और सुरक्षा भी महसूस करे।
संध्या अग्रवाल
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