कहीं दुनिया को ही खाक न कर दे ये जंग !
इजराइल-ईरान का अंत चाहता है, जबकि व्यापारी ट्रंप तेहरान में ऐसी शासन व्यवस्था जो उन्हें आर्थिक लाभ पहुंचाये। इरादों का यह अंतर अब अमेरिका की घरेलू राजनीति में भी दिखायी देने लगा है। ट्रंप के अपने मागा समर्थक सवाल कर रहे हैं कि अमेरिका उस युद्ध में क्यों कूदा, जो उसका है ही नहीं। बहरहाल, स्थिति अब यह हो गई है कि तार्किक संयम की उम्मीद किसी भी पक्ष से नहीं की जा सकती। हां, अमेरिका इस स्थिति में अवश्य है कि युद्ध पर विराम लगाये या उसे अतिरिक्त तीव्र होने दे। अगर वाशिंगटन इजराइल का समर्थन जारी रखता है, तो यह जंग पूर्णत ऊर्जा युद्ध में बदल जायेगी और संकट के बादल पूरी दुनिया पर छा जायेंगे। अगर ट्रंप एग्जिट का कोई रास्ता निकालना तय करते हैं, तो उम्मीद की एक किरण ज़रूर दिखायी देती है। ध्यान रहे कि अगर खाड़ी जलती रहेगी तो कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ेगी।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया क्षेत्र में ऊर्जा (गैस व तेल) ठिकानों पर की जा रही बमबारी की कड़े शब्दों में निंदा की है और डी-एस्केलेशन (आक्रामक या हिंसक स्थिति को बिना बल प्रयोग के, बातचीत के द्वारा कम करने और उसे अधिक बिगड़ने से रोकने) का आग्रह किया है। इस संदर्भ में उन्होंने ओमान, जॉर्डन, फ्रांस व मलेशिया के नेताओं से बात की है और तुरंत वार्ता व कूटनीति की आवश्यकता पर बल दिया है।
ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी विश्व के नेताओं को एक मंच पर लाना चाहते हैं ताकि जंग कर रहे देशों पर युद्धविराम का दबाव बनाया जा सके। लेकिन उन्होंने बेमकसद व बेमतलब के युद्ध में लिप्त अमेरिका, इजराइल व ईरान के नेताओं से इस संदर्भ में कोई बात नहीं की है, जबकि वह अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप व इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को अपना दोस्त बताते हैं और उनके अनुसार भारत व ईरान के संबंध तब से हैं जब से इतिहास है।
मोदी की कूटनीतिक कोशिशों का वैश्विक महत्व
बहरहाल, मोदी की कोशिशों को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए; क्योंकि अमेरिका व इजराइल द्वारा ईरान पर जबरन थोपा गया युद्ध अब ऐसे मोड़ पर आ गया है, जब इसे रोके जाने की ज़रूरत पूरी दुनिया महसूस कर रही है; क्योंकि ब्रेंट क्रूड के दाम बढ़कर प्रति बैरल 118 डॉलर हो गये हैं और गैस के दामों में 17 से 30 फीसदी का इज़ाफा हुआ है। जब तेल व गैस के दाम बढ़ते हैं, तो हर चीज़ महंगी हो जाती है और पिसता बेचारा आम आदमी है।
तेल के दाम बढ़ने (और रूपये के कमज़ोर होने) से दलाल स्ट्रीट के निवेशक भी डर गये हैं, विशेषकर इसलिए भी कि एचडीएफसी बैंक के नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन अतानु पावर्ती ने अचानक अपने पद से इस्त़ीफा दे दिया। इससे इस बैंक के शेयरों में 5 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आ गई। इस सबका प्रभाव यह हुआ कि 19 मार्च 2026 को सेंसेक्स में लगभग 2,500 पॉइंट्स की गिरावट आयी, जोकि एक दिन में आज तक की छठी सबसे बड़ी गिरावट है। निवेशकों के लिए अप्रैल 2025 के बाद यह सबसे खराब दिन रहा जब तकरीबन 13 लाख करोड़ रूपये स्वाहा हो गये।
इसके बावजूद जंग पर विराम लगने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं। ईरान, जिसके पास अब खोने को कुछ नहीं है, क्योंकि उसकी टॉप लीडरशिप को खत्म कर दिया गया है, ने युद्धविराम करने से साफ इंकार कर दिया है और उसका कहना है कि जंग तुमने शुरू की थी, खत्म हम करेंगे। जब कोई व्यक्ति मरने से न डरता हो तो उसे रोकना कठिन हो जाता है। दूसरी ओर पेंटागन ने इस युद्ध को फंड करने के लिए 200 बिलियन डॉलर की मांग की है।
युद्ध में हो रहे खर्च का वैश्विक आर्थिक प्रभाव
जितना पैसा इस जंग में धुआं-धुआं होता जा रहा है, उसका संसार पर उतना ही भयानक असर पड़ेगा। कुल मिलाकर अनुमान यह है कि दुनिया मंदी व महंगाई की चपेट में आती हुई नज़र आ रही है और तीसरे विश्व युद्ध का खतरा भी मंडरा रहा है। िफिलहाल इस संकट के लिए केवल इज़राइल ज़िम्मेदार है, जिनके अपने पागलपन में ईरान के साउथ पारस फॉसिल गैस फील्ड पर हमला किया, अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करते हुए, जिनके तहत तेल, गैस आदि आवश्यक इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हमला करने की मनाही है।
चूंकि ईरान पहले ही कह चुका है कि अगर उसके तेल व गैस फ़ील्ड्स पर हमला होगा तो वह भी उसी स्वर में जवाब देगा, इसलिए उसने इजराइल, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, जॉर्डन, यूएई, ओमान और बहरीन के ऐसे ही ठिकानों पर अपनी मिसाइलें बरसायीं। सबसे बड़ा हमला कतर की एनर्जी एलएनजी फैसिलिटी पर किया गया, जिससे रास लाफान में गैस-टू-लिक्विड प्लांट पर काम बंद हो गया है और अनुमान यह है कि दुनियाभर में गैस की ज़बरदस्त कमी आ जायेगी।
अब ट्रंप का कहना यह है कि ईरान के गैस फील्ड पर इजराइली हमले की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी, जबकि इजराइल के तीन अधिकारियों ने दावा किया है कि यह हमला वाशिंगटन के सहयोग से किया गया। हालांकि एक प्रेस कॉन्फ्रेस करके इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने माना है कि यह हमला उनकी अपनी सोच थी और अमेरिका ने उससे आगे इस तरह के हमले न करने के लिए कहा है, जिसे इजराइल मानेगा। लेकिन लगता यही है कि इसमें ट्रंप की मिली-भगत थी और कतर के गुस्से व आपत्ति के बाद उन्होंने अपने स्वर बदले और कहा कि उन्होंने इज़राइल से गैस फ़ील्ड्स पर आगे से हमला न करने के लिए कहा है।
अरब देशों में अमेरिकी सैन्य बेस का महत्व
इसके साथ ही अब ट्रंप का यह भी कहना है कि कतर स्ट्राइक में शामिल नहीं था, इसलिए ईरान को उस पर हमला नहीं करना चाहिए था। लेकिन असल मुद्दा तो यही है कि अरब मुल्कों में अमेरिका के सैन्य बेस हैं, जिनका इस्तेमाल ईरान पर हमले करने के लिए किया जा रहा है और ईरान इस मामले में एकदम स्पष्ट है कि जहां से उस पर हमले होंगे, वह वहां जवाबी कार्रवाई करेगा।
अरब मुल्कों को चाहिए कि वह अपने यहां के अमेरिकी बेसों को ईरान के खिलाफ इस्तेमाल न होने दें; क्योंकि यह युद्ध उनका नहीं है। लेकिन अरब मुल्क अमेरिका के सामने नतमस्तक हैं और चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते; यही वजह है कि गाज़ा नरसंहार के दौरान भी वह मूकदर्शक बने रहे। अगर जल्द दुनिया को होश न आया तो ऊर्जा बाज़ार व सप्लाई बर्बाद न भी हुए तो भी बर्बादी के कगार पर जरूर पहुंच जायेंगे।
दरअसल, 19 मार्च 2026 संसार के लिए युद्ध का सबसे खराब दिन था। इजराइल व ईरान ने जिन जगहों पर हमले किये वे मामूली टारगेट्स नहीं थे। ग्लोबल एलएनजी सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा रास लाफान से आता है और साउथ पारस दुनिया का सबसे बड़ा गैस फील्ड है, जिसके संयुक्त मालिक ईरान व कतर हैं। इसलिए हम सिर्फ युद्ध की बढ़ती तीव्रता नहीं देख रहे हैं बल्कि ग्लोबल एनर्जी सिस्टम को हथियार बनता हुआ देख रहे हैं।
ग्लोबल एनर्जी फ्लो और तेल-सप्लाई पर बढ़ती चिंता
बात सिर्फ तेल के दाम बढ़ने, सप्लाई चिंताओं में वृद्धि की ही नहीं है- ग्लोबल एनर्जी फ्लो का दिल (केंद्र) फारस की खाड़ी सािढय युद्ध का मैदान बनती जा रही है। यही वजह है कि ट्रंप को जल्द ही अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने कहा कि वाशिंगटन को तेल अवीव के इरादे के बारे में मालूम नहीं था। अब वह बमों से तेल व गैस फ़ील्ड्स को अलग रखना चाहते हैं। लेकिन क्या इजराइल उनकी बात सुनेगा? मुश्किल है।
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इजराइल-ईरान का अंत चाहता है, जबकि व्यापारी ट्रंप तेहरान में ऐसी शासन व्यवस्था जो उनके साथ कारोबार करे, उन्हें आर्थिक लाभ पहुंचाये। इरादों का यह अंतर अब अमेरिका की घरेलू राजनीति में भी दिखायी देने लगा है। ट्रंप के अपने मागा समर्थक सवाल कर रहे हैं कि अमेरिका उस युद्ध में क्यों कूदा, जो उसका है ही नहीं।

बहरहाल, स्थिति अब यह हो गई है कि तार्किक संयम की उम्मीद किसी भी पक्ष से नहीं की जा सकती। हां, अमेरिका इस स्थिति में अवश्य है कि युद्ध पर विराम लगाये या उसे अतिरिक्त तीव्र होने दे। अगर वाशिंगटन इजराइल का समर्थन जारी रखता है, तो यह जंग पूर्णतः ऊर्जा युद्ध में बदल जायेगी और संकट के बादल पूरी दुनिया पर छा जायेंगे। अगर ट्रंप एग्जिट का कोई रास्ता निकालना तय करते हैं, तो उम्मीद की एक किरण ज़रूर दिखायी देती है। ध्यान रहे कि अगर खाड़ी जलती रहेगी तो कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ेगी।
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