संवेदना का मूल्य

एक साधारण परिवार में जन्मा बालक चंद्रगुप्त मौर्य गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त कर रहा था। उसके गुरु महान नीतिकार चाणक्य उसे केवल शास्त्र ही नहीं, जीवन का गूढ़ ज्ञान भी सिखा रहे थे। एक दिन गुरुकुल में एक निर्धन बालक अपमान से भरी आंखों के साथ रोता हुआ आया। कुछ शिष्यों ने उसकी गरीबी का उपहास उड़ाया था।

वहां उपस्थित चंद्रगुप्त ने सब देखा पर मौन रहा। चाणक्य की दृष्टि से यह दृश्य छिपा नहीं था। उन्होंने सभी शिष्यों को एकत्र किया और गंभीर स्वर में कहा, याद रखो, जहां भावनाओं का अपमान होता है, वहां ज्ञान भी टिक नहीं सकता। सम्मान ही सच्चे नेतफत्व की आत्मा है और जहां अपमान होता है, वहां रिश्ते और समाज दोनों सूख जाते हैं। फिर उनकी दृष्टि चंद्रगुप्त पर ठहर गई।

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चाणक्य ने उससे पूछा, यदि तुम भविष्य में सम्राट बनो, पर अपने ही लोगों के हृदय को न समझ सको, तो क्या तुम्हारा साम्राज्य स्थायी रह पाएगा? ये शब्द चंद्रगुप्त के अंतर्मन को झकझोर गए। उसे अपने मौन का अपराध समझ आया। वह तुरंत उस बालक के पास गया, उसके आंसू पोंछे और पूरे सम्मान के साथ उसे अपने पास बैठाया। समय बीता, आगे चलकर चंद्रगुप्त महान सम्राट बना। वह जानता था कि राज्य तलवार से नहीं, बल्कि दिलों को जीतकर चलता है और यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति बन गई।

मुनीष भाटिया

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