परम कर्त्तव्य है माता-पिता की सेवा-सुश्रूषा

एक सूक्ति पढ़ रहा था- किसी ने पुण्य कमाए ‘और किसी ने उपवास रखा, हमने पुण्य नहीं कमाए, बस मां-बाप को अपने साथ रखा। इससे स्पष्ट होता है कि मां-बाप को अपने पास रखना व उनकी सेवा करना पुण्य का काम है। यदि हम पूजा-पाठ, व्रत-उपवास या तीर्थाटन न करके मां-बाप की सेवा मात्र करें तो उसका बड़ा पुण्य हमें मिलता है।

यदि मां-बाप की सेवा करने से पुण्य न मिले तो क्या हम उनकी सेवा और देखभाल करना छोड़ देंगे? जब हम लाभ के लिए कोई कार्य करते हैं तो वो एक व्यापार जैसी क्रिया होती है। यदि हम पुण्य कमाने के उद्देश्य से माता-पिता की सेवा करते हैं तो उसे व्यापार मात्र माना जाना चाहिए। लाभ या पुण्य की प्राप्ति के उद्देश्य को लेकर की गई सेवा के लिए हम गर्व नहीं कर सकते।

जो लोग माता-पिता की उपेक्षा करते हैं या उन्हें कष्ट पहुंचाते हैं तो उनसे वे लोग कहीं अधिक अच्छे हैं, जो पुण्य कमाने के लोभ से ही सही, माता-पिता का ध्यान तो रखते हैं। वास्तव में माता-पिता की देखभाल और सेवा-सुश्रूषा एक कर्त्तव्य है, एक उत्तरदायित्व है, जिसका निर्वाह करना अनिवार्य है। ऐसा न करना केवल अनैतिकता ही नहीं अपराध भी है।

जब हम अपने कर्त्तव्यों का भली भांति पालन करते हैं क्या कहती मैं मन मसोस कर रह गई। इसकी वजह से ही व अपने उत्तरदायित्वों का ठीक से निर्वहन करते हैं तभी एक अच्छे नागरिक बनते हैं। अब प्रश्न उठता है कि क्या भली-भांति अपने कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए या अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के बदले में आत्मश्लाघा या अहंकार जरूरी है ?

माता-पिता अपने बच्चों की खुशियों के लिए बहुत कुछ करते हैं, किंतु हमने कभी अपनी आवश्यकताओं का गला घोंटकर उनकी जरूरतों को पूरा करने का प्रयास किया है? क्या उनकी इच्छानुसार हम उनकी देखभाल कर रहे हैं? यदि हम ऐसा कर रहे हैं तभी हम अपने कर्त्तव्यों का ठीक से पालन कर रहे हैं। माता-पिता बचपन में अपने छोटे बच्चों को जितना प्यार करते हैं, यदि वृद्धावस्था में वे उनसे उतना ही प्यार नहीं करते तो यह इस बात का ही प्रमाण है कि उनकी देखभाल में अवश्य ही कोई कमी है।

जब हम किसी से कोई ऋण लेते हैं तो उसको चुकाना और ब्याज समेत चुकाना हमारा दायित्व बनता है। यदि हम ब्याज समेत किसी का ऋण चुका देते हैं तो यह एक व्यावसायिक अनिवार्यता है जिसके अभाव में हम दोषी या अपराधी ही ठहराए जाएंगे। माता-पिता की सेवा भी एक ऋण माना गया है। इस ऋण को चुकाने के संदर्भ में हम जब ये दर्पोक्ति करते हैं कि हमारे मां-बाप हमारे साथ रहते हैं या हम उन्हें अपने साथ रखते हैं अथवा उनकी सेवा करते हैं तो ये वाक्य ही हमारे खोखलेपन व दंभी चरित्र को उजागर करने के लिए पर्याप्त है। इसमें अहंकार का भाव साफ झलकता है। हमें चाहिए कि हर हाल में माता-पिता का प्यार प्राप्त करें और ये दंभ न करें कि हम माता-पिता की सेवा करते हैं और औरों से अच्छी तरह करते हैं।

सीताराम गुप्ता

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button