श्रीमद्भागवत में माता के वाहन का प्रभाव

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नवरात्रि में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। इस दौरान मां दुर्गा का आगमन और प्रस्थान भविष्य की गति तय करता है। इस संबंध में श्रीमद्भागवत् में विस्तार से वर्णित है। यहाँ देवी भागवत् को श्लोक प्रस्तुत है।

आगमन

शशिसूर्ये गजारूढ़ा, शनिभौमे तुरंगमे।
गुरुपो च दोलायां बुधे नौका प्रकीर्तिता।।
फलम् गजे च जलदा देवी छत्रडंग तुरंगमे।
नौकायां सर्व सिद्धिस्यात् दोलायां मरणं धुव्रम्।।

इस श्लोक के अनुसार, नवरात्रि का आरंभ गुरुवार से हो रहा हो तो मां दुर्गा का आगमन पालकी पर होता है। इसे शुभ संकेत नहीं माना जाता है। ऐसा होने पर युद्ध जैसे हालात बनते हैं और लोगों में रोग आदि बढ़ता है। आर्थिक उतार-चढ़ाव और सामाजिक अशांति की स्थिति बन सकती है।

प्रस्थान

शशिसूर्यदिने यदि सा विजया, महिषा गमनेरूज शोककरा,
शनिभौमे यदि सा विजया चरणायुधयानकरी विकला,
बुधपे यदि सा विजया गजवाहनगा शुभवृष्टिकरा,
सुरराजगुरौ यदि सा विजया नरवाहनगा शुभसौख्यकरा।।

श्रीमद्भागवत महापुराण में बताया गया है कि जब माता पावार के दिन प्रस्थान करती हैं तो उनका वाहन हाथी होता है। मां दुर्गा जब भी हाथी पर प्रस्थान करती हैं तो अच्छी वर्षा होती है। इस चैत्र नव संवत् के राजा गुरु रहेंगे। यह भी अच्छी वर्षा का संकेत हैं। चैत्र नव संवत की शुरुआत में रोहिणी नक्षत्र का वास समुद्र में हो रहा है, जिसके कारण कुछ स्थानों पर अति बारिश होने से जन-धन हानि होने के योग भी बन रहे हैं।

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वाहन का प्रभाव

हाथी- जब भी मां दुर्गा का वाहन हाथी होता है तो वह शुभ माना जाता है। अच्छी वर्षा, सुख समृद्धि बढ़ती है।
पालकी- माता का वाहन पालकी हो तो समय काफी संघर्षपूर्ण रहता है। आर्थिक उतार-चढ़ाव, सामाजिक अस्थिरता, जन-धन हानि के संकेत मिलते हैं।

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